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कर्मयोगी-सुनील-कुमार-शर्मा

उसने वर्षो तक एक पैर पर खड़े होकर कड़ी तपस्या की। जिससे भगवान प्रकट हुएऔर बोले , “वत्स!वर मांगो।”
वह हाथ जोड़कर बोला, ” क्षमा करना प्रभु, मुझे वर नहीं चाहिए। ”
भगवान हैरान होकर प्रश्नवाचक निगाहो से उसके चेहरे की तरफ देखने लगे।
वह, भगवान की निगाहो का तात्पर्य समझकर, उनकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए फिर से बोला, भगवन! मुझे इसलिए वर नहीं चाहिए, क्योंकि; मुझे आप के दर्शन करने मे अब जो आंनद प्राप्त हुआ है, वह आंनद अगर आपके दर्शन बिना किसी परिश्रम के, सहजता से प्राप्त हो जाते तो कभी ना मिलता। अतः मैं जीवन की हर आवश्यकता को कड़ी मेहनत से हासिल करना चाहता हूँ… ना कि किसी देवता के द्वारा दिए गए वर से…। ”
युगों मे पहली बार ऐसे कर्मयोगी के दर्शन करके अपने आपको धन्य समझकर भगवान देवलोक को प्रस्थान कर गए।
सुनील कुमार शर्मा

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