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लघुकथाःः संघर्ष-वीरेंद्र देवांगना

लघुकथाःः
संघर्षःः
कोरोना महामारी फैलने से आजीविका और जीवन में संघर्ष चालू हो गया। दोनों अपने-अपने पक्ष में तर्क देने लगे और तर्क के तीरों से एक-दूजे को भेदने लगेः-
आजीविका बोली,‘‘मेरे बिना जीवन चलेगा क्या? जीवन चलाने के लिए आजीविका कमाना पड़ेगा। काम-धंधा और नौकरी-चाकरी में खपना पड़ेगा। क्या कोई काम किए बिना जीवन में सफल हो सकता है? इसलिए आजीविका होती है बड़ी। जीने के लिए आजीविका का सहारा लिया जाएगा, तभी जीवन महफूज रह सकेगा, मूर्ख!’’
जीवन सुना-सुना। फिर टोका,‘‘जान रहेगा, तभी जहान रहेगा पगली! सुना नहीं है तुमने-‘जान है, तो जहान है।’ मानलो इस जहान में जान की नहीं रहेगा, तो तेरी जीविका किस काम की बेवड़ी! यहां भूतों का डेरा और धनधोर सवेरा हो जाएगा। इसलिए जीवन पहले है। कोई किसी की सहायता करने के लिए नहीं बचेगा, तो किस काम की तेरी आजीविका। जीविका कमाने के चक्कर में जान पर बन आएगी, तो इससे क्या लाभ री आजीविका!’’
‘‘क्या कोई भोजन के बिना जिंदा रह सकता है? रोटी कमाने के वास्ते हमें खटना ही पड़ता है, तभी जीवित रहा जा सकता है। मजदूरों का कांरवां, जो सड़कों पर रेंगा है और अब बाइज्जत बुलावा आया है, वह भी तो आजीविका की जद्दोजहद है बेवकूफ!’’आजीविका जिद्द पकड़ ली। तार्किक तीर को धार प्रदान करते हुए जवाब दी।
‘‘सुना नहीं तुमने कि द्वितीय व तृतीय लाकडाउन के दौरान ऐलान किया गया था कि ‘जान भी और जहान भी।’ यह जान तभी रह सकती है, जब हम दो गज की दूरी, मुखौटाधारण, आपदा प्रबंधन, संगरोध और एकांतवास के नियमों का पालन पूरी संजीदगी से करेंगे।’’ जीवन बातों को सुधारा।
इससे आजीविका रुष्ट हो गई। वह चिढ़चिढ़ाई,‘‘यही तो मैं भी कह रही हूं। यदि हम आजीविका कमाने के चक्कर में महामारी से बचने के उपायों का पूर्ण गंभीरता से पालन करेंगे, तभी तो जिंदा रहेंगे और दुनिया के सामने शर्मिंदा नहीं होंगे।’’
‘‘फिर झगड़ा किस बात का? आओ मेल-मिलाप बढ़ाएं। मिल-जुलकर आजीविका कमाएं और जीवन बचाएं। भीड़ न बढ़ाएं। हाथों को बार-बार साबुन या हैंडवाश से धोएं। अपनेआप को, अपने परिवार को, पास-पड़ोस को, जिला को, प्रदेश को और देशवासियों को बचाते हुए कामधाम करें। यही समय की मांग है।’’वे दोनांे समवेत स्वर में बोले और अपनी-अपनी राह चल पड़े।
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