मुझे माँ चाहिए-3-दीपक शर्मा

मुझे माँ चाहिए-3-दीपक शर्मा

बीती बातें सोचते सोचते उसकी आंखें नम हो गईं।अचानक उसे अपने लाल की याद आयी जो गुस्से में बिना खाना खाये ही चादर ओढ़ के सो गया था।वो थाली लेकर उसके पास जाकर बैठ गयी।”क्या हुआ मेरे लाल,कैसे उदास होकर लेटा है?”
क्या हुआ मेरे लाल?जैसे तुमको तो कुछ पता ही नहीं?वो चादर के अंदर से मुंह बनाकर बोला।वो पहले भी कई बार उन लड़कों के बारे में बता चुका था,मगर उसकी माँ उसे हर बार कोई न कोई बहाना बनाकर मना लेती।शायद आज भी कोई बहाना बनाने वाली थी वो।उठ मेरे लाल देख आज मैंने तेरे पसंद की सब्जी बनाई है।इस बार चादर के अंदर से कोई प्रतिक्रिया नही हुई।उसने थाली मेज पर रख कर ज्यों ही चादर को हटाया,उसका कलेजा तड़प उठा।उसके लाल की आंखों में आँसू थे।उसका लाल आज से पहले कभी भी किसी चीज के लिए नही रोया और आज!
वो जैसे ही आने लाडले के आँसू पोंछने के लिये आगे बढ़ी,उसने अपना मुँह फेर लिया और बोला-“मां आज अगर पापा होते तो मेरे पास भी एक नई साईकल होती।
अपने लाडले के ऐसे शब्दों को सुनकर वो अंदर से बिल्कुल टूट सी गयी।
अब उसके पास न तो कहने के लिए कोई शब्द थे और न ही बनाने के लिए कोई बहाना।
वो उठी और कमरे से बाहर चली गयी।
इधर अपनी मनपसंद सब्जी देखकर वो खुद को रोक न सका और खाना खाने बैठ गया।उसके इस बर्ताब से उसकी मां के दिल पर क्या बीती इसका उसे ज़रा भी एहसास न था।
अगली सुबह जब वो उठा तो माँ उसके सामने नाश्ता लिए खड़ी थी।उसने आंखे मसलते हुए माँ की तरफ देखा।माँ मंद-मंद मुस्कुरा रही थी।”उठ जा मेरे लाल!आज स्कूल नही जाना क्या?”माँ ने उसके सर पे हाथ फेरते हुए कहा।वो माँ की गोद में सर रख कर लेट गया।नहाकर उसने अपना बस्ता उठाया।उदास मन से वो जैसे ही दरवाजे के पास आया उसकी आंखें खुशी से चमक उठीं।बाहर एक चमचमाती लाल रंग की नई साईकल खड़ी थी।पर जल्द ही उसकी आँखों की चमक न जाने कहाँ चली गयी।इतनी बढ़िया और कीमती साईकल उसके नसीब में कहां?मन में यही सोचते हुये वो साईकल को नज़रअंदाज़ करते हुये जैसे ही आगे बढ़ा वैसे ही पीछे से आवाज आई-“बीटा साईकल तो लेता जा।”एक बार को तो उसे अपने कानों पे विश्वास ही नही हुआ।जैसे ही उसने पीछे मुड़कर देखा,उसकी माँ साईकल के पास आ चुकी थीं।”मेरा लाल आज अपनी नई साईकल से स्कूल नहीं जाएगा?”
माँ की बातें सुनकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा।वो एक दम से अपनी माँ से लिपट गया।
स्कूल के सारे बच्चे उसकी नई साईकल के चारों तरफ भीड़ लगा के खड़े हो गए।हर कोई उसकी नई साईकल की ही तारीफ कर रहा था।
आज वो बहुत खुश था और उसकी इस खुशी की वजह भी उसकी माँ ही थी।मेरी माँ ने मेरे लिए कितना कुछ किया है और एक मैं हूँ जो मैंने अपनी इतनी प्यारी माँ का दिल दुखा दिया।आज मैं घर जाके माँ से ज़रूर माफी माँगूँगा।ये बातें सोचते-सोचते कब स्कूल की छूट्टी हो गयी उसे पता ही न चला।जैसे ही वो घर पहुंचा तो अपनी माँ को उसने घर मे न पाया।पास के घर के शर्मा जी ने उसे बताया की उसकी माँ अस्पताल में है।क्या हुआ मेरी माँ को?उसने रुआंसे स्वर में पूछा!
कुछ खास नही बस ज़रा सी चोट आई है।मुझे मेरी माँ के पास जाना है।
हाँ…हाँ मैं ले चलता हूँ तुम्हे तुम्हारी माँ के पास लेकिन तुम पहले अपने घर मे। से थोड़े बहुत रुपये ले लो वहां ज़रूरत पड़ेगी।
रुपये??
रुपये तो नही हैं मेरे पास!
फिर तुम्हारी माँ का इलाज कैसे होगा?
शर्मा जी ने उसकी तरफ देखते हुए कहा।
उनकी बातें सुनकर वो घबरा गया और बोला-आप 5 मिनट रुकिए मैं अभी आया।इतना कहकर उसने अपनी साईकल उठाई और सड़क की तरफ तेजी से चला गया।थोड़ी ही देर में वो बाजार में पहुँच चुका था।वहाँ खड़ा होकर वो जोर जोर से चिल्लाने लगा-कोई मेरी साईकल ले लो-कोई मेरी नई साईकल ले लो।
मैंने पूछा कि भई तुम ये नई साईकल क्यों बेच रहे हो?क्या तुमको ये नही चाहिए?
वो बेचारा रोते हुए बोला-नही दीपक भैया मुझे साईकल नही चाहिए
मुझे माँ चाहिए…..

 

 

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          दीपक शर्मा
उधमसिंघनगर ,उत्तराहांड

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