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दशहरा पर विशेष लघुकथाःः पुतले का सदुपयोगःः-वीरेंद्र देवांगना

दशहरा पर विशेष लघुकथाःः
पुतले का सदुपयोगःः
जब आरक्षण-विरोधियों को लगने लगा कि केवल जमघट, नारेबाजी, जुलूस और घरना-प्रदर्शन से काम नहीं चलनेवाला, तब वे गृहमंत्री का भारी-भरकम पुतला बनाकर चैराहे पर लटका दिए और शाम ढलने का इंतजार करने लगे, ताकि उसे जलाकर विरोध-प्रदर्शन को असरदार बनाया जा सके।
भला हो राजनीति का, जो कभी-कभार अच्छे काम भी कर लिया करती है। एक छुटभइये ने पुतला-दहन के पूर्व प्रशासन को फोन लगा दिया कि गृहमंत्री के पुतलादहन से विरोधी विचारधारा के लोग परस्पर भिड़ सकते हैं। क्षेत्र में दंगा-फसाद और उपद्रव भड़कने का अंदेशा हो सकता है, तो पुलिस-प्रशासन के कान खड़े हो गए।
पुलिस-प्रशासन ने क्षेत्र में घारा 144 लगाकर भीड़ को लाठी-डंडे से खदेड़ दिया और गृहमंत्री के पुतले को अपने कब्जे में ले लिया।
एएसपी ने एसडीओपी को आदेश फरमाया, ‘‘इस भीमकाय पुतले को म्युनिसिपिलैटी की गाड़ी में ढूंसकर मोहनगंज थाने के ओसारे में पटकवा दो।’’
पुलिस थाने में पड़े इस पुतले को लेकर पुलिस के सम्मुख यह समस्या उठ खड़ी हुई कि इस विशाल पुतले का किया क्या जाए? उसे वे स्वयं जला नहीं सकते थे? जलाते हैं, तो उनपर एक मंत्री के पुतला-दहन का आरोप मढ़ा जा सकता है कि पुलिस ने गृहमंत्री से किसी जनम की शत्रुता निकाल ली है।
ऐसी खबरें पत्रकारों के लिए चटखारे से कम नहीं हुआ करती। वे इसमें नमक-मिर्च लगाकर परोस सकते हैं, जो विभागीय बदनामी का कारण बन सकता है।
वे इसका चीरफाड़ भी नहीं सकते; क्योंकि पुतला आन रिकार्ड हो गया था। उसको रोजनामचे में जब्ती बताया जा रहा था। कुल मिलाकर थानेदार के लिए समस्या विकट हो गई थी। वह मामले का निदान करवाने के लिए आलाधिकारियों के कान में डाल देना उचित समझ रहा था।
थानेदार ने एसपी को पत्र लिखा और प्रतिलिपि एसडीओपी को भेजा। किंतु, एसपी व एसडीओपी साहब भी इसपर कोई निर्णय ले नहीं सके। मामले को थानेदार ने कई बार पुलिस अधिकारियों की बैठकों में भी उठाया कि पुतला थाना परिसर में प्रदर्शनी बना हुआ है। उसका क्या किया जाए? कृपया मार्गदर्शन दें।
लोग कौतूहल से थाना में उसे देखने आ रहे थे कि नौटंकीबाज सियासतदान पुतलों को कैसे बनाते हैं और गाहे-बगाहे उसको आग के हवाले करते रहते हैं?
एक दिन उस थाने में राज्य के पालकमंत्री का दौरा हुआ, जो विपक्षी पार्टी का था। उन्हें जब पता चला कि पुतला जहां थाना परिसर के सौंदर्य को बिगाड़ रहा है, वहीं काफी जगह घेरकर पड़ा हुआ है, तो उसके कान खड़े हो गए।
वह अपने पार्टी के कार्यकर्ताओं को बुलाकर बोला, ‘‘भइया, इसे दशहरा समिति को दे दो। वे इसमें नौ सिर, रावणी मंूछे, यक्कू टाइप भौंहें, एक हाथ में भाला, दूसरे में चंद्रहास खड्ग और कांघे में तीर-धनुष लगाकर रावण-दहन कर देंगे।’’
फिर उन्होंने थानेदार की ओर मुखातिब होते हुए कहा, ‘‘हुआ न झंझट खत्म। ना लिखा-पढ़ी, ना आदेश-निर्देश। न रहेगा बांस, न बजेगी बासुंरी।’’
थानेदार खुश कि फैसला हो, तो ऐसा? वह भी तुरत-फुरत। न लाग, न लपेट। थानेदार घाट-घाट का पानी पीया हुआ था। उसने आननफानन में नोटशीट में मंत्री के पीए का आदेश इसलिए ले लिया, ताकि भविष्य में उसपर कोई आरोप न लगे और उसमें ‘राइटआफ’ लिखवा दिया।
इधर, दशहरा समिति की बांछें खिल उठीं कि उन्हें मुफ्त में ‘रावण’ मिल गया। खिलता भी क्यों नहीं, उनका रावण बनाने का खर्चा, जो बच गया था।
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विशेष टीपःः लेखक की ई-किताबों का अध्ययन amazon.com/virendra dewangan के माध्यम से भी किया जा सकता है।

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