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गम-ए-विरह-बलकावी-जय-जितेंद्र

एक तरफ जाने का दुःख है।
वहीं न आने का गम है।।
एक तरफ भरी महफ़िल में वो सजी खड़ी है।
वहीं तन्हाई में बैठे हम है।।

उसके घर में लोगों का पहरा होगा।
उसके सहजादे के सिर पर सेहरा होगा।।
यहाँ गम की कश्ती में डूबता हुआ नज़ारा होगा।
वहाँ खुशियों के साथ खिलता हुआ सबेरा होगा।।

यहाँ हम उसकी यादों में रो रहे होंगे।
वहाँ वो अपने शौहर की बाहों में सो रहे होंगे।।
यहाँ हम गम-ए-विरह में जनाजा सजा रहे होंगे।
वहाँ वो शादी की साल गिरह मना रहे होंगे।।

   ~बालकवि जय जितेन्द्र
     रायबरेली (उत्तर प्रदेश)

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