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गिफ्ट (कहानी)

फरवरी का मौसम था। पसीने में भीगी टीशर्ट पहने विकास हड़बड़ाहट में जल्दी जल्दी अपने बैग को पैक कर रहा था। उसे अपने हुलिया की कोई फ़िक्र ना थी।
उसके कपडे मिटटी में सने थे और एक जूते का फीता भी खुला हुआ था। कोहनी पर कुछ खरोंच भी थी लेकिन उसे दर्द महसूस नही हो रहा था।
हड़बड़ाहट में उसने जल्दी जल्दी गंदे कपड़ो के ऊपर ट्रैक सूट पहनना शुरू कर दिया।
उसने उल्टा सीधा ट्रैक सूट पहना आधी टीशर्ट लोअर में दबी थी आधी बाहर लटक रही थी पर उसे इससे क्या मतलब वो किसी और दुनियाँ में खोया हुआ था।
कपडे पहनने के बाद उसने जेब से चाबी निकली और जैसे ही मोटरसाइकिल में चाबी लगाने को हुआ वैसे ही चाबी नीचे जमीन पर गिर पड़ी। शायद उसके हाँथ काँप रहे थे।
हड़बड़ाहट में उसने फिर चाबी उठाई इस बार चाबी उठाकर सीधा नही हो पाया था की चाबी फिर उसके हाँथ से छूटकर जमीन पर गिर पड़ी
उसे गुस्सा भी आ रहा था मगर यह गुस्सा करने का समय नही था।
विकास ने गहरी साँस लेकर तीसरी बार चाबी उठाई और मोटरसाइकिल में लगा कर स्टार्ट करने लगा
तभी उसकी नजर जमीन पर पड़े अपने बैग पर पड़ी उसने जल्दी से मोटरसाईकिल खड़ी की अपने अतरिक्त कपड़े और पानी की बोतल को कबाड़ की तरह उल्टा सीधा बैग में भरकर जल्दी से मोटरसाइकिल स्टार्ट करके वहाँ से तेज रफ़्तार में निकल गया।
अभी उसको सोलह किलोमीटर दूर जाना था।
वह बार बार अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देख रहा था।चार बज चुके थे। पाँच बजे उसे कही जाना था
अभी पाँच किमी दूर ही चला होगा की रेलवे क्रासिंग आ गयी उसे बहुत गुस्सा आ रहा था जिसकी बजह से वो बार बार बाइक की टंकी पर घूंसा मार रहा था।
दस मिनट बाद क्रासिंग खुली बहुत जाम लगा था जैसे तैसे जाम से निकला और चैन की साँस ली तभी उसे कुछ याद आ गया और वो गुस्से में हाँथ झटककर बोला  ओह गॉड शिट…
क्योंकि आगे सड़क बन रही थी।
गिट्टी, पत्थर से होते हुए किसी तरह वो सड़क पर पहुँच ही गया।
इस दौरान विकास बार बार घड़ी देख रहा था और उसकी मोटरसाइकिल भी हवाओ से बाते कर रही थी।
आखिरकार वो अपने घर पहुच ही गया
शायद चार बजकर पैंतालीस मिनट का समय रहा होगा उसने गंदे कपडे जल्दी से उतार फेके और बाथरूम में जल्दी जल्दी से उल्टा सीधा साबुन लगाकर नहाने लगा
उसने भीगे बालों भी तौलिये से साफ़ नही किये और नए कपडे पहने लगा।
अभी उसने शर्ट की बटन भी नही लगाई थी कि पेंट पहनने लगा पेंट में लगी बेल्ट साँप की तरह लटक रही थी। अभी उसने पैंट शर्ट ठीक से नही पहना था कि जूते पहनने लगा उल्टे सीधे फीते बाँधे पहले से पैक किया हुआ गिफ्ट उठाया और बगल में दबाकर दौड़ते हुए बटन लगाने लगा।
जल्दी से मोटरसाइकिल स्टार्ट की और चल दिया जैसे ही चला उसे अजीब सा लगा उसकी मोटरसाइकिल बहक रही थी
