दोषी कौन-नुजहत राना रूही

दोषी कौन-नुजहत राना रूही

माँ आज हज़ के लिए जाने वाली है । यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है मुसलिम समाज के लिए ।यह एक ईमान का एक सतुन है ।इसलिए घर में बहुत चहल-पहल और दौड़-भाग है ।हर कोई जानेवाला और रिश्तेदार मिलने के लिए आ रहे हैं । पाँच दिनों से यह घर लोगों से खचाखच भरा है। लोग एक के बाद एक मिलने के लिए आते ही जा रहे हैं ।बहू है जो हर एक आने वाले के लिए नाश्ता-पानी का प्रबंध कर रही है । लोगों का स्वागत्-सत्कार कर रही है।माँ बहुत बूढ़ी हो चली है । अस्सी के आसपास उम्र होगी उसकी ।पर शारीरिक रूप से स्वस्थ है । अंदर ही अदंर से बहुत पुलकित है कि उनके बेटों ने उसकी मनोइच्छा को पूरी करने की व्यवस्था आखीर कार ही दी ।
करीब छः महिनों से वह नराज होकर घर छोर दूर जा बैठी थी ।घर पर तो केवल वह और उसकी एक अनवैवाही एक बेटी रहती है ।उसका बड़ा बेटा अलग घर में अपनी पत्नी के साथ रहता है । पति के गुजरे वर्षों हो गए है । दो बेटे विदेशों में काम कर रहे हैं । उनकी ही कमाई से यह सपना सफल हो पाया है । बहू इस अवसर पर ही घर आई है । कभी-कभी वह अपने बच्चों के साथ घर का चक्कर लगा जाती है । तो ऐसा है उस माँ का परिवार ।इस परिवार में माँ-बेटी में किसी बात पर कहा सुनी हो गई । तब वह श्वेत आदर्श की मुर्ति बनी माँ अपनी बेटी को निश्हाय अवस्था में अकेले छोर कर चली गई ।घर में वह अकेली सुनसान न खाना न पानी । कोई देखने वाला नहीं ।बड़े भाई को कोई परवाह नहीं वह तो अपनी दुनिया में खुश है । अकेले उसने बड़ी कठिनाइयों में दिन काटे ।इस अकेलेपन बोझ वह लड़की ही अच्छी तरह समझ सकती है जो इस समाज में अवैवाहित छूट जाए ।वैसे भी विवाह न होने की पीड़ा कम है क्या ? पैसे तो विदेश में रहनेवाले बेटे माँ के बैंक एकाउनट में भेजते रहे ।उन्हें तो इस बात कोई पता ही नहीं । किसी ने उन्हें खबर ही नहीं दी । वह बेचारी करे तो क्या करे ।पर यह उसके अच्छे कर्म थे कि उसे थोड़ी दौड़- भाग के बाद एक छोटी पराइभेट स्कूल में नौकरी मिल गई । न मिलती तो न जाने उसका क्या होता ? वह तो भुख से तरप-तरप के मर ही गई होती ।
अब छः माह बाद माँ वापस घर लौटी है । क्योंकि यही से उसे हज़ के लिए निकलना है।वह लड़की भी वही है पर सबसे अलग। खामोश अपने में गुमसुम सी ।बहू समाज के सामने माँ की सेवा करने का ढोंग कर रही है । बड़ा बेटा भी माँ के आगे पिछे कर रहा है ।शायद इस आशा से कि वह आनेवाले लोगों को देखा सके की वह माँ कितना ख्याल रखता है ।
आज घर से रवाना होना है ,इसलिए घर रिश्तेदारों और आसपास के जानेवाले लोगों से भरा है । सभी पूछ रहे है हाय बेटी क्यों नहीं दिखाई पड़ रही है ? वह कहाँ है ? कोई कह रहा है कि बूढ़ी माँ है, किसको क्या पता वही मरखपा गई तो ? बेटी को माँ से जाते समय मिल लेना चाहिए था । हर लोग अपनी-अपनी राय इस मामले में दे रहे थे । बहू भी इस मौके का फायदा उठाते हुए कह रही थी ‘इसके कारण ही तो मैं यहा नहीं रहती हूँ ।’ बेटी की अनुपस्थिति एक विराट शून्य था लोगों के लिए । सभी की सहानुभूति माँ और बहू के प्रति थी ।बेटे की कर्त्तव्य निष्ठा के गुनगान हो रहे थे । लोग रस ले-ले कर बातें कर रहे थे ।
पर इस घर का मुक सदस्य सारी सच्चाइयों को अच्छी तरह जानता है । य़ह दिवारे चिखचिख के यह कहना चाह रही थी कि दोषी कौन ? बेटी? माँ? बड़ा बेटा? या समाज दिखावटी मापदण्ड? मुझे समझाओ ।

         नुजहत राना रूही

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