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Hindi Story: दांव-पेंच कहानी by विजय सिंह मीणा

Hindi Story: दांव-पेंच कहानी by विजय सिंह मीणा

उसने भैंस को जल्दी जल्दी सानी की । हाथ धोए और चबूतरे पर आ गया । खाट पर रखे गद्दे-रजाई को उलट पुलट कर देखा और कहा: “मेरो अंगोछा नांय मिल रहयो। तनिक देख तो कहां डार दियो।” सांवल ने पत्नी दुल्लो को पुकारा। “जे तो तुम्हारो आये दिन को काम हेगो । कहीं सगाई-सिक्का की बात करते करते भूल आये होंगे ।” दुल्लो ने हवा में हाथ नचाते हुए जवाब दिया । सांवल खुद ही झुंझलाते हुए घर के अन्दर गया और खोजबीन कर अंगोछा कंधे पर रख लिया। आज उसे गांव के हरि मास्टर के लडके के रिस्ते की बात करने जाना है । इसे सांवल का जुनुन कहें या उसकी दिनचर्या का हिस्सा, वह आए दिन अपने घर के कामो को भी छोडकर दूसरों के रिश्ते करवाने चला जाता है। अब तक वह सौ से भी अधिक रिश्ते करवा चुका है। इसके एवज में वह कुछ भी नहीं लेता बल्कि किराया भाडा भी अपनी जेब से ही खर्च करता है । इसे लेकर आए दिन दुल्लो से उसकी खटापटी होती रहती है लेकिन मजाल की इन बातों का उसके जुनुन पर कोई असर पडे ।

“आज कहां जाबे की तैयारी है रही है। तनिक अपने घर की भी चिंता कर लिया करो।” दुल्लो ने चूल्हा सुलगाते हुए कहा। ” मैं कहीं बाहर जाऊं तो टोकाटाकी मत किया करे।” सांवल ने बात को टालते हुए कहा । “तुमकू चुपरी रोटी खाबे की लत पर गई है । या सगाई- सिक्का के बहाने ते गाम-गाम जीवते फिरो , का बचै जामें तुमकू। मैं यहां अकेली काम धंधे में खटती रहूं और तुम घूमो दुनियां की ताबेदारी करते।” दुल्लो ने झुंझलाते हुए कहा ।

“तू ठहरी बारह मन की गंवार। दुनियांदारी को तो तोय कछु अतो-पतो है नांय। आस- पास के गांवो में मेरी कितनी इज्जत है? कोउ की हिम्मत नांय की मेरे काम की मना करदे” सांवल ने शेखी बघारते हुए कहा।

“सब जानूं , जे दान-दहेज में कछु ऊंच नीच है जावे तो जूत पनैया भी तुम ही खाके आओ। उपर ते इन सगाई वारेन की बैयर हमारे पूत- चीकला मारे सो अलग।” सुनकर सांवल झुंझला उठा। वह आज दुल्लो से अटकना नहीं चाहता था। फिर भी उसे चुप कराना तो जरुरी था आखिर वो ठहरा मर्द। एक औरत के तर्को से कैसे हार मान ले। “जब रात-दिना तेरे भाई के रिस्ता के काजै मैं भाग-दौड करतो रहयो वा टैम तो तैने एकऊ बार नांय पूछी कि कहां जा रहे हो? तब तो तू बडी आगे पीछे घूमती फिरती थी।” सांवल ने इस बात को थोडा ज्यादा जोर देकर कहा।

“मेरे भाई ने भी तो तुम्हारो मान-सम्मान राख्यो। तुम्हारे काजै पांचू कपडा दिए। उनकी क्या हौड करेंगे ये गुणमेटा जिनकी तुम सगाई करवाते फिरो।” दुल्लो ने उसे झडकते हुए कहा ।

“मान- सम्मान की बात मत करे। मेरी जेब ते पूरे दो हजार रुपैया को खर्चा भयो वा शादी में। नारियल, बतासे और दुल्हिन की चप्पल के काजे जो रुपैया मोते उधार लिए आज तक तेरे भैया ने नांय लोटाए। बकर-बकर लग रही है घंटा भर ते। अब ले लियो परसाद। अब तो राजी है।” सांवल ने दुल्लो के बिलकुल नजदीक आकर कहा ।

“तुम ते तो बात करबो ही बेकार है।” कहकर दुल्लो अपने काम में लग गई ।

सांवल मंद-मंद मुस्कराते हुए वहां से पाली गांव के लिए रवाना हो गया। “राम राम सांवल भैया। तुम्हारी ही बाट जोह रहे थे।” झब्बू ने खाट बिछाते हुए कहा। दौनो हुक्का गुडगुडाने लगे। झब्बू की लडकी ने बारहवीं पास कर ली थी और अब उसे उसकी शादी की चिंता सता रही थी।

“भैया हमारी लाली के लिए कोउ रिस्ता हो तो बताओ।”, तैने सही वकत पै बात चलाई है। नांगल के हरि मास्टर का लडका है। रेल्वे में नौकरी भी लग गई है। देखने में भी लडका मलूक है। आज ही वाते मेरी बात भई है।” सांवल ने कहा ।