उसने देखा पहिये में हवा नही है शायद पंचर हो गयी होगी या किसी बच्चे ने शरारत में इसकी हवा निकल दी होगी। उसने सोचा जब तक इसे ठीक कराऊँगा तब तक देर हो जायेगी इसलिए वो मोटरसाइकिल घर पर ही छोड़ कर  टैक्सी की तरफ भागा।
इत्तेफाक से उसे टैक्सी भी लगी हुई मिल गयी अब विकास ने आँखे बंद करके चैन की साँस लेते हुए कहा ‘थैंक्स गॉड’
टैक्सी पर बैठा बार बार घड़ी देख रहा था अब चार बजकर सत्तावन मिनट हो चुके थे
वो अंदर ही अंदर झल्ला रहा था अचानक टैक्सी रुक गयी उसने बाहर झाँककर देखा रेलवे क्रासिंग लगी थी।
वो जल्दी से उतरा और पूछा कितने हुए टैक्सी वाले ने पाँच रूपये बताये उसके पास छुट्टे नही थे उसने दस रुपये का नोट दिया तो टैक्सी वाले ने कहा पाँच रु छुट्टे दो विकास ने एक बूढे व्यक्ति की और इशारा करते हुए कहा पाँच रु इनके काट लेना।
अब वो जल्दी जल्दी पैदल चलने लगा। आधा किलोमीटर का रास्ता बचा था लेकिन पाँच बज चुके थे
उसने दौड़ना शुरू किया डेढ़ दो मिनट लगे होंगे उसे रेस्टोरेंट पहुँचने में वहाँ पहुँचकर विकास ने एक बार फिर गहरी साँस ली और इधर उधर देखने लगा।
उसकी आँखे जिसे खोज रही थी वो कहीं भी नही दिखी उसे
मायूस होकर वो एक कुर्सी पर बैठ गया और किसी का इन्तजार करने लगा।
इसी बीच कई वो बार अपनी कुर्सी से उठकर सामने लगे शीशे को देखकर अपने बालो को संभालता, अपने कपड़े देखता की कहीं कोई कमी तो नही रह गई।
अफ़सोस आधा घण्टा बीत गया लेकिन वो नही आई
जब विकास से रहा नही गया तो उसने पारुल को फोन किया मगर पारुल का नम्बर स्विच ऑफ था।
अब विकास के मन में कई प्रकार के नकारात्मक ख्याल आने लगे।
शायद वो कहीं जाम में तो नही फंसी होगी, या उसके घरवालों ने उसे घर से निकलने नही दिया होगा, या हो सकता है कोई और वजह हो, कहीं उसके साथ कोई अनहोनी तो नही हो गयी… राम राम राम ऐसा कभी ना हो।
कुछ देर शांत बैठकर वो सोचने लगा आज का दिन मेरे लिए कितना भाग दौड़ भरा रहा।
आज मेरा पहला वेलेंटाइन डे है। वादे के मुताबिक मैं पाँच बजे पहुँच गया कोई चार पाँच मिनट लेट रहा हूँ पर इतना तो चलता है।
खैर शर्दी पड़ने लगी थी उसने चाय पीने का फैसला किया और ऑर्डर दे दिया।
चाय की चुस्कियों के साथ वो आज के थका देने वाले दिन के बारे में सोचने लगा की आज दिन की शुरुआत मैंने बिना चाय पिए की थी
साढ़े चार बजे अलार्म बजा उठकर जल्दी से फ्रेश होकर दौड़ने के लिए निकल पड़ा था मैं बहुत ही खुश था अपने पहले वेलेंटाइन को लेकर
आज रॉक म्यूजिक की जगह रोमांटिक म्यूजिक सुनकर दौड़ रहा था।
जब मैं दौड़ने के बाद घर बापिस आ रहा था तो रास्ते में फोन आया की आज नौ बजे वालीबॉल प्रतियोगिता है हमे यहाँ से आठ बजे निकलना होगा
तब मैंने सोचा था लगभग तीन बजे तक फ़ाइनल मुकाबला हो जायेगा और आराम से चार बजे घर पहुँच जाऊँगा।
मैंने मुस्कुराकर हाँ कह दिया था और पूछा था कितनी टीम आ रही हैं?
