बोझ-आनंद मिलन

बोझ-आनंद मिलन

“माँ-बाबूजी” कितना प्यारा शब्द है, बोलते समय अन्दर (मन) से स्नेह प्रेम का एहसास होता है | इन दो शब्दों के अन्दर ही जल- थल- नव समाया हुआ है| कोई जरुरत नही है काशी-मथुरा और गंगासागर जाने की | अगर इस शब्द रूपी शरीर की सेवा करे तो ? माँ के आचल तले ही तो स्वर्ग है, वो छाओ है जिसके लिए हमलोग मंदिर-मजिस्द में माथा टेकते है, सजदा करते है |
बच्चा जन्म लेने के कुछ महीने बाद माँ-माँ शब्द का उच्चारण करता है फिर बा-बा शब्द का लेकिन, ये माँ-माँ बा-बा शब्द आगे चल कर कानो में ध्वनि प्रदुषण फैलाते है ? माँ-बाप माथ पर “बोझ” के तरह लगने लगते है |
आज माँ बूढी होने के कारण सुन्दर नहीं दिखती है शायद इसलिए घर आए मेहमानों के सामने उसे आया का दर्जा देते है | लेकिन माँ जब शादी कर दुल्हन बन आई होगी तो कितनी सुन्दर दिख रही होगी ?
आज कल के जमाने में नई दुल्हन तीन-चार साल तक माँ नहीं बनना चाहती है | परन्तु पहले शादी होते ही माँ बाप बनने की इच्छा जग जाता था | आठमा महिना का आगे निकला पेट कितना भद्दा लगता है देखने में ? उपर से हर पल एक अजीब सा दर्द जो कभी-कभी लगता है, जेसे प्राण ही बाहर निकल जाए |
हम दो किलो का वजन कुछ देर के लिए उठा ले तो जान निकलने लगता है, और माँ ने पुरे नों माह पेट वाला थैला में अपना बच्चा को उठाये रखती है | यानि की पुरे 6480 घंटा क्या बीती होगी माँ पर ?
लेकिन माँ जानती है की ये 6480 घंटे का परिणाम बहुत ही सुखद होगा, तूफान अपने साथ सिर्फ बर्बादी ही नहीं लाता है वह नव-जीवन निर्माण का शक्ति भी लाता है, जो मनुष्य को साहस प्रदान करता है |
माँ बूढी होगी और बच्चा जवान होगा फिर वह माँ का वजन हसकर अपने कन्धो पर उठाएगा | लेकिन अब बेटे का नाम ‘राम’ या ‘श्रवण’ रखने से कोई फायदा नही ?
बेटा अगर अपनी पत्नी व बच्चों के ऊपर हजारों रुपया खर्च करे तो कोई फर्क नहीं पड़ता | और बूढी माँ थोड़ी सी दाल-चावल खाकर घर के किसी कौने में पड़ी रहेंगी तो, महिना का बजट बिगड़ जाएगा ? परन्तु माँ ने अपने पेट का बजट(खाना) बिगड़ कर कभी भी बच्चों के बजट(खाना, कपड़ा, पढ़ाई) को नहीं बिगड़ने दिया |
सच पूछिये तो बच्चा होने के बाद माँ-बाप कभी भी अपने सुख-सुविधाओं के बारे में नही सोचते है | कभी भी अपने बारे में बात नही करते है, वे दोनों जब भी बात करते है बच्चों के बेहतर भविष्य के बारे में बात करते है |
पति-पत्नी के जिन्दगी में दो ही पल ऐसे आते है जब वो अपने बारे में बात करते है — एक जब ओ दूल्हा-दुल्हन बनते है और दूसरा बूढ़े होने पर |
सच्चे मित्र वही होते है जो बुढ़ापे तक मित्रता को बनाये रखते है, और ऐसे मित्र पति-पत्नी ही हो सकते है| लेकिन एक अच्छे मित्र को बुढ़ापे में जुदा कर देते है ? माँ एक बेटा के पास तो बाप दुसरे बेटा के पास ? दोनों एक दुसरे को देखने के लिए कुछ मन की बात करने के लिए इस तरह अन्दर ही अंदर तडपते मानो पिंजरे में बंद पंछी ?
बेटा आज बड़ा होकर माँ-बाप को जीने का ढ़ंग(तरीका) सिखलाना चाहता है | आपको ये नही मालूम, आपको वो नही मालूम, बगैरह-बगैरह—| माँ बाप बिना मालूम किये ही साठ(60) बसंत देख लिए ?
आदमी अपने जिन्दगी में दो बार सबसे जायदा खुश होता है, जब उसे इच्छा अनुसार किसी चीज की प्राप्ति होती है या फिर किसी चीज से छुटकारा मिलाता है | माँ-बाप के मरने के बाद क्रिया-कर्म में लाखो रुपया खर्च करते है, चाहे जिन्दा में एक लोटा पानी भी अपने हाथ से पिलाया हो या नही ?
गाँव समाज के लोग भोज में खाना खाने के बाद बेटा से कहते है—कि ‘तुमने इतना बड़ा भोज का आयोजन कर माँ के दूध का कर्ज चूका दिया’| रिश्तेदार भी पास आकर कहते है–कि ‘माँ बूढी हो गई थी, अच्छा हुआ जो मर गई, तुम्हारे सर का “बोझ” हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म हो गया’ |
मगर ये “बोझ” कभी ना खत्म होने वाला है| एक दिन हम सब किसी (बेटा) के कंधा पर “बोझ” साबित होंगे ? और इतिहास खुद को दोहराएगा ?
अच्छा होता माँ-बाप को बोझ का संज्ञा न देकर भगवान समझ पूजते तथा अपना कर्तव्य सेवा ओ पुत्र धर्म का पालन करते ?

 

 

Anand Milan

                आनंद मिलन

             सिंघवाड़ा, दरभंगा

 

 

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