“वाकी कहा आड-काड (मांग) है। दान दहेज के बारे में मुंह खोलो कि नांय।” झब्बू ने हुक्का गुडगुडाते हुए पूछा । “तेरो कितनो बौंत है।” मेरे पास तो कन्या और कलश है।” झब्बू ने विनम्र स्वर में कहा ।

“याते काम नांय चले भैया आज कल। अब तो सारी बातें खुले में तय हुयो करें। खाते पीते घर को लडका है। वाकी इज्जत तो रखनी ही पडेगी।” कहकर सांवल ने हुक्का नीचे रख दिया।

“अब सांवल भैया, वैसे तो कोउ भी अपनी नांक पै माखी नांय बैठबा देवे। एक ही तो लाली है अपनी। जी जान लगा दऊंगो। फिर भी बताओ उनकी क्या मांग-जांच है।”

“अब तू अपनो आदमी है। पांच लाख नकद और जेवर में मना लूंगो वाकू।” भाई जितनी चादर है उतने ही पैर पसारुंगो। दो लाख नकद , जेवर और जे कछु पानी-पात बसकी होयगो पा दऊंगो।”

“भैया इतने में तो आजकल रेल्वे के गैंगमैन की नौकरी वारे भी नांय मिल रहे। वो लडका तो रेल्वे में ड्राईवर है।” सांवल ने विस्तार से बताया।

“अब तू तो भैया जाने ही है मेरी स्थिति। बात करके देख लेओ। जैसे भी हो या रिस्ता कू करवा देवो। लाली के पीरे हाथ है जाएगे और मेरो भी वजन हल्का है जाएगो।” झब्बू ने याचना भरे स्वर में कहा ।

“ठीक है, मैं आज ही हरि मास्टर के ढिंग जाउगो।” कहकर सांवल वहां से चल दिया। वह सीधा हरि मास्टर के पास नांगल आया और रिस्ते की बात चलाई ।  मास्टर, एक ढंग को रिस्तो है। मोंडी (लडकी) ने बारहवीं कर लई है। शक्ल सूरत से हूर की परी लगती है। अपने लाला सुनील के संग सही जोडी जमेंगी।

“कहां ते है ?” हरि ने गंभीर होते हुए पूछा ।

“पाली गांव ते झब्बू की लाली है। लेकिन शादी थोडी हल्की करेगो। मनमें हो तो बात चलाउं।” सांवल ने हरि को टटोलते हुए कहा। सुनकर हरि थोडी देर खामोश बैठा रहा फिर बोला- ‘तू तो जाने ही है। 

मैं ज्यादा लोभ- लालच वारौ आदमी तो हूं नांय। मेरो तो एक ही सपनों है। बगल वारे रामचन्द के लडका को जैसो ब्याह हुयो है वाते नैक ज्यादा करवाय दे ।‘’

‘’ इतनो वजन तो नांय झेल पावेगो । ज्यादा से ज्यादा ढाई लाख नकद और जेवर कर देगो लेकिन लाली बडी मलूक है। तेरे पडौसी की बहू ते लाख गुना मलूक है ।‘’ सांवल ने अपने अनुभव का तीर छोडा ।

‘’ लाली मलूक है तो थोडो जोर लगवा वाते। या रिस्ता कू हम कर लेंगे ।‘’ हरि ने अपनी घाघ नजरों से सांवल को टटोला ।

‘’ हरि भैया, अब ना तो वाकी सी कहूंगो और ना ही तेरी सी। दोनो के बीच की बात कह दऊं ।‘’

‘’ बता भैया ।‘’

‘’ तीन नकद और जेवर तक वजन झेल सके। इसके उपर बिल्कुल नहीं ।‘’ सांवल ने दो टूक बात की ।

‘’ ठीक है। तू बात आगे बढा। जैसो तू कर लेगो मोय मंजूर है। तेरी बात कू पिटबे नांय दऊंगो ।‘’ हरि ने अपनी सहमति देते हुए कहा ।

सांवल का एक भाई है खूबी । पूरी तरह नाम के विपरीत । उसमे कोई खूबी नही सिवाय अवगुण के। नाटा कद , भूरी मूंछे और सिर से गंजा । दोनो भाई स्वभाव और प्रकृति से एकदम भिन्न । खूबी गांव मे आए शादी के रिस्तो को तुडवाने के लिए बदनाम था वहीं सांवल रिस्ते करवाने के लिए मशहूर। रिस्ते तुडवाने में खूबी अपनी जी-जान लगा देता। अपनी जेब से पैसा खर्च कर वह रिस्ता तुडवाने दूसरे गांवो मे पहुंच जाता था। उसके लिए गांव में एक कहावत मशहूर थी-

‘’ भुर मुछ्यो और मांजरो , सिर से गंजा होए । उसके साथ में जब चलो, जब हाथ में डंडो होए ।‘’

