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लघुकथाः बदलाव-वीरेंद्र देवांगना

लघुकथाः
बदलाव
‘‘सब्जी में आज फिर तेल तैर रहा है। तेली के तेल को महल में कब तक पोतेगी बहूरानी।’’ कामिनी सब्जी देखकर बोल पड़ी,‘‘कल सब्जी में नमक ज्यादा था। परसों मिर्च-मसाला और नरसों इतनी तीखी कि जैसे मिर्ची पावडर उड़ेलकर रख दी हो। ऐसे तीखे व्यंजन बनाकर हमारे सेहत का कबाड़ा निकालने में तुली है क्या?’’
किचन में बरतन को रैक में सजाती हुई बहूरानी चुप थी। वह बोले भी, तो क्या बोले? जबकि चार दिन से स्वाद के बारे में ऐसा ही संवाद घर में चल रहा था।
इस पर बगल में बैठकर भोजन का स्वाद ले रहे कामिनी के पति आनंद ने मुंह का कौर हलक के नीचे उतारते हुए जबान का ताला खोला,‘‘अरी भागवान, खाना खाते वक्त उटपटांग बातें नहीं किया करते। जो मिला है, उसको ईश्वर का प्रसाद समझकर शांति से ग्रहण करते हैं। बहू नई है। धीरे-धीरे सीख जाएगी।’’
‘‘क्या खाक सीख जाएगी? उसके इस घर में आए माहभर से ज्यादा हो गए, लेकिन खाना बनाने का शऊर नहीं आया उसको। सुबह चाय को चासनी बना दी थी।’’
‘‘तू तो खामखा तिल का ताड़ बना रही है। खाना इतना खराब भी नहीं कि खाया न जा सके।’’ आनंद ने अगला निवाला मुंह में डालते हुए अपनी बिटिया की ओर देखकर रहस्यमय अंदाज में कहा।
‘‘आप तो मेरी तरफ से कभी नहीं बोलेंगे। फिर चाहे बहू कितना भी उल्टा-पुल्टा करे? मेरा बनाया हुआ खाना ऐसा रहता, तो घर सिर पर उठा लेते। अभी से बहू को सिर चढ़ाओगे, तो बाद में पछताओगे। कहे देती हूं मैं। बहू को कंट्रोल करना सीखो।’’ इतना कहकर कामिनी तैश में कुर्सी से उठने लगी।
यह देखकर उनके सामने बैठी उनकी बेटी-आराधना बोल पड़ी, जो दशहरा में मयके आई हुई थी। वह अब तक उनकी बातें ध्यान से सुन रही थी,‘‘यह खाना मैंने बनाया है मम्मी। कल, परसों और नरसों का खाना भी मेरा बनाया हुआ है।’’
अब चकराने की बारी कामिनी की थी। वह हतप्रभ रह गई। वह सपने में भी नहीं सोची थी कि चार दिन से खाना आराधना बना रही है। असल में, वह कमरदर्द से परेशान रहा करती थी और बिस्तर में अपने कमरे में पड़े-पड़े आराम करती रहती थी।
लेकिन, आनंद को पता था। आराधना अपने पापा से अनुमति लेकर ही खाना बनाई थी, जो कामिनी से छुपाई गई थी। इसलिए, खाना की बुराई करने के बजाय तटस्थ रह जाना आनंद को उचित जान पड़ रहा था।
दरअसल, आराधना जब से ससुराल गई है, तब से उसका खाना बनाना छूट गया है।
ससुराल में उसकी सासू मां यह कहकर खाना बनाया करती है, ‘‘तुम अभी-अभी यहां आई हो बहू। हाथों की मेहंदी भी नहीं छूटी है। अभी कुछ दिन यहां का माहौल जान लो। लोगों की रुचियों को समझ लो। फिर जीवनभर किचन में खटना ही है। महिलाओं की यही नियति है।’’
आराधना यही सोचकर मयके के किचन में घुस गई थी कि इससे हाथों की सफाई हो जाएगी। मयके है-नमक, मिर्च, मसाला ऊपर नीचे हो जाएगा, तो कोई कुछ नहीं कहेगा। चल जाएगा। मीनमेख कम-से-कम ही निकाला जाएगा।
वह मां की ओर देखकर फिर सफाई दी,‘‘सुबह की चाय भी मेरा बनाया हुआ है मम्मी। जब मैं चाय बना रही थी, तभी आपके दामाद का फोन आ गया था। इसलिए, भूल गई कि इसमें शक्कर डाली हूं कि नहीं। इसी चक्कर में दोबारा शक्कर डाल दी।’’
इतना सुनना था कि चेयर से उठ चुकी कामिनी फिर बैठ गई। अब, उसे भोजन से कोई गीला-शिकवा नहीं रह गया था।
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विशेष टीपःः लेखक की ई-किताबों का अध्ययन amazon.com/virendra dewangan के माध्यम से भी किया जा सकता है।

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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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