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लघुकथाःः चतुराई-वीरेंद्र देवांगना

लघुकथाःः
चतुराई
‘‘अमा यार, तुम्हें मालूम है! आज मेरे घर साधुओं की फौज आई थी।’’ राजेश ने सहकर्मी गौतम से कहा।
गौतम ने अनमने ढंग से जवाब दिया,‘‘नहीं मालूम। क्या कोई खास बात हुई?’’
‘‘वे एक जीप पर सवार थे। सब एक-से बढ़कर एक लग रहे थे। कोई जटाजूटधारी था, तो कोई कमंडलधारी। कोई तांत्रिक था, तो कोई मांत्रिक। दो नागा साधू थे, जो अपनेआप को तीसमारखां समझ रहे थे।’’ राजेश ने उनके हुलिए से उनका खुलासा किया।
‘‘इसमें कौन-सी खास बात है। वे झुंड-के-झुंड आते ही रहते हैं। आंख के अंधे, गांठ के पूरे को लूट कर चले जाते हैं। लगता है, तुम भी गांठ के पूरे हो गए हो, इसलिए तुम्हें चूना लगाने के लिए आए थे।’’ सहकर्मी ने दिल्लगी किया।
‘‘इसमें खास बात यह हुई कि वे गोमेद, मंूगा और पुखराज के एवज में 1000 रुपये मांग रहे थे। मैंने उन्हें 100 रुपये में टरका दिया।’’ राजेश ने अपनी चालाकी जाहिर जाहिर करते हुए कहा।
‘‘अच्छा… कमाल कर दिया तुमने! दिखाओ वह गोमेद, मूंगा और पुखराज!’’ गौतम हाथ बढ़ाते हुए शंका जताया।
गौतम उसे ठोक-बजाकर देखा, तो राजेश की बेवकूफी पर मुस्कुराए बिना रह न सका, ‘‘ऐसे पत्थर बाजार में दस-दस रुपये में बिकते हैं। तुम हो कि 100 रुपये लुटाकर शेखी बघार रहे हो।’’
अब, राजेश को काटो तो खून नहीं। लगा कि उसे धरती पर पटक दिया गया है। वह अपनेआप को जितना होशियार समझता था, उससे कहीं अधिक उल्लू निकला, जो अंगूठाछाप साधुओं से ठगा गया।
इसके बाद से वह उन साधुओं को लगातार ढूंढ़ने लगा, लेकिन अफसोस कि वे आज तक नहीं मिले। ऐसे ठग साधू आपको मिलें, तो बताएं।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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