इन मामलो को लेकर आए दिन खूबी के गांव वालो से विवाद होते रहते थे लेकिन वह अपनी हरकतो से बाज नहीं आता था । उसे जैसे ही पता चला कि हरि मास्टर के लडके का रिस्ता करने वाले आज आने वाले है वह गांव से एक कोस दूर सडक पर जा बैठा । क्योकि बस वही तक आती थी । वह अपने सारे दांव पेंचो को लगाकर इस रिस्ते को तुडवाने की पूरी तैयारी के साथ यहां उन्हीं का इंतजार कर रहा था । बस आई और उसमें से चार- पांच आदमी एक साथ उतरे । खूबी ने ताड लिया कि ये रिस्ते वाले ही हैं । खूबी ने उनसे राम राम की । झब्बू ने सोचा शायद सांवल ने इसे हमें लेने भेजा होगा। वे उसके साथ पास ही बनी चाय की थडी पर बैठ गए । थोडी देर खूबी उनसे खेती बाडी के बारे में पूछता रहा । मौका देखकर उसने कहा- ‘’ साब मोय तो कछु ऐसो लगे तुम कहीं रिस्ते के लिए जा रहे हो ।‘’ खूबी ने बात की शुरुआत की ।

‘’ हां साब, नांगल गांव मे एक रिस्ते की बात करने जा रहे हैं ।‘’ झब्बू ने कहा ।

‘’ जहां तक मेरी जानकारी में है , नांगल मे तो कोउ ढंग को रिस्तो है नांय । वैसे कौन के मौंडा (लडका ) कै काजे जा रहे हो तुम ?’’ खूबी ने पासा फेंका ।

‘’ हरि मास्टर के मौंडा कै काजे जा रहे है । रेल्वे में नौकरी करतु है ।‘’  झब्बू ने उत्तर दिया ।

खूबी थोडी देर खामोश रहा । नाक भौं सिकोडने लगा और कहा- ‘’यूं तो साब रिस्ता ठीक है पण (परन्तु)?’’  इतना कहकर खूबी ने एक बीडी जलाई और उनकी तरफ बढा दी । पण लगाकर उसने उन्हें संशय में तो डाल ही दिया। रिस्ते के मामले में जहां किन्तु-परन्तु हुई कि समझो आधा मामला वही खतम।

‘’ पण कैसे लगा रहे हो भैया, कोई बात है तो सीधे बताओ। अभी तो बेटी बाप की है । हमने कौन सो रिस्तो कर ही डारो ।‘’ झब्बू ने उसकी तरफ खिसकते हुए कहा ।

‘’अब साब तुम हो सज्जन आदमी सो मेरो फर्ज है तुम्हें सारी बात बताबेको । या हरि मास्टर के बाप की भुआ उधड गई (किसी के साथ भाग गई ) थी । तब ही से परिवार कै बट्टो लग गयो। आगे आप की मर्जी । ‘’ खूबी ने अपना दांव खेला और किसी सिद्दहस्त कलाकार की तरह उनकी प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगा। वे सभी एक दूसरे का चेहरा देखने लगे। आखिर में झब्बू बोला – ‘’ भाई इसके अलावा और भी कोई बात है तो बताओ।’’

‘’ अब बात तो बहुतेरी है । कहने को तो दौनो बाप- बेटे नौकरी करते है लेकिन जब आदमी उल्टा चलता है तो नौकरी तेऊ पार ना परै। दोउ बाप-बेटा सट्टा और जुआबाजी के दलदल में फंस रहे हैं । इसी के चलते दुनियांभर को कर्ज है वाकै माथै । उसको चुकाने के चक्कर में ही तो वो दहेज की मांग करते हैं। अब तुम्हारी बसकी वाके कर्ज कू चुकाबे की होय तो वहां जाओ ।‘’ खूबी ने इस तरह से बात को पेश किया कि वे सभी पशोपेश में पड गए। उन्होंने आपस में कुछ सलाह मशविरा की और वापिस अपने गांव पाली चले गए। खूबी अपने मनसूबों में सफल रहा । आज उसके चेहरे पर देखने लायक खुशी थी ।

उधर सांवल और हरि मास्टर रिस्ते वालों का इंतजार कर रहे थे। जब शाम के पांच बज गए तो उन्हें चिंता हुई । ‘’ मैंने तोते पहले ही कही कि काऊ अपने आदमी कू सडक पै भेज देओ। जरुर किसी ने बिनकू वहीं ते कुछ लगा-दूतरी (चुगली) करके वापिस भेज दियो। मोय तो जा बात को पहले ही अंदेशो हो।‘’ सांवल का दिमाग तेज गति से दौड रहा था। परेशान सांवल ने इस घटना को अपनी बेइज्जती माना । उसने झब्बू के गांव जाकर उससे बात करना ही उचित समझा । वह सीधे वहां से पाली गांव गया। झब्बू उसे देखते ही गुस्से से लाल हो गया ।

‘’ क्यों रे सांवल, तू हमते कौनसे जनम को बदलो निकारबा चावे जो तूने ऐसा निकम्मा रिस्ता हमारे लिए बताया था ।‘’

‘’ बात का है। पहले मोकू बता तो सही। कौन बहन के मामा ने भडका दियो तोकू ।‘’ सांवल ने खाट पर बैठते हुए कहा ।

‘’ बू रिस्तो हमारे लायक कैसे है ? वाके बाप की भुआ भाग गई । उपर से दोनो बाप बेटा जुआ खेलें। कर्ज में पूरी तरह डूबे हुए है । क्या सोचकर हमें वहां फसाना चावे तू ।‘’