जबाब मिला था आठ टीमे
तब मैं और भी खुश हो गया की आठ टीमे आएगी तो प्रतियिगीता लगभग दो बजे से पहले ही ख़त्म हो जायेगी।
जैसे ही मैं घर पहुँचा मेरी माँ ने कहा घर में सब्जी नही है जाओ सब्जी मंडी से सब्जी ले आओ जब तक लौटकर आओगे तब तक चाय भी बनकर तैयार हो जायेगी।
मैंने झोला उठाया और मंडी पहुँच गया सब्जी खरीदी तब तक टीम के एक खिलाडी का फोन आया उसने बताया की जल्दी पहुँचना है सात बज चुके है आधे घंटे के अंदर पहुँचना है नही तो प्रतियोगिता में प्रवेश नही मिल पायेगा।
मैंने जल्दी जल्दी कदम बढ़ाये घर पहुँचा बैग पैक किया मेरी माँ चाय लेकर पीछे खड़ी बार बार कह रही थी चाय पी लो फिर जाना। मैंने चाय का कप लिया मुँह से लगाया चाय गर्म थी तो बोला इसे ठंडा होने में टाइम लगेगा मुझे देर हो रही है मैं जा रहा हूँ।
और मैं निकल पड़ा बिना कुछ खाये पिए
समय से पन्द्रह मिनट लेट पहुँचा अपनी टीम का नाम लिखवाया और सुकून की साँस ली।
लेकिन अभी सिर्फ पाँच टीमे आई थीं मुझे बताया गया की  प्रतियोगिता अब नौ बजे शुरू होगी तब तक सभी खिलाड़ी अभ्यास कर लें
अब मैं सोचने लगा की क्यों न चाय पीकर ही घर से निकलता माँ भी गुस्सा हो रही होंगी।
एक घंटे अभ्यास किया फिर भी सभी टीमें नही आईं
उसके बाद मैं इधर से उधर कुर्सी बदलता रहा मगर प्रतियोगिता शुरू ना हो सकी।
कुछ देर बाद सभी टीमें आ गयी थी लेकिन उद्धघाटन करने के लिए सांसद का इंतजार था कुछ देर बाद संसद भी आये और दस बजे फीता काटकर उद्धघाटन किया फिर प्रतियोगिता शुरू हुई।
प्रतियोगिता का दूसरा मुकाबला मेरी टीम से था हमारे सामने वहाँ की स्थानीय टीम थी हमने उन्हें बच्चों की तरह हरा दिया।
मुकाबले के बाद खाना मिला सुबह से पेट में पहला निवाला गया था जिससे शारीर में थोड़ी सी जान आ गयी थी
क्वाटर फ़ाइनल और सेमीफाइन पाँच पाँच राउंड के थे यानी तीन की जगह अब पाँच राउंड खेलने होंगे
मैं थक चुका था और मेरी टीम भी बुरी तरह से थकी थी क्योंकि कम टीमो के आने से हम लगातार खेल रहे थे
आखरी मुकाबले की तयारी हो रही थी टीम में तीन लड़के थे जो नशा करते थे और खेलने से पहले डोपिंग इंजेक्शन लगाते थे बाकि एक लड़का गोलियां खाकर खेलता था। आज वो लड़के इंजेक्शन नही लाये थे इसी वजह से उन्हें थकान ज्यादा महसूस हो रही थी।
एक लड़के ने गोलियों की डिब्बी निकाली और दो तीन गोली खा ली।
फिर उन तीनो ने भी थकान मिटाने की गोलियां खाई
