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मदारी और जमूरे के बीच संवाद – वीरेंद्र देवांगन

‘‘बोल जमूरे?’’ मदारी ने डंका बजाकर जमूरे से पूछा, ‘‘ढम-ढम। ढम-ढमा-ढम।’’
जमूरे व्यथित मन जवाब दिया,‘‘क्या बोलूं उस्ताद? वैष्विक चैधरी से हमें आतंकवादी देष घोषित करवाकर, जन्मजात दुष्मन इतरा रहा है। जबकि आप तो जानते हैं; हमारे यहां आतंकवादी नहीं, आजादी के सिपाही रहते हैं, जो कष्मीर सहित दुनियाभर में आजादी के लिए जंग लड़ रहे हैं। आजादी के इन दीवानों को ये लोग आतंकवादी कहते हैं और हमें दुनियाजहां में बदनाम करते रहते हैं।’’
‘‘इसीलिए मेरी बोलती बंद है उस्ताद! मैं सकते में हूॅं। इससे यह जाहिर होता है कि जो जैसा रहता है, वह दूसरों को वैसा समझता है। पड़ोसी वैसा है, इसलिए वह हमें वैसा समझता है। आप एक भले मुल्क हैं, जो हमारा वैष्विक मंचों में बचाव करते रहते हैं; वरना ये दुनिया हमें जीने नहीं देती।’’ बोलते-बोलते जमूरे रूंआसा हो गया।
उस्ताद ने जमूरे को दिलासा दिया,‘‘हमारे रहते टुम चिंता मत करो जमूरे। हम अजहर मसूद की तरह सारे आतंकवादियों को सर्टिफिकेट दे देंगे कि ये लोग कष्मीर की आजादी के लिए मर मिटनेवाले सीधे-सच्चे लोग हैं। इन्हें बैरी नं. एक सब दूर बदनाम कर रहा है। पता नहीं कहां से झूठे सबूत जुटा लाता है और सबको दिखाता रहता है?’’
थोड़ी देर रुककर उस्ताद ने फिर से बोला,‘‘टुम बोलो, तो हम संयुक्त राष्ट्र में फिर विटो करके इस्पात जैसी पक्की दोस्ती का पक्का सबूत पेष कर दें। सारी दुनिया को जता दें कि कौन सच्चा है और कौन झूठा।’’ ढम-ढमाढम-ढम, उस्ताद ने डंका बजाकर उस्तादी दिखाया, तो जमूरे की जान में जान आया।
चिकनी चुपड़ी बातें सुन जमूरे, उस्ताद के पैर पकड़ लिया और गिड़गिड़ाया,‘‘इस मतलबी जहां में आप ही हमारे खिदमतगार और पालनहार हैं, जहांपनाह। आप ही बताएं कि हमें आगे कौन से स्टेप उठाना है कि दुष्मन भी मरे और लाठी भी न टूटे।’’
‘‘हम डोकलाम के ‘चिकन नेक’ पर कब्जा करने की कोशीषों में जुटे हैं। डोकलाम के मुर्गी की गरदन पर हमारी पकड़ हो गई, तो जानी दुष्मन की अकड़ ठिकाने लग जाएगी। जब अकड़ू बैरी को उसके उत्तरपूर्वी राज्यों में कूक डू कूॅं करने का अवसर नहीं मिलेगा, तब यह ऊंट मुझ पहाड़ के नीचे वैसे ही आएगा, जैसे तुम आए हो। इस बीच तुम्हारे राजदूत हमारे राजदूत से मिलने की दिखावटी सक्रियता दिखाते रहें, फिर देखना तमाषा। कैसा बवाल मचता है?’’ उस्ताद ने ढम-ढमाढम बजाकर दंभ भरा।
उस्ताद की उस्तादी देख जमूरे फूला नहीं समाया। वह खुषी से झूमते हुए बोला,‘‘वाह उस्ताद वाह! आपके क्या कहने? आप तो उस्तादों के उस्ताद हैं। आप चाहें तो क्या नहीं कर सकते? 1962 का इतिहास भी दोहरा सकते हैं, माईबाप! यदि आप यह इतिहास दोहरा दिए, तो दुनिया आपकी ताकत की कायल हो जाएगी, मेरे हुजूर।’’
उस्ताद घाट-घाट का पानी पीया हुआ था। वह जमूरों की नस-नस से वाकिफ था। उसको याद था कि यह किस नंबर का जमूरा है। इसके पूर्व भी उसके पास कितने ही जमूरे आए थे। काम करके चले गए थे। वह इस जमूरे का भूत व भविष्य जानता था, तभी तो उस्ताद कहलाता था। वह तो जमूरों का इस्तेमाल करके उन्हें लात मारकर भगाने की कला में भी माहिर था।
वह मौके की नजाकत को भांप कर अपना मतलबी तीर चलाया,‘‘टुम हमें अपने मुल्क में सैनिक अड्डा बना लेने दो। फिर देखना टुम्हारे दुष्मन की खाट खड़ी कैसे करते हैं हम? अभी वह मालाबार सैन्याभ्यास से उचक रहा है। मैं भी उसको तिब्बती पठार में युद्धाभ्यास करके डरा रहा हूॅं, पर वह इतना ढीठ है कि एकबारगी डरता नहीं है। ऊपर से अपनी जनता पर राष्ट्रवाद का जहर भरकर हमारे व्यापार को चैपट करने पर तुला है। कष्मीर पर मध्यस्थता के लिए मैं अपने पिट्टुओं को लगाया हूॅं, पर वह झांसे में नहीं आ रहा है। चालाक बनता है, पर है नहीं, जमूरे।’’
उस्ताद व जमूरे में इतनी ही बात हो पाई थी कि जमूरे के शीर्ष अदालत से पनामागेट भ्रष्टाचरण पर जमूरे को आलावजीर के पद से अयोग्य करार दिया जाने लगा। यह सुन जमूरे के होश फाख्ता हो गए। उसको बेहोशी के दौरे पड़ने लगे। वह ‘उस्ताद-उस्ताद’ करता हुआ अर्ष से फर्ष पर जा गिरा। दुनियावाले उसकी औकात देखते रह गए। उस्ताद किंकर्तव्यविमूढ़ बगले झांकने लगा।

वीरेंद्र देवांगन
आनंद विहार काॅलोनी
बोरसी-दुर्ग

छत्तीसगढ़

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