जूती- नुजहत राना रूही

जूती- नुजहत राना रूही

वह अभी सरकारी स्कूल से लौटी है । आते ही उसने किताबों की झोली एक ओर उठा कर रख दी और अपनी जूती के बक्से को उठा लाई । उसने उसमें से अपनी चमचमाती जूती निकाली । ‘अरे! यह कितना सुंदर है । यह दो नंग इसके ऊपर बने फूल पर जड़े है । कैसे चमचम कर रहे हैं ।’ उसने मन ही मन सोचा । एक कपड़े के टुकड़े से उसे झाड़ कर बंद कर ही रही थी कि उसकी दीदी ने देखा ।दीदी ने उससे कहा, ‘सनो, देख कल मेरे कॉलेज का पहला दिन है । मुझे तुम एक दिन के लिए अपनी यह जूती दे दे । मैं कल इसे पहन के जाऊँगी ।’ यह सुनते ही उस गुस्सा आ गया । उसने तुनक के कहा, ‘ क्यों दूँ ? अपनी जूती । मैं नहीं देती अपनी जूती । देखती नहीं मैं इसे कितने जतन से रखती हूँ। हाँ, तेरी कहाँ गई ? तुझे भी तो ऑटी ने गिफ्ट में दी थी ।’ दीदी ने कहा, ‘वह तो कब की फ़ट गई । मेरे पास कोई नयी सैनडल नहीं है कि कल उसे मैं पहनकर कॉलेज जाऊँ । सभी नए—नए कपड़े-जूते पहनकर जाएँगी ।तू बस एक दिन के लिए अपनी जूती दे दे ना । उसने गुहार लगाई । पर सनो ने कहा, ‘नहीं-नही मैं नहीं देती ।’ यह कहते हुए घर से निकलकर बाहर खेलने चली गई ।
दीदी आज कॉलेज जा रही है । माँ ने टीन के बक्से में बड़े जतन से रखे उसके लिए ईद के मौके पर बनवाए जो सलवाड़- सूट थे उसे निकालकर पहने को दिए । मोटे सस्ते कपड़े से बना सूट । जिस पर रंग बिंरगी छोटी-छोटी बुटियाँ बनी हुई थी ।दीदी उसे पहनकर आईने के सामने बैठकर अपने बाल सवॉर ने लगी ।सनो ने उचटती नज़र से देखा ।वाह! दीदी कितनी प्यारी लग रही हैं । इतने में रंगीन मँगहे कपड़ों में सजी खिलखिलाती लड़कियों एक गिरोह दीदी को साथ ले जाने के लिए घर पर आ धमका । दीदी जब उनके साथ जाने लगी तो सनो की नज़र उसकी पैरों पर पड़ी । हाय! यह क्या । दीदी के पैरों में प्लास्टिक की चपल थी । जिस पर मोची के हाथों के बने खुरदरी सिलाइयाँ दूर से ही दाँत भींची नज़र आ रही थी । उसे बहुत बूरा लगा । सारे के कपड़े कितने सुंदर है । सिवाय उसके दीदी के । कम से कम—— उसने सोचा । फिर दौड़कर अंदर गई अपनी जूती उठा लाई । तब तक दीदी और उनकी सहेलियाँ सड़क तक पहँच गई थी । वह दौड़ते हुए वहाँ पहुँची ।धीरे से दीदी का लहराता दुपटा खिंचा । दीदी ने उसे घूर कर देखा और पूछा, ‘ क्या है?’ जवाब मे उसने जूती बढ़ा दी । दीदी ने डपते हुए कहा, अब रहने दे तू घर जा ।’ उसने कहा, ‘ पहन लो ना दीदी ।’ दीदी ने कहा, जा तू घर जा मुझे जाने दे । देख वे सब आगे चली जा रही हैं ।’ दीदी ने नहीं पहना ।वह सड़क पर खड़ी होकर अपनी दीदी को उसी सैनडल के साथ तेज़ कदमो से चलकर उस झुण्ड में शामील होना देखती रही । उसके दिल में एक ठिस रह गई । काश !मैं ने दीदी की उस विनती को मान लेती ।

 

नुजहत राना रूही

 सऊदी,अरब

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