मैंने बैग से मूव निकाला और टाँगो में लगाकर मालिश करने लगा तभी उन तीनो ने मेरा मूव का ट्यूब छीना और खाने लगे (वालीबॉल में लगातार खेलने के लिए कई खिलाड़ी डोपिंग लेते है, जो गरीब होते हैं वो डिस्प्रिन की 10 गोली एकसाथ खा लेते हैं और ऊपर से मूव या फ्लेमर ट्यूब खा लेते हैं हालाँकि ये सब गैरकानूनी है लेकिन राज्यस्तरीय तक के खेलो में इसकी जाँच नही होती तो खिलाड़ी इनका भरपूर इस्तमाल करते हैं)
तीन बज चुके थे अंतिम मुकाबला शुरू हुआ हम दो राउंड हार चुके थे अब एक राउंड और हारे तो प्रतियोगिता से बाहर हो जायेगे।
हमने टाइम आउट लेकर रणनीति बनाई और ग्लूकोज का पानी पिया हल्की से थकान मिट गयी थी
जिसका फायदा यह हुआ की जिन्होंने मूव खाया था उनके शरीर को गर्म होने का समय मिल गया और उस वजह से हम तीसरा राउंड जीत गए।
अब जोश में खिलाड़ियों की थकान उत्साह में तब्दील हो गयी और हमने बाकि के दो राउंड भी जीतकर मुकाबला अपने नाम कर लिए जिसके साथ ही प्रतियोगिता का समापन हुआ। तब तक चार बज चुके थे।
मुझे प्रतियोगिता का सवश्रेष्ठ ख़िलाड़ी चुना गया पर मेरा ध्यान कही और था ईनाम बँटने में देर हो रही थी
जब तक ईनाम या ईनाम की राशि बाँटी जाती तब तक पाँच बज जाते इसीलिए मुझे वहाँ से जल्दी निकलना था। कोई मूर्ख ही होगा जो जीत का ईनाम छोड़कर जायेगा पर मैंने ऐसा किया मुझे पता है एक मेडल की क़ीमत क्या होती है इसे एक खिलाड़ी ही समझ सकता है इसके लिए निरंतर अभ्यास और भरपूर मेहनत करनी होती है हजारों खिलाड़ी आते हैं पर उनमे से कुछ को ही यह उपाधि मिल पाती है।
कहीं इस ईनाम के चक्कर में मेरा दूसरा ईनाम ना चला जाये यही सोचकर मैं वहाँ से जाने लगा।
पसीने में भीगी टीशर्ट पहने हुये हड़बड़ाहट में जल्दी जल्दी मैं अपने बैग को पैक कर रहा था मुझे अपने हुलिये की कोई फ़िक्र ना थी।
मिटटी में सने कपडे, सर्दी का मौसम, पसीने में भीगा हुआ बिना ईनाम लिए ही मैं वहाँ से चलने की तैयारी करने लगा।
उसके बाद घर कैसे आया और घर से रेस्टोरेंट यह मुझे ही पता है।
अचानक वेटर ने कहा और कुछ चाहिए तो बता दें आप काफी समय से बैठे हैं।
तभी विकास एकदम से चौंका और सोंच की दुनियाँ से बाहर निकलते हुए अटकते अल्फाजो में बोला अ..आ.. और कुछ नही चाहिए।
काफी समय हो चुका था एक कुर्सी पर बैठे बैठे इंतजार करते हुये।
रात के नौ बज चुके थे उसे अब भी यकीन था की पारुल आएगी एक अजीब सा पागलपन था उसमें
साढ़े पाँच बजे से नौ बजे के बीच उसने कभी चाय तो कभी कॉफी मँगवाई और बार बार पारुल को फोन लगाता रहा पर पारुल का नम्बर नही मिल रहा था क्योंकि वो बंद था।
घर से विकास की माँ का फोन आ रहा था उसकी माँ बोल रही थीं कहा है तू जल्दी आ खाना नही खायेगा क्या? सुबह दौड़ने नही जाना क्या?
