महान पिताजी -विकी पटिल

महान पिताजी -विकी पटिल

कहते हैं जी तो कुछ भी चाहता है, ये करू , वो करू , पैसा कमाऊ, अमीर बनु , नाम कमाऊ, हमेशा खुश रहु, लेकिन जो जी चाहता है वह सब पुरा नहीं होता । होता भी है लेकिन बहुत कम, पांच साल का था मैं , जब आखरी बार अपने पिता की सुरत देखी थी, मेरे पिता मुझे छोड़कर तो जा रहे थे, लेकिन बाय-बाय नहीं कर रहे थे, जब मैं बडा हुआ, तब मेरा भी जी चाह रहा था कि मैं बहुत कुछ करू, लेकिन जी तो जी हैं कुछ भी चाहता है, कभी कभार अडोसी-पड़ोसी भी ताने मार दिया करते थे, कि जीस बच्चे के सिर पर अपने पापा का हाथ न हो, वह बच्चा कैसे आगे बढ़ सकता हैं , कैसे तरक्की कर सकता है , जिन अडोसी-पडोसी लोगो कि नजर में मैं बदनसीब था एक दिन वे लोग भी जान गए थे ,
जब मैं अपनी कामयाबी के मंच पर खड़ा था ओर किसी ने मुझसे कहा कि आपके कामयाबी के पीछे किसका हाथ हैं, तब मैने कहां, की मेरी कामयाबी के पीछे मेरे पीता का हाथ हैं , जो पीता अपने बच्चे को तब छोड़कर चले गए थे जब वहं बच्चा पांच साल का था, तो वह पीता उस बच्चे कि कामयाबी का कारण कैसे बन सकते हैं, जिन्हें पता था वे सोच रहे थे कि मैं झूठ बोल रहा हूँ, और जिन्हें नहीं पता था वे तो सच ही सोचेंगे।
लेकिन यहि सच हैं,
एक दिन मैं अपने पापा के साथ सेट्टी मेला देखने गया था, मेले में अनेको प्रकार के दिल को लुभा देने वाले खिलौने बिक रहे थे, मेरा तो जी चाह रहा था कि मेले के सारे खिलौने समेटकर अपने घर ले जाऊ, लेकिन करता भी क्या , जी तो जी हैं कुछ भी चाहता है, मेरा क्या जी चाह रहा है मैने अपने पापा को नहीं बताया, उस वक़्त मेरे हाथ में सिर्फ एक थैला था, मेरे पापा जो कुछ भी खरिदकर देते थे, मै उसे हसकर थैले में डाल दिया करता था, जब सारी जरूरतमंद सामान खरिद कर हो गई, ( थोड़े बहुत खिलौने भी खरीदे थे,) तब आखरी में हम आकाश पालने के करीब पहुँचें, आकाश पालना मैने अपनी जिंदगी में पहली बार देखा था, उस पालने में, बड़े छोट,उजुर्ग बुजुर्ग सब के सब बैठे हुए थे, इसी कारणवश मेरी नजरे उस पर से हट नहीं रही थी, मेरा उस आकाश पालने को बार बार देखना पापा समझ गए थे, और पापा ने आखिरकार मुझसे पुछ हि लिया की आकाश पालने में बैठोगे , मैने झट से हाँ में जवाब दिया ।
घूमते हुए आकाश पालने में आनंद तो बहुत आ रहा था, लेकिन कुछ देर पश्चात अाकाश पालने में बैठे बैठ मेरे पापा को चक्कर आ गया ।
मैने किसी भी तरह चिख चिख कर कर्मचारियों से कहकर अाकाश पालना रूकवाया । तभी कुछ अगल बगल में मौजूद लोग हालचाल पूछने के वजाय मेरे पापा से यह कहने लगे,, की जब पालने में बैठने से चक्कर ही अाता हैं, तो क्यों बैठे, ज्यादा से ज्यादा उस भीड़ में तो मेरे पापा कि बुराई करने वाले हि निकले,, लेकिन मेरे पापा ने किसी भी व्यक्ति को उत्तर देना जरूरी नहीं समझा । और हम वहां से चले गए,
रास्ते से जाते वक्त मेरे मन में भी एक सवाल आया, यदि मेले में पापा मुझसे पूछ लेते कि बेटा तेरा क्या जी चाह रहा है, और मैं उनसे कहता की मैं मेले का सारा सामान समेटकर अपने घर ले जाना चाहता हूँ,, तो क्या पापा एेसा करते , मैने भी ईस प्रश्न का उत्तर निकालना जरूरी नहीं समझा, और हम दोनो बाप बेटे मुस्कराते हुए निकल गए,,,

 

  विकी पटिल

मुंबई, महाराष्ट्र

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