‘’ हद है गई भैया । कौन ससुरे ने कह दई तोते । ऐसो कछु नांय । अगर या बात में रत्ती भर भी सच्चाई होय तो मोकू जमीन में जिन्दो गाड दीज्यो ।‘’ सुनकर झब्बू थोडा शांत हुआ ।

‘’ तो का , तेरे गाम से सगरे झूठ बोल रहे हैं ।‘’

‘’ कौन हरामी के पिल्ला ने बावरो बना दियो तू? जरा मैं भी तो सुनूं।‘’

‘’ मोय तो कोऊ तेरे ही गांव को मिल गयो तुम्हारी सडक पै । वाके मुंह ते ही ये सब बातें सुनी । ‘’

‘’ कैसो लगो बू देखबे में ?’’ सांवल ने प्रश्न किया ।

‘’ कंजी आंख वारो ,नाटे से कद को गंजो आदमी हतो। पहले तो वाने हमकू  चाय पिलाइ फिर सारी बात विस्तार ते बताई थी ।‘’ सुनकर सांवल को समझते देर ना लगी ।

‘’ अरे बू हरामी तो खूबी हतो । वा ससुर को तो काम ही रिस्ते तुडवाबे को है । आये दिन गांव मे जूता खातो घूमे इन्ही बातों के चक्कर में । वाकी बात जैसे गधे की लात । वा ससुरे की खबर तो अब अच्छी तरह हरि मास्टर ही लेगो । भैया अब तू अच्छी तरह सोच ले । ऐसे कान को कच्चो रहो तो कबहू रिस्तो ना कर पावेगो। हरि मास्टर तो मेरी वजह सू तैयार हुयो । वाके काजै क्या कमी है रिस्तो की । छत्तीस रिस्ते पडे है । लेकिन तू चूक गयो तो देख ले ऐसो रिस्तो फिर नांय मिल रहो तेरी सात पीडी कू भी ।‘’ सांवल ने बात को साफ करते हुए कहा । सुनकर झब्बू शर्मिन्दा हुआ ।

‘’ भाई सांवल, ये तो गलती हो ही गई । अब तू दोबारा से मामले को शुरु कर । मैं पूर्णिमा

के दिन आ जाऊंगो ।‘’

‘’ ठीक है, कोशिस करके देखूंगो । लेकिन अब कोई तेरे ढिंग काट करबे कू आ जावे तो बिना जूते मारे मत छोडियो ।‘’ सांवल ने हिदायत दी और वापिस अपने गांव आ गया । अगले दिन सुबह हरि मास्टर को सारा मामला बताया । हरि मास्टर को खूबी पर बहुत गुस्सा आ रहा था । दो दिन बाद पास के ही कस्बे में हरि मास्टर को खूबी अक्समात टकरा गया । देखते ही मास्टर ने अपनी जूती निकाली और खूबी पर पिल पडा ।

‘’ ससुरे पनाहखोर , हमारी काट करते तोकू शर्म नांय आई ।‘’ मास्टर ने उसे जुतियाते हुए कहा । आस पास के लोगो ने बडी मुशकिल से उन्हे अलग किया । जाते जाते खूबी कह रहा था – ‘’

अब करके दिखैयो तू मोंडा को ब्याह। मैं भी देखूं कोन माई को लाल ब्याह करबे कू तैयार होवे ?’’ कहकर खूबी वहां से भाग लिया ।

खूबी ने अब ठान लिया कि चाहे जो हो अब मैं किसी कीमत पर भी हरि के लडके का रिस्ता उस जगह से तो नही होने दूंगा । वह रात- दिन उस पर नजर रखे हुए था । उसे यह भी पता चल चुका था कि सांवल ने दोबारा वहां जाकर बात ठीक कर दी है । इसी के चलते उसने अपने दोस्त

पेटला और नवल से सलाह की ।

‘’ भाई पेटला , मेरी इज्जत पै बन आई है । हरि मास्टर के मौंडा को रिस्ता पाली गांव ते कबऊ ना होनो चाहिए ।‘’ खूबी ने चेहरे पर उदासी लाते हुए कहा ।

‘’ बाते क्यों दुश्मनी पाल लई तैने ।‘’ पेटला ने प्रश्नसूचक दृष्टि डालते हुए कहा ।

‘’ का बताऊं भैया ? ससुरे ने भरे बाजार मेरी टांट में जूते मारे है ।‘’ रुंआसा सा होते हुए खूबी ने बताया ।

‘’ अच्छा । मौंडा की नौकरी की नौकरी लगते ही मास्टर हवा में उडबे लग गयो । वा बहन के मामा कू अब हम भी ऐसो सबक सिखाएंगे कि नानी याद आ जावेगी । तू चिंता मत करै । कब आ रहे हैं सगाई वारे ।‘’

‘’ या पूरणमासी की सुनी है ।‘

‘’ ठीक है, अब तू बैठ घर । मैं और नवल पाली गांव पहुंच के कुछ दांव खेलते है ।‘’ पेटला ने आश्वस्त करते हुए कहा ।

 

पूर्णिमा के दिन झब्बू अपने दो साथियों के साथ अपने गांव के बस स्टेन्ड पर आने वाली बस की इंतजार कर रहा था । उसे इस बस से नांगल गांव हरि मास्टर के यहां जाना था । उसी समय पेटला और नवल भी वहां जा पहुंचे ।

