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* दोस्त की अमूल्य-भेंट*-अखिलेश-श्रीवास्तव

आनंद के प्रेम विवाह करने के कारण उसके परिवार वाले एवं ससुराल वाले उससे नाराज थे I आनंद एवं उसकी पत्नी नीलम ने एक छोटा किराये का मकान लेकर अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत की एवं सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए भविष्य की योजनाओं पर सोचते रहते ,धीरे धीरे समय बीतता जा रहा था I आनन्द वकालत करता था परन्तु उसकी पत्नी हमेशा आनंद से कहती रहती ,कि मुझे आगे पढ़ना है ,मैं बी.-एड कर लेती हूँ ,ताकि आगे स्कूल टीचर की नौकरी कर लूंगी ,नीलम कि बात से आनन्द भी सहमत था Iआनंद ने एक प्राइवेट कालेज में नीलम के नाम से बी.एड. कोर्स के लिए आवेदन फॉर्म भर दिया , कालेज से नीलम को बी.एड कोर्स में प्रवेश हेतु सूचना पत्र भी आ गया, आज दोनों बहुत खुश थे ,परन्तु मन ही मन दोनों को एक चिंता सता रही थी , कि दूसरे ही दिन कालेज की फीस के पांच सौ रूपये जमा करना थे I आनद सुबह तैयार होकर कोर्ट जाने से पहले नीलम से बोला चिता मत करो भगवान के उपर छोड़ दो भगवान ही कुछ न् कुछ करेंगे ,आनंद इसी चिंता में विचार करते करते कोर्ट पहुच गया Iआनंद कोर्ट में बैठा था तभी उसका दोस्त भूषण आया और आनंद के पास बैठ गया ,रोज की तरह भूषण ने आनद से बात करनी चाही परन्तु आनंद ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया ,तभी भूषण ने आनंद से कहा क्या बात है ! तुम तो कभी इतने चुप नही रहते हो मुझे बताओ ,आनंद ने अपनी समस्या भूषण को बताई I आनन्द ने भूषण को बताया कि तुम तो जानते ही हो मैं अपने घर एवं ससुराल से कोई सहायता नहीं लेता हूँ.तब भूषण ने आनंद से कहा मेरे साथ कालेज चलो उसने आनंद को अपनी गाड़ी मे बिठाया और कालेज ले गया , कालेज पहुंच कर उसने नीलम कि फीस के पांच सौ रूपये जमा कर दिएI Iभूषण ने आनंद से कहा कि तुमने मुझे आज बहुत दुखी किया ,आनंद तुम मेरे से अपनी इतनी सी बात क्यों छुपा रहे थे,क्या तुम मुझे इस लायक भी नहीं समझते ! आनंद ने भूषण से कहा नहीं दोस्त ऐसा नहीं, ठीक है मैं अपनी गलती स्वीकार करता हूँ I एक वेर्ष का समय बीत गया ,नीलम ने बी .एड. कि परीक्षा पास कर ली इस बीच आनंद ने भूषण को कई,बार उसके पांच सौ रूपये देने कि कोशिश कि परन्तु भूषण ने नहीं लिए, यही कह देता कि जब मुझे जरुरत होगी ले लूँगा ,आनद ने भूषण से कहा कि तुम्हारी भाभी (नीलम ) कई बार पूछ चुकी है कि भूषण भैया घर नहीं आते उनसे घर आने कहियेगा ,आनंद ने यह बात जब भूषण से कही तो भूषण ने आनंद से कहा, नहीं दोस्त मैं तुम्हारे घर इसलिए नहीं आता हूँ कि ,कहीं भाभी जी ये न सोचें कि मै अपने पैसे वापस लेने आ गया I
भूषण की सरकारी नौकरी लग गई और वह दूसरे शहर चला गया जाते जाते आनंद को यह कह कर गया कि मेरे पैसे भाभी जी को मेरी और से सप्रेम भेंट है ,और भाभी माँ के समान होती है और माँ को दी हुई भेंट कभी वापस नहीं ली जाती I समय बीतता गया, नीलम की एक स्कूल में शिक्षिका की नौकरी लग गई I आनंद और नीलम दोनों अब खुशी- खुशी अपना जीवन निर्वाह कर रहे हैं I
आनद और नीलम आज भी अपनी जिंदगी की उस अमूल्य भेंट को नहीं भूले हैं I

                                                                          लेखक :--अखिलेश श्रीवास्तव 

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akhilesh-shrivastava

akhilesh-shrivastava

में जबलपुर मध्य प्रदेश में एडवोकेट हूँ में वकालत का कार्य कर रहा हूँ , इसके साथ ही मेरी पत्रकारिता में भी रूचि है, मैं पत्रकारिता में स्नातक हूँ पत्रकारिता के साथ -साथ मेरी रूचि लेख एवम कविता लिखने में भी है |

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