क्षण भर की दूरी – प्रणय कुमार

क्षण भर की दूरी – प्रणय कुमार

यह कहानी है कुनाल की, जो अपने सम्मलित परिवार की नींव है – जो संधर्ष की आंधियों में हौसलों की दीवार बन कर खड़ा है | परिवार में दो और भी लड़के हैं – राकेश और राजेश, यानि कि कुनाल के चचेरे भाई : इनकी पारिवारिक स्थिति कुनाल से काफी बेहतर है | ये कुनाल को नीचे स्तर का समझते हैं, मगर वे भी क्या दिन थे जब कुनाल ने दोनों भाइयों के ऊपर उठाने में नि:स्वार्थ मदद किए थे | कुनाल के दिल में अब भी दोनों के प्रति अच्छी भावनाएं हैं, मगर कभी – कभी उनदोनों का रवैया उसे निराश कर देता है | राकेश के पास अपनी एक कार है और राजेश बाहर नौकरी करता है |
एक दिन
अप्रैल का महीना था – दोपहर के बारह बज रहे थे | कुनाल किसी काम से बाहर जाने के लिए स्टेशन की ओर चला | राकेश ने उसे पैदल जाता देखा, मगर वह चुप रहा | कुनाल सड़क पर आगे बढ़ता गया | घर से स्टेशन तीन किलोमीटर दूर था | काफी धूप थी | कुनाल के माथे पर रेत चल रहे थे, कदम जैसे कोई रोक रहा था, कड़कती धूप आँखों को जला रही थी और ऊपर से उसका भरी बैग… बड़ी उम्मीद से उसने मुड़ कर पीछे देखा कि कोई गाड़ी आ रही है या नहीं : उस कड़कती धूप में सड़क काफी सुनसान थी | उसने अपने पाकेट से रुमाल निकाला और पसीना पोछ कर वह फिर आगे बढ़ा | अगले ही पल उसे एक हॉर्न की आवाज सुनाई दी | वह पीछे मुड़ा – तेजी से राकेश की कार उसकी ओर आ रही थी | कुनाल का मुहँ खुला का खुला रह गया | उसने याद किया कि राकेश ने उसे धूप में जाता देखा था, शायद इसलिए वह उसे छोड़ने के लिए उसकी ओर आ रहा है | कुनाल सोच में था कि उसे बैठना चाहिए या नही ? और अन्दर ही अन्दर खुश भी था – उस रफ़्तार से आती कार को देख कर : ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था |
कार उसके पास आने तक उसने सोच लिया था कि उसे बैठ जाना चाहिए , वे उनकी कितनी भी अवहेलना करें आखिर वे खून के रिश्ते से बंधे हैं | वह कार पर अपनी नजरें टिकाए खड़ा था | राकेश की कार उसके पास आकर रुकी – ड्राइव राकेश ही कर रहा था | कुनाल ने ख़ुशी से दरवाजा खोला और बैठ गया | कार आगे बढ़ी | कार में ए. सी. चल रही थी : उसका पसीना झटाक से सूख गया | वह लग्जरी सीट पर बैठा कुछ पल पहले खुद की दशा को याद कर रहा था – वह पसीने से लटपट था, उसके पाँव नहीं उठ रहे थे, धूप से उसकी आँखे जल रही थी, मगर अब सब खुशनुमा लग रहा था | उसके मन में कई ख्याल आ जा रहे थे – ” मैं कितना गलत था, सोचता था कि ये मुझे नीचा देखते हैं, मेरी अवहेलना करते है | आखिर हम भाई हैं और आज उसने यह फर्ज निभाया – मुझे कड़कती धूप में जाता देख आखिर उसे रहा नहीं गया…” वह उसकी गलतियों कि माँफ करता जा रहा था | सोचह रहा था कि मनुष्य तो एक गलतियों की कटपुतली है, उससे गलतियाँ तो हो ही जाती हैं | ऐसा कई बार हुआ था जब उन दोनों भाइयों के वजह से कुनाल को कभी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था, मगर आज वह सब भूल कर खुद को ही दोषी मान रहा था ।
उसे यह सब एक सुन्दर स्वप्न की तहर लग रहा था | वह इस ख़ुशी को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था – कार रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी | अब स्टेशन कुछ ही दूरी पर था | कुनाल ने देखा कि आगे रास्ते पर कीचड़ है, आखिर उसने कहा, ” आब गाड़ी यहीं रोक दो, मैं यहीं से आगे चला जाऊँगा और हाँ – शुक्रिया ! तुमने मुझे यहाँ तक छोड़ा | ” राकेश ने बिना एक पल गवाए कहा, ” मैं तुम्हें छोड़ने नहीं, बल्कि राजेश को रिसीव करने जा रहा हूँ | ” कार रफ़्तार से कीचड़ को चीरती हुई निकल गई ; कुनाल का मुँह फिर से खुला – उसे फिर से ख्यालों ने घेर लिए ।

प्रणय कुमार
कटिहार(बिहार)

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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