‘’ राम राम साब, का तुम याई गांम के रहबे वारै हो ।‘’ पेटला ने बात की शुरुआत की ।

‘’ हांजी । तुम्हारो कौन सो गांम है ।‘’ झब्बू ने पूछा ।

‘’हम तो भैया फतेहपुर ते आए है । हमारी लाली के लिए या गाम में कोउ नौकरी वारो रिस्ता हो तो बताओ ।‘’ पेटला ने झब्बू के नजदीक बैठते हुए कहा । ‘या गाम में तो साब कोउ नौकरी वारो मौंडा हत नांय । हमऊ अपनी लाली के लिए रिस्तो देखबे ही जा रहे हैं । तुम्हारी नजर कोउ हो तो बताओ तुम बताय देओ । तुम तो घने दिनां ते घूम रहे होंगे ।‘’ झब्बू ने अपना फेंटा ठीक करते हुए कहा ।

‘’ भैया तीन महिना तै घूम रहे हैं । कहूं तो नतो लग जाए , कहूं कुछ नई व्याधि बीच में आ जाए । एक जगह हमकू घर बार और लौंडा भी पसन्द आय गयो लेकिन वहां हमारी तकदीर हमें धोखो दे गई ।‘’ पेटला ने बात कुछ इस अन्दाज से बयां की कि झब्बू आगे की बात सुनने को उत्सुक हो गया ।

‘’कहा चक्कर परगो?’’

‘’ कहा बताए भाई । मौडा बढिया रेल्वे में नौकरी पै हतो और वाको बाप भी नौकरी वारो ही हो । वाकी जितेक दान दहेज की मांग थी वातै हम ज्यादा भी खर्च करिबे कू तैयार है गए ।‘’ पेटला ने कहा ।

‘’ तो फिर का बात की कमी थी ।‘’

‘’ हमने सगाई को भी दिन निश्चित कर डारयो । लेकिन दो दिन बाद ही हमें कोई अपने निजि आदमी ते पतो लग्यो की लडका तो लडकी कै काबिल ही नांय । हमने मौंडा के संगी-साथीन सू भी या बात की पूछताछ की। सभी ने यही बताया कि लडका तो नामर्द है ।‘’

‘’ अरे भैया ई तो बहुत बढिया भयो कि पहले ही सब कुछ पतो लग गयो नहीं तो लाली की जिंदगी खराब है जाती । कौन से गाम को हतो बू मौंडा।‘’ झब्बू ने पूछा ।

‘’ नांगल गाम के हरि मास्टर को मौंडा ह्तो साब ।‘’ सुनते ही झब्बू का सिर चकराने लगा ।

बस आई और पेटला अपने साथी के साथ उसमें बैठकर चला गया । वहां रह गए झब्बू और उसके साथी । उन्होंने बस छोड दी । झब्बू जडवत होकर वहीं बैठ गया । उसकी सोचने समझने की शक्ति जवाब दे रही थी । वह रह रहकर सांवल को कोस रहा था । मेरे साथ कितना बडा धोखा होने जा रहा था । ईश्वर ने बचा ही लिया । झब्बू वापिस अपने घर लौट गया । पेटला गांव मे आकर खूबी के पास गया ।

‘’ कह भैया, कहा डौल रहयो । ‘’ खूबी ने पूछा ।

‘’ ऐसो ईलाज करके आय रहो हूं कि या जनम में तो झब्बू कभी भी हरि मास्टर के रिस्ता करबे कू नांय आवे ।‘’ पेटला ने गर्व मिश्रित हंसी के साथ कहा ।

‘’ ऐसो कौन सो दांव खेल दियो भैया ।‘’ खूबी ने उत्सुकता से पूछा ।

‘’ मामलो ही ऐसो बन गयो कि आखिरी दांव ही खेलनो परयो ।‘’ सुनकर खूबी चहक उठा । ‘’ का कही फिर वाने ।‘’

‘’ या दांव के बाद वाके ढिंग कहबे कू का तूमडो बच्यो । वहीं सिर पकर कै बैठ गयो ।

वापिस अपने घर कू भाज लियो ।‘’ ‘’ ई तो भैया तैने मेरी लाज रखली । आज तो सगाई वारे की जगह कुत्ते ही जीमेंगे हरि मास्टर की दावत में ।‘’ खूबी आज खुश था । वह अपने मंसूबे में सफल हो गया था ।

उधर हरि मास्टर ने आज सारा इंतजाम कर रखा था । उसने सौ आदमी का खाना भी बनवा रखा था। उसके रिस्तेदार और मिलने जुलने वाले भी पहुंच चुके थे । वह बार बार सांवल से पूछ रहा था – ‘’ तीन बज गए। अभी तक सगाई वाले पहुंचे नहीं ।‘’ सुनकर सांवल इन्तजार करने को  कहता । आज इन्होंने सडक पर भी अपने आदमी बिठा रखे थे ताकि कोई सगाई को काट ना दे । इंतजार करते करते जब पांच बज गए तो सांवल समझ गया कि जरुर कोई गडबड हो गई । सारे गांव के सामने हरि मास्टर की बेइज्जती हो रही थी सो वह गुस्से से लाल हो रहा था । बार बार वह सांवल को अकेले में ले जाकर गाली बके जा रहा था ।

