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नाव नाराज थी-MK-निर्माण

                   नाव नाराज थी      (सत्यता को उजागर करती   निर्जीव नाव की जीवन्त कहानी।

कहानीकारा व लेखिका – मीनू रानी)

This blog is posted by – Meenu Rani
Dated-11-09-2017

मै कोई शक्स नही ,नदी मे नाव जैसी हूँ।
हजारो को पार किया फिर भी, खुद कभी पार ना हो सकी।।

नाव को बस इसी बात का गम था कि रोज हजारो को उनके गन्तव्य पर पहुंचाती,बिना किसी भेदभाव बिना किसी लालच और अपने पराये की भावना के मगर फिर भी कोई उसकीतारीफ के दो शब्द नही कहता था।
वो घण्टों धूप और बरसात मे किनारे पर खडी रहतीतो बस इसी आशा से कि कोई सवार आए। हमेशा सहायता की भावना लिए उतने ही जोश और लगन के साथ जितना की कोई पिता अपने बालक की परवरिश के लिए करता है।यह संसार भी उस नाव की कहानी जैसा ही तो है जो एक व्यक्ति के ऊपर सवार होकर अपने गन्तव्य पर पहुंचना चाहता है।प्रत्येक को अपने गन्तव्य की चिंता हैमगर उस नाव की नही जो सबकी चिंता करके सबका भार सहन करती है और बस एक आशा कि कोई तो अपने मुंह से उसकी तारीफ मे दो शब्द कहेगा।नाव हजारो को लायी और हजारो को ले गयी और दिन मे धूप मे घण्टों किनारे पर खडी रही।किनारा बोला-कि कोई सवार नही है शायद जो यहां आ खडी हुई।
क्यो तुम्हें मेरे घडी भर आराम से भी परेशानी है किनारा हमेशा ही उससे किसी न किसी बात को लेकर बहस कर बैठता था।

तुम यहां से वहां भटकती हो इस पार से उस पार तक हमेशा घूमती हो
घूमती ही रहती हो घुमक्कड़ो की तरह,किनारे ने इतना ही कहा और
नाव नाराज हो गयी और बोली- तुम पुरूषो को महिलाए केवल इधर उधर घूमती ही नजर आती है।उनका कार्य उनकी मेहनत कभी भी नही दिखती।मै दिनभर कार्य करती हूं और तुम ,तुम तो यहां से वहां तक नही जाते हमेशा एक ही स्थान पर खडे रहते हो।
मै दूर खडा उन दोनो की बाते सुन रहा था अगर पास जाता तो वो शायद चुप हो जाते।तुम हजारो यात्रियों को पार करती हो और वो मुझे कुचलते हुए निकल जाते है।यह किनारे ने कहा
तो नाव बोली- व्यक्ति को स्वयं को सौभाग्यशाली समझना चाहिए कि वह दूसरो के काम आ रहा है।
अगर तुम यहां ना हो तो यात्री किसके सहारे मुझपर सवार हो।
किनारा नाव की बाते सुनकर शान्त हो गया।बरसो बीत गये ।नाव लगन से अपना कार्य करती रही।
हजारो को लाती और हजारो को ले जाती।नाव ने अपने कार्य मे कुशलता हासिल की मगर आज भी कोई उसकी तारीफ नही करता।

एक रात की बात नदी व किनारा दोनो सो रहे थे ।नाव खडी अपने किसी सवार का इन्तजार कर रही थी।करीब आधी रात का वक़्त एक
धूलभरा तूफान वहां से गुजरा और नदी मे खलबली मच गयी।।नदी का पानी किनारे तोडकर आगे बढ गया।नदी कई बार ऊपर उठी और कई बार नीचे गिरी।किनारा बेहद घबरा गया।नदी का यह विकराल रूप उसने पहले कभी नही देखा था।

किनारे ने देखा कि उसकी नाव नदी की लहरो के बीच बही जा रही है।
किनारा चिल्लाया – रूको रूको।
कोई रोको नदी मेरी नाव को ले जा रही है।
नाव उलट पलट हो रही थी।पानी का बहाव बहुत तेज था ।नदी नाव को पटक रही थी।नाव घबरा गयी वो अंदर से पूरी तरह कांप उठी।उसने नदी का इतना भयानक रूप कभी नही देखा था।उधर किनारा उसे आँवाज लगा रहा था।
मगर नाव कुछ ना बोल सकी ।उसके शब्द भय मे बिंध चुके थे । उसने बार बार उठने का प्रयास करती मगर हर बार नदी उसे पटक देती ।वह घबरा गयी।शायद उसका अन्तिम समय करीब था।
किनारा चिल्ला या – कोई उसे बचा लाओ उसने हमेशा दूसरो की सहायता की है।मगर आज किसी को नाव की परवाह नही थी।नाव ने दबी हुई आवाज मे आखिरी बार किनारे को पुकारा- बचाओ मुझे
उसने अन्तिम क्षण मे दोनो हाथ फेला लिए सिर्फ इस आशा से
कि किनारा उसे थाम लेगा।
मगर किनारा एक कदम भी आगे न बढ सका। बहुत प्रयास किये मगर विफल रहा।
वह ईश्वर पर चिल्लाया- इतने बेबस और लाचार की धरती पर कोई आवश्यकता नही जो आगे बढकर अपने मित्र को ना बचा सके।
उसने स्वं को धिक्कारा ।नाव नदी की गोद मे समा गयी।
किनारा पुकारता रह गया,नाव ,मेरी नाव ,वापस लौट आऔ ।
मगर अब नाव वहां नही थीवो तो नदी की गोद मे सो चुकी थी।
किनारा रो पडा, उसकी आँखो से आंसू छलक पडे।और मेरी आंखो से भी,कागज गीला हो गया और कलम रूक गयी और मुझसे पूछा क्या नाव कभी वापस नही आयेगी।
मेरे पास उसके सवालो का जवाब नही था।
कैसी अजीब विडम्बना थी ,संसार पडा सो रहा था।http://vashitsh.blogspot.com
किनारा आशा भरी नजर से उस ओर देखता रहा कि शायद नाव उसे कहीं दिख जाए।कुछ देर बाद तुफान लौट गया।नदी शान्त हो गयी।
धूलभरा आसमान छट गया।किनारा सुबह होने का इन्तजार कर रहा था। सुबह हुई सूर्य भगवान ने दस्तक दिए ,चारो ओर प्रकाश फैल गया।
दूर रेत के ढेर पर नाव खडी थीऔर उसपर एक चिडिया बैठी थी।वो अपने किनारे पर फिर कभी लोटकर नही आयी।
किनारा आने वाले यात्रियों से उसकी तारीफ करता है मगर वो अब नही सुनती।
आज किनारा अकेला है ,
बिल्कुल अकेला…………………….

