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लघुकथाःः बेचाराःः-वीरेंद्र देवांगना

लघुकथाःः
बेचाराःः
‘‘आज अक्षयतृतीया भी निकल गया। लड़का फिर भी नहीं आया। पता नहीं, कल आएगा या नहीं? आजकल फोन पर ठीक से बात भी नहीं करता। उखड़ा-उखड़ा रहता है। कहता है, काम बढ़ गया है। सुबह फोन करो, तो सो कर उठा नहीं रहता; दोपहर को आफिस में डूबा रहता है और रात को थका-मांदा, इसलिए चिढ़चिढ़ाता है।’’ राहुल पलंग पर लेटे-लेटे बुदबुदाया।
‘‘आज दोपहर में जैसे-तैसे बात हुई थी उससे। कह रहा था कि काम की अधिकता है, मां। इसलिए आना मुश्किल है’’ राहुल की बूढ़ी पत्नी बोली, जो बेटे के इंतजार में दिन-रात एक कर रही थी। यह सुन राहुल को तसल्ली हुआ कि चलो मुझसे न सही अपनी मां से तो बात किया। यही संतोष की बात है।
गनीमत यह हुआ है कि बुढ़ापे के बावजूद वे दोनों सही-सलामत हैं। वरना, कोरोना हजारों बूढ़ों की ईहलीला को समाप्त कर चुका है। गर उन्हें कोरोना हो जाता, तो सेल्फ आइसोलेशन में कौन देखभाल करता? वे किसके भरोसे अपना उपचार करवाते?
उसे कभी-कभी लगता है कि वह रिटायर जरूर हो गया है, लेकिन उसकी बाजुओं में अब भी जवानों-सा दम है। इसका कारण यह कि वह योगासन और प्राणायाम को कभी नहीं छोड़ता। अल्सुबह उठ जाता है और प्रकृति के करीब रहकर प्राकृतिक चीजों का सेवन करता है।
वह सुबह उठकर दो-तीन गिलास गरम पानी में नमक व नींबू मिलाकर पहले पीता है, फिर शौचादि से निवृत होकर दो कली लहसुन खाली पेट खाता है और पानी पीता है। इच्छानुसार योग व प्राणायाम करता है। फिर गुड़ की चाय पीता है।
वे दोपहर व शाम का वही खाना खाते हैं, जो घर के बने मिर्च-मसाले का होता है। फिर दोपहर को जरा आराम, फिर उठकर काम। काम भी वह, जो उसको खुशी दे। उनकी दिनचर्या ऐसी थी, जो घड़ी की सूई के अनुसार चला करती थी। समय पर खाना और समय पर उठना उसने बचपन से सीख रखा था।
वे चिंतामुक्त रहते थे, इसलिए बीमार कम ही पड़ते थे। अंग्रेजी दवाइयां भी न के बराबर खाते थे। छोटी-मोटी तकलीफ होने पर पहले प्राकृतिक व खानपान की चिकित्सा ही किया करते थे।
राहुल और उसकी पत्नी में इतनी ही बात हुई थी कि मोबाइल की घंटी बज उठी। राहुल बेटे का नाम देखा, तो उत्साह से बोला, ‘‘बेटा, कल आ रहा है न!’’
उधर से आवाज आई, ‘‘आने की इच्छा तो है पापा, पर एक ही दिन का अवकाश मिल रहा है। एक दिन तो घर पहुंचने में लग जाता है। मैं साहब के सामने खूब गिड़गिड़ाया। हाथ-पैर जोड़ा, पर वे नहीं माने। उन्होंने मुझे इसलिए छुट्टी नहीं दिया; क्योंकि उन्हें भी अवकाश नही मिल रहा है।’’
‘‘क्या बात है, बेटा। छुट्टी क्यों नहीं मिल रहा है।’’राहुल ने प्रतिप्रश्न किया, तो उनका बेटा बोला,‘‘सरकारी काम बढ़ गया है पापा। कोरोना संकट के कारण कई महीनों से आफिस बंद था, इसलिए आपलोग परेशान न हों। मैं अगली बार ज्यादा दिन का अवकाश लेकर आऊंगा।’’ …और फोन कट गया या यूं कहो कि राहुल ने फोन काट दिया।
तभी उसे याद आया कि वह भी तो अपने माता-पिता के साथ ऐसा ही किया करता था। ज्यादा समय नौकरी में गुजारता था। साल-दो-साल में दो-चार दिन के लिए ही आता था। अब यदि उसका बेटा भी उसके नक्शेकदम पर चल रहा है, तो उसमें उसका क्या कसूर?
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विशेष टीपःः वीरेंद्र देवांगन की ई-रचनाओं का अध्ययन google crome से जाकर amazon.com/virendra dewangan में किया जा सकता है।

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