‘’ अब का कहेगो तू। हमारी तो नाक ही कटवा दी तुने ।‘’ हरि ने फुंफकारते हुए कहा ।

‘’ भैया , जरुर कोउ वाके गाम में ही पहुंच गयो। मेरी वा दिना पक्की बात है गई । मैं अबई जाय रयो हूं वाके गाम।‘’  सांवल का चेहरा उतरा हुआ था ।

‘’ अब सांवल ये तेरो आखिरी मौको है। अब सीधी बात मेरी इज्जत से जुड गई है । अब तू कैसे भी करके उसी रिस्ते को वापिस करवा नहीं तो अब तेरी खैर नहीं । तेरो गाम में रहबो दूभर कर दऊंगो। अब तू आं कर या चां कर रिस्तो बू ही होना चाहिए ।‘’ हरि ने खा जाने वाली नजरों से सांवल को घूरते हुए कहा ।

सुनकर सांवल वहां से चल दिया । हरि मास्टर का सारा इंतजाम व्यर्थ गया । बेईज्जती हुई सो अलग। सारे रिस्तेदार नाराज होकर चले गए । सांवल रात के आठ बजे झब्बू के पास पहुंचा । झब्बू ब्यालू कर हुक्का पी रहा था ।

‘’तू यहां पटैल बनके हुक्का गुडगुडाय रहो है । तोय का दूसरे की इज्जत को थोडो भी खयाल नहीं है । वहां सौ आदमी का खाना बेकार हो गया। वाको कौन जिम्मेवार है ?‘’ सांवल ने बैठते हुए कहा । झब्बू थोडी देर चुप बैठा रहा फिर बोला – ‘’ क्यों रे बिचोल्या की पूंछ, कितने रुपैया लिए है तैंने वा हरि मास्टर ते सगाई कराबे के ।‘’ झब्बू के चेहरे पर भी अब गुस्सा झलक रहा था ।

‘’ का बकवास कर रहयो है । आज तक कोऊ ससुर कह तो जा मेरे बारे में। काऊ की एक बीडी को भी दागी ना हूं । किराया तक अपनी जेब ते भुगतूं ।‘’ सांवल ने उसे फटकारते हुए कहा ।

‘’ तो फिर तोय क्या लोभ लालच दे दियो हरि मास्टर ने जो तू वाके नामर्द मोंडा की शादी करवायबे कू जमीन आसमान एक रह्यो है ।‘’ झब्बू ने आंखे तरेरते हुए कहा ।

‘’ को कह रोय ऐसे तोते । तनिक मैं भी तो देखूं वा ससुरे कू जो बिना हाथ पैर को इल्जाम लगा रहयो है । तू असली बाप को है तो अबई चल मेरे संग । मौंडा डाक्टरी करवायले । रत्ती भर भी कमी निकले तो मूंछ कटा दऊंगो ।‘’ सुनकर झब्बू थोडा सकपकाया । थोडा नरम पडा और कहने लगा- ‘’ भैया हमने तो कोउ सगाई वारे ते ऐसे ही सुनी थी । ‘’

‘’ ए बहन के मामा तू है कान को कच्चो । तोमें दौ पैसे की तो सौदी नांय और चल दियो मोंडी को रिस्तो करिबे । अब पंचायत जुरेगी तेरे गाम में। तैंने जो हरि मास्टर की बेइज्जती करी है और वाको जो खर्चा करवायो है बिन सब की भरपाई तोय करनी है ।  तैंने का हम चूतिया ही समझ

रखे है । काउ की इज्जत की परवाह भी नांय तोकू ।‘’ सांवल ने धमकी भरे लहजे में कहा । सुनकर झब्बू के दिल की धडकन बढ गई । वह दांए -बांए देखने लगा और कहने लगा- ‘’भैया सांवल, देख मैं हूं बेटी को बाप । सभी बात सोचनी परै । अब मोते बात ही ऐसी कह दी कि कोऊ बाप ऐसी जगह रिस्तो ना कर सके । मैं ठहरो अकल को आंधरो ।अब तू पंचायत की बात मति ना करे और कल सुबह मैं तेरे संग ही चलूंगो ।‘’ झब्बू घिघियाने लगा ।

‘’ तू पहले ये तो बता कि तोते मोंडा के बारे ई बात कही कोने ?’’

‘’ फतेहपुर के दो आदमी मिले थे ।एक लम्बे से कद को कारो सूम आदमी ह्तो और वाके संग में एक मोटे से पेट को हो । ‘’ झब्बू ने हुलिया बयान किया । सुनकर सांवल थोडी देर सोचता रहा । अपने अनुभव के संसार में डुबकी लगाता रहा और फौरन ही समझ गया कि वे पेटला और नवल थे ।

‘’ मैं तोय पिछली बार भी समझा के गयो । वे दोऊ वाई के भायेले थे जिसने तुझे पिछली बार भडकाया था । वे फतेहपुर के नांय मेरे ही गाम के है । ससुरे झूठो गाम को नाम बताकर तोय बेवकूफ बना गए ।‘’ सांवल ने खुसासा किया ।

‘’ भैया अब कैसेउ कर । तू ही संभाल या समस्या कू ।‘’

