बिल्लू – सरला सिंह

बिल्लू – सरला सिंह

शहर के एक कॉलोनी में एक बिल्ली परेशान -सी घूम रही थी ,उसे सूनसान और खाली जगह की तलाश थी ,जहाँ वह बच्चों का जन्म दे सके और उन्हें सुरक्षित रख सके ।इधर से उधर घूमते हुए उसे एक घर मिल ही गया । घर के पिछले हिस्से में कभी कभी सफाई के लिए ही कोई जाता था वरना वह कबाड़ चीजों का स्टोररूम ही था । बिल्ली ने चुपचाप सब कुछ समझकर वहाँ पर घर बनाने का मन बना लिया ।अपने बच्चों के लिए वह जगह उसे बहुत महफूज नज़र आयी ।
सुबह घर की एक सदस्य गीता जब घर के पिछले हिस्से की सफाई के लिए गयी तो उसका मुँह खुला का खुला रह गया ।वह दौड़ी
हुई घर के अन्य लोगों को भी धीरे धीरे बिना बोले चलने के आग्रह के साथ ले गयी ।वहाँ
बिल्ली जी बड़े ही शान्त भाव से अपने नन्हे नन्हे बच्चों को दूध पिलाने में मगन थीं और उस
घर के लोगों को देखकर थोड़ा सा डर भी रही
थी । सभी चुपचाप अन्दर आ गये और अब उनमें आपस में गम्भीर विचार विमर्श होने लगा ।बिल्ली को क्या खिलाया जाये ,क्या पिलाया जाये? आदि ,आदि ।
‘अरे अम्मा तुम्हीं बताओ बिल्ली को क्या
खिलाना चाहिए ?”नेहा ने पूछा।
” देखो घर में दूध है तो उसे दे दो ,उसमें ब्रेड मसलकर डाल देना उसका पेट भर जायेगा।”
माँ ने सलाह दिया ।
जल्दी जल्दी एक बड़ा कटोरा निकाला गया
उसमें दूध डालकर ब्रेड मसलकर मिलाया गया
और धीरे -धीरे बिल्ली के नजदीक जाकर वह
कटोरा रख दिया गया ।
” बिल्लू लो खा लो ।”नेहा ने कहा
अपना नया नाम ,नया घर और स्वागत देखकर बिल्लू भी थोड़ा आश्वस्त होने लगी थी ।”म्याऊँ ” कहकर मानों उसने अपनी स्वीकृति दी और चुपचाप दूध पीने लगी ।दूध पीकर ब्रेड भी खा गयी ।
अब घर के लोगों पर एक नयी जिम्मेदारी थी बिल्लू जी को क्या खिलाया जाये ? उसे और उसके बच्चों को धूप से कैसे बचाया जाये?आदि ,आदि ।
बिल्लू के बच्चों की अभी आँखें नहीं खुलीं थी वे केवल माँ के दूध पर ही आश्रित थे । बिल्लू जी अपने बच्चों को छोड़कर कहीं नहीं
जाती थी । उसके खाने पीने का पूरा इन्तजाम
घर के सभी लोग कर रहे थे । बिल्लू को भी
उनसे कोई डर नहीं लगता था । बकायदा बिल्लू
कहकर पुकारने पर “म्याऊँ”कहकर जवाब भी
देती थी ।
धीरे धीरे समय आगे बढ़ने लगा ।बिल्लू के
बच्चों की भी आँखें खुल गयीं थीं ।वे धीरे धीरे
ऊपर का दूध भी पीने लगे थे । अब बिल्लू अपने बच्चों को शिकार करना भी सिखाने लगी। वह कई बार बच्चों को छोड़कर बाहर
चली जाती और जब लौटती तो एक मोटे से
शिकार के साथ । फिर अपने बच्चों को शिकार
करना सिखाती । बिल्लू के बच्चे आँगन में खूब
धमाचौकड़ी मचाते रहते कभी कोई डिब्बा ही
गिरा देते कभी कुछ और । बिल्लू तो इतनी
समझदार थी कि घर के अन्दर नहीं आती थी
आँगन से ही अपने भोजन का इन्तजार करती
लेकिन उसके बच्चे जरूर समय पर दूध व खाना न मिलने पर सीधे अन्दर आ जाते मानों
पूछ रहे हों ,कहाँ है मेरा खाना ?
यही नहीं “चलो बाहर’कहने पर कूदकर बाहर भी चले जाते । बिल्लू अपनी जगह बैठकर के चुपचाप अपने बच्चों की लीला देखती रहती और कभी कभी उनपर गुर्राती भी थी मानों उनको डाँट लगा रही हो ।
जानवर समझदार होते है अभी तक यही
