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लघुकथाः लालच-वीरेंद्र देवांगना

लघुकथाः
लालच::
‘‘यह अच्छा हुआ कि अब हमें पचास बराती ले जाना है। इससे जहां एक बस से काम चल जाएगा, वहीं तीन बस का खर्चा बच जाएगा।’’ प्रियांशु ने अपनी पत्नी सविता को उत्साहित होते हुए बताया, ‘‘ये रहा पचास बराती ले जाने का परमिशन।’’
‘‘इसका मतलब यह हुआ कि बेटी दीप्ति की बरात में भी पचास बराती ही आएंगे। कहां वे 5 सौ बराती लाने का बखान किया करते थे, अब पचास में ही सिमट जाएंगे। चलो अच्छा हुआ। हमारा खाना और दीगर एक्सपेंसेस बच जाएगा।’’ सविता, अपनी बेटी-दीप्ति के संभावित ढेरों बरातियों की फरमाइशों से चिंतित रहा करती थी कि इतने लोगों की सुख-सुविधा का माकूल प्रबंध कौन और कैसे करवाएगा? कहीं कोई कमी रह गई तो…।
वह बरातियों के द्वारा किए जानेवाले संभावित हंगामे से परेशान रहा करती थी। वह कई जगहों पर हो चुके हंगामों को सुन रखी थी, जो उसकी जेहन में रची-बसी बारबार उसको झिंझोड़ती थी कि तेरे द्वारे भी बेटी के बराती आएंगे। संभल जा।
‘‘बराती-तो-बराती ठहरे। न जाने वे कौन-कौन सा फरमाइश कर बैठें। उनकी आवभगत में कुछ कमी रह गई, तो गजब हो जाएगा। किसी में कमी रह गई, तो कहीं बरात…।’’दीप्ति ऐसा सोचते ही उखड़ जाती थी और गुमसुम हो जाया करती थी।
कोरोना के चलते यह नेक खबर सविता को मिली, तो उसकी जान-में-जान आई। कोरोना की बलिहारी कि उसकी बहुत-सी परेशानियों का अंत हो गया है। अब तो वह दीप्ति के पचास बरातियों का स्वागत-सत्कार बड़े शानोशौकत से करवा सकेगी।
दीप्ति और राजीव उनकी दो संतानें हैं। दीप्ति बड़ी है, तो राजीव छोटा। दीप्ति प्राइवेट कंपनी में जाब में है, तो राजीव सरकारी जाब में। जब दीप्ति की शादी तय हो गई, तब उन्होंने सोचा कि राजीव की भी शादी एक ही मुहूर्त में कर देने से अन्य विवाह-व्यय बच जाएगा। आखिर राजीव कमाने भी लगा है और उसकी उम्र भी विवाह योग्य हो गई है।
सो, उन्होंने राजीव के लिए भी लड़की आननफाइन में ढूंढ लिया, जो उसकी जाबमेट थी और राजीव को पसंद करती थी। शादी का मुहूर्त नवंबर के लिए निकाला गया है। इसी दौरान कोरोनाकाल की बंदिशें आन पड़ी हैं।
तभी उसे ख्याल आया कि राजीव के बरात में जो बराती नहीं जाएंगे, उनके स्वागत-सत्कार की चीजें यदि राजीव के ससुरालवाले यहां भिजवा देते, तो हम उन्हें यहीं संतुष्ट कर देते। इससे जहां बरात में नहीं जानेवालों का मान बढ़ जाता, वहीं हमारी इज्जत अफजाई हो जाती कि हमने उनका भी ख्याल रखा, जो बरात में नहीं गए।
लेकिन, यह क्या उचित होगा? गर ऐसी मांग दीप्ति के ससुराल से आने लग जाए, तो क्या वे इसकी पूर्ति करेंगे? शायद नहीं। कतई नहीं। जो फरमाइशें उनके लिए अनुचित हो सकती हैं, वह दूसरे लिए उचित कैसे हो सकती है?
ऐसा सोचते ही उसका यह अनुचित ख्याल दिलदिमाग से काफूर हो गया। अब, वह पूरी तन्मयता से दीप्ति व राजीव की शादी की तैयारी में जुट गई।
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