Notification

अपने लेख प्रकाशित करने के लिए यहाँ क्लिक करें!

लघुकथाःः सुखी कौन-वीरेंद्र देवांगना

लघुकथाःः
सुखी कौनःः
दीपावली के अवसर पर बनवारीलाल अपने घर के ड्राईंग रूम को सजाते हुए सोच रहा था, ‘‘क्या है उसके पास? न ढंग के सोफे, न अच्छी कुर्सियां, न आलमारियां और न ही बढ़िया घर; जिसे सजाकर गर्व महसूस किया जा सके।’’
घर सजातेढाते उसे याद आया, ‘कल चढ्डा साहब के बंगला गया था, तो उनके शानदार ड्राईंग रूम को देखकर चकरा गया था। बेशकीमती सोफे। उनके चमकदार कव्हर। चढ्डा साहब व उनकी बाबकट बीवी की आदमकद तस्वीरें। ड्राईंग रूम के बीचोंबीच चमचमाता व लहराता झूमर। दीवार रैक में बच्चों के सैकड़ांे खिलौने। एक कोने में राधा-कृष्ण व एक कोने में सीयाराम की खूबसूरत मूर्तियां। बीच में फूलसाइज का कलर टेलीविजन। -उनके ड्राईंग रूम की सुंदरता में चार चांद लगा रहे थे।’
बनवारीलाल के जेहन में चढ्डा साहब के ड्राईंग रूम की इतनी ही तस्वीर उभरी थी कि उनके बेटे और बेटियां पड़ोस के सरकारी स्कूल से दौड़ते हुए आए। बस्ता करीने से रख ‘पप्पा-पप्पा’ कहते हुए उनसे लिपट गए। बनवारीलाल ने उन्हें उठाकर अपने अंक में भर लिया। बच्चों ने उन्हें ढेर सारी पप्पियां दीं। दीवाली की छुट्टी होने का ऐलान कर दिया।
ये बच्चे यहीं नहीं रुके। उन्होंने अपने ‘पप्पा’ को घोड़ा बनने के लिए कहा, जो अक्सर बना करते थे। वे इसी तरह बच्चों के साथ खेला करते थे। आज भी वे उनके साथ मस्तमौला हो गए और अपनी पीड़ा भूल गए।
तभी उन्हें ख्याल आया कि चढ्डा साहब के एक भी बच्चे नहीं हैं; वरना उनकी आदमकद तस्वीर बिन बच्चों की नहीं रहती। रैक के खिलौने बाहर निकले हुए व अस्त-व्यस्त रहते। उन्हें खेलने, बिखराने व तोड़नेवाला कोई नहीं है।
वह घोड़ा भी बन जाए, तो सवार कहां से लाए। उफ! वैसी खामोशी से यह किलकारी भली!
–00–

Leave a Reply

Join Us on WhatsApp