‘’ अब तो हरि मास्टर मुश्किल ही मानेगो । बू तो बार बार पंचायत की धमकी दे रहो है ।‘’ सांवल ने बात में और वजन डालते हुए कहा ।

‘’ ना भैया , ऐसो मति ना करो । जैसे भी हो बात कू सिरे चढावो । आज के बाद सिवाय तुम्हारे मैं नांय मान रहो काउ की भी बात ।‘’

‘’ अब तो एक ही तरीका है ।‘’ सांवल ने प्रश्नसूचक नजरों से झब्बू को देखते हुए कहा ।

‘’ बता भैया ।‘’

‘’ दान दहेज में पचास हजार और बढा दे । याई लोभ ते मैं संभाल लऊंगो मास्टर कू ।‘’ सांवल ने अपनी अनुभवी नजर उत्तर की प्रतिक्षा में झब्बू पर गडा दी ।

‘’ ठीक है भैया । और काऊ तो जैसे के हाथ पैर जोरुंगो । मोय मंजूर है ।‘’ सांवल ने रिरियाते हुए कहा ।

‘’ हमकू अबई चलनो परैगो। वाके रिस्तेदार और मिलबे- जुलबे वारे भी तो बुलाने परेंगे ।‘’

सुनकर झब्बू ने हां की और एक जीप उसने किराए पर कर ली। गांव के पांच आदमी साथ लेकर वे लोग हरि मास्टर के घर जा पहुंचे ।

‘’ मास्टर , जो व्यवस्था करनी होय करलै। सुबह सगाई करनी है ।‘’ सांवल ने कहा ।

‘’ सारो इन्तजाम तैयार है । दो- चार रिस्तेदार बुलाने है बिनके काजै मैं अबई लडके कू मोटरसाईकिल ते रवाना कर दऊंगो।‘’ हरि ने सारी बात साफ करते हुए कहा ।

‘’ सगाई तो चलो सुबह हो ही जाएगी लेकिन हमें उन आदमियों का भी पतो लगाबो जरुरी है जिन्होंने झब्बू के पास जाकर लगाई – बुझाई करी ।‘’ सांवल ने सुझाव दिया ।

‘’ फिर बता कहा करनो है ?’’

‘’ तू सुबह जल्दी जाकर पेटला और नवल कू भी न्यौता दे अईयो । मोय तो उन्हीं को भैम है । वे यहां आएगे तो झब्बू ते कहके हम सच्चाई को पतो लगाय लेंगे । बिनते कहना कि सगाई वारे भरतपुर ते आ रहे है। पाली गाम मत बतईयो।‘’ सांवल ने योजना को आखिरी रुप देते हुए कहा । सुबह होते ही सबसे पहले हरि मास्टर पेटला और नवल के पास पहुंच गया ।

‘’ भैया तुम दोउ को आज मेरे घर ते न्योता है ।‘’

‘’ क्या बात है हरि भैया, सवामनी है या जागरण ।‘’ पेटला ने पूछा ।

‘’ मौंडा की सगाई है रही है ।‘’ सुनते ही पेटला हकबकाया । उसने पेट की गैस निकाली और बोला-

‘’ कहां ते है रही है ?’’

‘’ भरतपुर के आय रहे हैं ।‘’

‘’ हमने तो पहले कोउ पाली गाम की सुनी हती ।‘’ नवल ने प्रश्न किया ।

‘’ वहां ते तो कोउ ने लगा- बुझा के काट दई ।‘’

‘’ का जमानो आगो भैया , ऐसे बुरे काम करते ससुरेन कू शरम ना आवे ।‘’ पेटला ने कहा ।

‘’ ठीक है भैया , अब मैं चलूं । तुम नैक टैम ते ही आ जईयो । भरतपुर ते आबे वारैन कू तुमकू ही संभालनो है ।‘’ कहकर हरि वापिस अपने घर चला गया ।

उसके जाने के बाद पेट्ला और नवल दोनो सलाह करने लगे कि वहां चलकर सगाई वालों को उसी प्रकार बहका देंगे जैसे पाली वाले बहका के भगा दिए थे। इसी विचार से दोंनो वहां दस बजे पहुंच गए । हरि मास्टर के घर सारा गांव एकत्रित हो चुका था । उसके रिस्तेदार भी पहुंच गए थे । पेटला और नवल वही जाजम पर बैठ गए । वे मौका देख रहे थे कि कैसे सगाई वालो से मिला जाए । सगाई वाले हरि के घर अन्दर थे जहां कुछ रिस्तेदार भी उनके साथ बैठे थे । सांवल खडा हुआ और सारे गांव के सामने कहने लगा – ‘’ सगाई तो बाद में होवेगी पहले इस बात की जांच होनी चाहिए कि हमारे गाम के कौन आदमी ने पाली गाम पहुंचकर लगाई – बुझाई की । ऐसे गुन्डान ते गाम की भी बदनामी है रही है ।‘’ सांवल ने सुझाव दिया ।

‘’ तो या बात को पतो कैसे लगे । कोऊ आंखन देख बारो तो हत नांय ।‘’ पेटला ने कहा ।

‘’ वाउको इंतजाम है जाएगो । थोडो सबर कर ।‘’ सांवल ने मुस्कराते हुए कह।

‘’ भैया, अपने गाम को कोउ ना कर सके ऐसे लगा- दूतरी । ई तो कोउ बाहर वारै की चाल  है ।‘’ मौका देखकर नवल बोला ।

