मेरी मौत – अमनदीप

मेरी मौत – अमनदीप

यह जरूरी तो नहीं कि मौत सिर्फ जिस्म की हो। मैंने अपनी रूह को दम तोड़ते हुए देखा। मैं खुद पर बेतहाशा वार कर रहा था। बहुत नफरत थी मुझे खुद से। मेरे जख्मों से खून बह रहा था। आंखों के आगे हल्का-हल्का सा अंधेरा हो रहा था।
” मोटे क्या है? किसी के पीछे इतना पागल नहीं हुआ करते।”
यह बात मेरे कानों में बार-बार सुनाई दे रही थी। मैंने भी कभी उसके बिना जिंदगी में कुछ सोचा ही नहीं था। उसके बिना मैं जीना भी नहीं चाहता। मेरी सोच मेरी समझ बहुत पहले ही दम तोड़ चुकी थी।
“कभी तु मुझे अकेला तो नहीं छोड़ेगा। तेरे बिना मैं जी नहीं सकती।”

पता नहीं वह अपनी बातें कैसे भूल गई। मुझसे तो कुछ भी भुला ही नहीं जा रहा था। कुछ यादें थी जिन्होंने मेरी जीने की हिम्मत तोड़ दी थी। खून कुछ ज्यादा ही बहने के कारण मुझे चक्कर से आ रहे थे। मेरे हाथ भी मेरे खुन से सन गए थे। मुझे हर चीज धुंधली सी दिखाई दे रही थी। आंखें खुद-ब-खुद बंद हो रही थी।
” क्यों पागल अभी भी तु मेरे बारे में ही सोच रहा है।”
अब मेरी सिर्फ चन्द सांसें की बची थी। अभी भी वो मेरी सोच पर हावी थी। काश वो अब भी मेरे साथ होती। तो मेरी जिंदगी कुछ और लंबी होती।

—अमनदीप

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