आखिरकार निराश होकर विकास घर बापिस आने लगा।
इत्तेफाक से वो जिस टैक्सी में बैठा उसमे पारुल भी बैठी थी विकास एकदम चौंक गया। उसके मन में हजारों सवाल घूमने लगे इससे पहले विकास कुछ बोल पाता उसकी नजर उसके पास बैठे एक लड़के पर पड़ी जिसका हाँथ पारुल के हाँथ में था।
यह सब देख विकास का खून खौल रहा था।
पारुल की नजरें विकास पर एक दो बार गयी होगी वो उसे ऐसे देख रही थी जैसे विकास कोई अजनबी हो।
विकास ने अपना मुहँ घुमा लिया। पारुल और वो लड़का जिसका हाँथ पारुल के हाँथ में था वो दोनों बातो में इतने मगन थे की उन्हें शर्म हया की कोई फ़िक्र ही नही थी। दोनों एक दुसरे को आई लव यु बोल रहे थे
उनके एक एक अल्फाज तीर की तरह विकास के दिल पर चुभ रहे थे।
वो बेचारा बगल में गिफ्ट दबाये चुपचाप बैठा रहा
जब विकास का घर आने वाला था उसने टैक्सी रुकवाई जब वो उतरने लगा तो उससे रहा नही गया आखिर उसने पूछ ही लिया।
क्या हुआ आई क्यों नही?
उस लड़की ने कहा कौन हो?
यह क्या बोल रहे हो?
मैं तुम्हे जानती तक नही बत्तमीज कहीं के। और बुदबुदाते हुये कहा जाने कहाँ कहाँ से आ जाते हैं तभी उसके साथ बैठे लड़के ने कहा छोड़ो जाने दो कोई पागल है शायद।
जब विकास टैक्सी वाले को रूपये देने लगा तब तक दोनों की गुफ्तगू फिर शुरू हुई लड़के ने हँसते हुए कहा जानेमन तुम खूबसूरत ही इतनी हो की हर किसी का दिल तुमसे बात करने को मचल जाता है जैसे अभी इस सड़क छाप को ही देख लो।
अब ये अल्फाज उससे सहन नही हो रहे थे। तभी टैक्सी वहां से चली गयी उसके हाथ पैर ढीले पड़ गए थे।
वो सोच रहा था की जो साथ जीने मारने की बात करती थी।
जो बिना गुड नाइट सुने सोती नही थी।
जिसने कहा था तुम मुझे ऐसा गिफ्ट देना जिसे तुमने अपनी मेहनत से कमाया हो।
जिसने कहा था वेलेंटाइन डे पर मैं पाँच बजे रेस्टोरेंट में तुम्हारा इंतजार करुँगी।
विकास गहरी साँस लेकर खुद को समझाने लगा कि अब इन सब बातों का क्या फायदा
सुना था लोग बदल जाते है पर इतनी जल्दी बदल जाते यह आज देख भी लिया।
जब वो घर पंहुचा तो उसे याद आया की वो अपना गिफ्ट टैक्सी में ही भूल आया।
खुद को तसल्ली देते हुए सोचने लगा छोड़ो चला गया तो चला गया वैसे भी वो अपशगुनी था।
वहां टैक्सी में पारुल और उस लड़के की नजर जब गिफ्ट पर पड़ी तो लड़के ने ईमानदारी का दिखावा करते हुए कहा ये तो उस ठरकी का है जो इसे बगल में दबाये बैठा था।
पारुल ने कहा हाँ उसी का लगता है
लड़का बोला इसका क्या करें ड्राइवर को दे दें?
पारुल के मन में जिज्ञासा थी कि इसमें क्या है? उसने कहा नही इसे हम ले चलते है अबकी बार कभी वो ठरकी मिला तो उसे बापिस कर देगे क्या पता ड्राइवर ये रख ले और उसे ना लौटाए?
लड़का बोला सही कह रही हो जानेमन तुम जितनी खूबसूरत हो उतनी दिल की भी सुंदर हो।
दोनों चले गए गिफ्ट पारुल के पास था।
पारुल की जिज्ञासा उसे खाये जा रही थी आखिर इसके अंदर है क्या?
घर जाकर जब जब पारुल ने गिफ्ट खोला तो उसमे दस बारह मेडल थे।
Rahul Red© राहुल रेड
फर्रुखाबाद उत्तर प्रदेश
8004352296
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5 thoughts on “गिफ्ट (कहानी)”

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