‘’ सही कही है । अपने गाम को होतो तो बू तो सगाई कटवायबे इन भरतपुर वारैन के ढिंग भी जातो ।‘’ पेटला ने नवल की बात का समर्थन करते हुए कहा ।

‘’ हो सके इनके ढिंग भी पहुंचो होय ।‘’ सांवल ने पेटला पर नजरें जमाते हुए कहा।

‘’ इनके ढिंग कोऊ जातो तो ये ना आते यहां । फिरऊ पूछबे में का हरज है । एक बात और है सांवल भैया, तू है या रिस्ता में बिचोल्या । तेरी जिम्मेवारे बनै कि भरतपुर वालो को सब कुछ खुलकर बतादो । बू पाली गाम ते जो रिस्ता टूटो है वा बात कू भी मत छिपाओ । दो दिन के जाये कहीं ये कहें कि हमते बात छिपाई ।‘’ पेटला ने यह बात जानबूझ कर इसिलिए रखी थी कि सगाई छूटने की बात सुनकर शायद ये भी वापिस लौट जांए।

‘’ चिंता मरि करै । थोडी देर में ही तेरे सामें ही दूध को दूध और पानी को पानी है जाएगो।‘’  सांवल ने कहकर एक कुटिल मुस्कान के साथ पेटला को घूरा ।

‘’ तो फिर हाथ कंगन को आरसी क्या? बुला इन भरतपुर वालो को सब कै सामें पूछ ले कि इनके पास भी कोई गयो क्या ?’’ पेटला ने व्यंगात्मक लहजे में कहा ।

इतने में ही झब्बू और उसके साथी भी जाजम पर आ बैठे । उन्हें देखते ही पेटला और नवल की दिल की धडकन तेज होने लगी । वे नीची गर्दन कर जाजम पर ही बैठे रहे ।

‘’ कह भाई झब्बू, कौन ने काट करी तोते गाम जाके । पहचान इनमें ते ।‘’ सांवल ने कहा ।

झब्बू ने एक नजर सभी गांव वालो पर डाली और भीड में बैठे पेटला और नवल का हाथ जा पकडा ।

‘’ मेरे ढिंग ये दोऊ पहुंचे थे साब । इन्हीं के चक्कर में मेरी मति मारी गई थी ।‘’ इतना सुनते ही गांव वाले उन दोनो पर पिल पडे । नवल और पेटला जूतों की मार खाकर लहू-लुहान हो गए । सांवल ने आकर उन्हें बचाया और पूछा- ‘’ ससुरे , तो जैसे हमने पैदा कर कर के छोड दिए । तू हमीं पै अपने दांव-पेच चलाय रहयो है । अब पतो लग्यो ये कौनसो दांव है ? ये है आखिरी दांव । जिंदगी में याद रखना जो तूने लगाया था वह आखिरी दांव नहीं था । आखिरी दाव वही होता है जिसमें तेरी तरह इतनी जूते पडे कि गिनना मुशिकल हो जाए ।‘’ सुनकर पेटला और नवल नीची गर्दन किए वहां से चलने को हुए इतने में ही हरि मास्टर ने उनका रास्ता रोककर कहा-

‘’ जूते तो तुमने काफी खा लिए अब दावत भी खा के जईयो ।‘’ सुनकर लोग ठठाकर हंसने लगे ।

अपना सा मुंह लेकर दोनो ऐसे चले जा रहे थे जैसे कोई मुर्दा फूंक कर जा रहे हों ।


लेखक जीवन परिचय

 Vijay Singh Meenaनाम:- विजय सिंह मीणा (Vijay Singh Meena)

जन्म तिथि: – 01 जुलाई 1965

जन्म स्थान: ग्राम-जटवाड़ा, तहसील-महवा, जिला-दौसा, राजस्थान

शिक्षा: – एम. ए. (हिंदी साहित्य), राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

सेवाएं: – केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो, नई दिल्ली एवं केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली मे पदासीन रहे।

संप्रति:- उप निदेशक (राजभाषा), विधि कार्य विभाग, विधि एवं न्याय मंत्रालय, शास्त्री भवन, नई दिल्ली ।

प्रकाशित रचनायें: – विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मे कहानी, कविता व लेख प्रकाशित तथा विभिन्न साहित्यिक व

सम-सामयिक विषयों पर आकाशवाणी एवम दूरदर्शन से वार्तायें प्रसारित ।

(1) सिसकियां — — – पहला कहानी संग्रह

(2) रहना नहीं देश बिराना है … दूसरा कहानी संग्रह

अभिरूचियाँ: – प्राचीन ऐतिहासिक एवं पुरातत्व महत्त्व के स्मारकों एवं स्थलों का भ्रमण.

संपर्क:- – ई-30-एफ ,जी – 8 एरिया , वाटिका अपार्टमेट ,एम आई जी फ्लेट,

मायापुरी , नई दिल्ली 110078

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4 thoughts on “Hindi Story: दांव-पेंच कहानी by विजय सिंह मीणा”

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