सुन रखा था ।बिल्लियों के बारे में एक और बात जानने को मिली कि वे अपने बच्चों को लेकर एक ही जगह पर नहीं रहतीं । बगल की आँटी जी ने एक बार बताया था , “अरे यह अपने बच्चे लेकर चली जायेगी । बिल्ली अपने बच्चों के साथ पूरे सात घर बदलती है ।”
“अच्छा ,हाँ मैंने भी बचपन में सुना था ।” माँ
ने समर्थन किया ।
अब सभी लोगों को यही लग रहा था कि बिल्लू अपने बच्चों को लेकर चली जायेगी । लेकिन ऐसा नहीं हुआ ।शायद उसे इस घर से सुरक्षित अन्य कोई घर नहीं लगा हो या उसका
विश्वास इस घर के लोगों पर ज्यादा ही हो ।
धीरे -धीरे एक डेढ़ महीने बीत गये । अब
बिल्लू कभी कभी पूरे दिन ही गायब रहती कभी दो चार घंटें में वापस आ जाती ।बच्चे जैसे उसे देखते दौड़ पड़ते ,और दूध पीने लगते फिर उसके साथ खेलने लग जाते ।एक दिन तो
बिल्लू जी पूरे दिन पूरी रात ही गायब रहीं । अब
घर के सभी सदस्य परेशान हो गये ।गीता और नेहा तो ज्यादा ही घबड़ाती थीं ।
” माँ अब क्या होगा बच्चों का ?” नेहा ने माँ से पूछा ।
माँ ने सलाह दी ,”अरे कोई बात नहीं बच्चे अब काफी बड़े हो गये हैं , वे पल जायेंगे।”
” सच में माँ ।”नेहा सबसे ज्यादा परेशान थी।
“हाँ हाँ कह तो दिया ।”माँ ने कहा।
अगले दिन सुबह फिर बिल्लू जी अपने बच्चों के पास हाजिर पायी गयीं ।उसे देखकर सबने
राहत की साँस ली ।
धीरे धीरे बच्चे और बड़े हो गये । सभी
आश्वस्त थे कि बिल्लू के सारे बच्चे बच गये अब उन्हे कोई डर नहीं है । अब वे अकेले भी
जी सकते है । लेकिन होनी नाम की भी एक
चीज है जो पता ही नहीं चलने देती कि कब
क्या होगा ?
एक दिन सुबह के समय जब गीता बाहर झाड़ू लगा रही थी उसे एक अजीब सी आवाज सुनाई दी। पहले तो लगा शायद टी.वी. की आवाज़ है फिर तेजी से पीछे के आँगन की ओर दौड़ी जहाँ पर बिल्लू के बच्चे थे । आज फिर बिल्लू जी लौटकर नहीं आयीं थी और बच्चे अकेले ही थे।गीता ने देखा कि एक मोटा सा बिलौटा बच्चे को अपने मुँह में दबाये खड़ा है । गीता को देखकर वह बच्चे को छोड़कर पाँच फिट ऊँची दिवाल फाँदकर भाग खड़ा हुआ। ् बच्चा बुरी तरह से चिल्ला रहा था ।उसके गर्दन की अन्दरूनी हड्डियों या नसों को क्षति पहुँची थी ।गीता बच्चे को तुरन्त उठाकर अन्दर लायी और माँ से पूछकर हल्दी लगाया गया ।फिर नेहा उसे लेकर जानवरों के डॉक्टर के पास ले गयी जहाँ डॉक्टर ने उसे कुछ दवाइयों के साथ एक इंजेक्शन भी लगाया ।इससे उसे थोड़ा आराम भी महसूस हुआ । घर आने के बाद वह पूरी रात सोया भी । बिल्लू भी वापस आ गयी थी लेकिन वह कुछ समझ नहीं पा रही थी । जाने क्या सोचकर जब उसके पास उसके चोट खाये बच्चे को ले जाया जाता तो वह उसे मारने लगती थी । अब बिल्लू के बच्चे को अन्दर ही रखा जा रहा था पर बिल्लू उसे लगातार देख ही रही थी । अगले दो दिन भी इंजेक्शन व दवाइयां दी गयीं । डॉक्टर खुद घर आकर उसे देखकर गये पर बिल्लू के उस बच्चे को बचाया नहीं जा सका ।
बिल्लू को मानों उसके बच्चे के
मृत्यु का बोध हो चुका था वह कई दिनों तक रोती रही ,खाना भी बहुत ही कम खाती और अब अपने दो बचे हुए बच्चों को छोड़कर कहीं जाना भी बहुत ही कम कर दिया था ।

डॉ.सरला सिंह
दिल्ली

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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