                   नाव नाराज थी      (सत्यता को उजागर करती   निर्जीव नाव की जीवन्त कहानी।

कहानीकारा व लेखिका – मीनू रानी)

This blog is posted by – Meenu Rani
Dated-11-09-2017

मै कोई शक्स नही ,नदी मे नाव जैसी हूँ।
हजारो को पार किया फिर भी, खुद कभी पार ना हो सकी।।

नाव को बस इसी बात का गम था कि रोज हजारो को उनके गन्तव्य पर पहुंचाती,बिना किसी भेदभाव बिना किसी लालच और अपने पराये की भावना के मगर फिर भी कोई उसकीतारीफ के दो शब्द नही कहता था।
वो घण्टों धूप और बरसात मे किनारे पर खडी रहतीतो बस इसी आशा से कि कोई सवार आए। हमेशा सहायता की भावना लिए उतने ही जोश और लगन के साथ जितना की कोई पिता अपने बालक की परवरिश के लिए करता है।यह संसार भी उस नाव की कहानी जैसा ही तो है जो एक व्यक्ति के ऊपर सवार होकर अपने गन्तव्य पर पहुंचना चाहता है।प्रत्येक को अपने गन्तव्य की चिंता हैमगर उस नाव की नही जो सबकी चिंता करके सबका भार सहन करती है और बस एक आशा कि कोई तो अपने मुंह से उसकी तारीफ मे दो शब्द कहेगा।नाव हजारो को लायी और हजारो को ले गयी और दिन मे धूप मे घण्टों किनारे पर खडी रही।किनारा बोला-कि कोई सवार नही है शायद जो यहां आ खडी हुई।
क्यो तुम्हें मेरे घडी भर आराम से भी परेशानी है किनारा हमेशा ही उससे किसी न किसी बात को लेकर बहस कर बैठता था।

तुम यहां से वहां भटकती हो इस पार से उस पार तक हमेशा घूमती हो
घूमती ही रहती हो घुमक्कड़ो की तरह,किनारे ने इतना ही कहा और
नाव नाराज हो गयी और बोली- तुम पुरूषो को महिलाए केवल इधर उधर घूमती ही नजर आती है।उनका कार्य उनकी मेहनत कभी भी नही दिखती।मै दिनभर कार्य करती हूं और तुम ,तुम तो यहां से वहां तक नही जाते हमेशा एक ही स्थान पर खडे रहते हो।
मै दूर खडा उन दोनो की बाते सुन रहा था अगर पास जाता तो वो शायद चुप हो जाते।तुम हजारो यात्रियों को पार करती हो और वो मुझे कुचलते हुए निकल जाते है।यह किनारे ने कहा
तो नाव बोली- व्यक्ति को स्वयं को सौभाग्यशाली समझना चाहिए कि वह दूसरो के काम आ रहा है।
अगर तुम यहां ना हो तो यात्री किसके सहारे मुझपर सवार हो।
किनारा नाव की बाते सुनकर शान्त हो गया।बरसो बीत गये ।नाव लगन से अपना कार्य करती रही।
हजारो को लाती और हजारो को ले जाती।नाव ने अपने कार्य मे कुशलता हासिल की मगर आज भी कोई उसकी तारीफ नही करता।

एक रात की बात नदी व किनारा दोनो सो रहे थे ।नाव खडी अपने किसी सवार का इन्तजार कर रही थी।करीब आधी रात का वक़्त एक
धूलभरा तूफान वहां से गुजरा और नदी मे खलबली मच गयी।।नदी का पानी किनारे तोडकर आगे बढ गया।नदी कई बार ऊपर उठी और कई बार नीचे गिरी।किनारा बेहद घबरा गया।नदी का यह विकराल रूप उसने पहले कभी नही देखा था।

किनारे ने देखा कि उसकी नाव नदी की लहरो के बीच बही जा रही है।
किनारा चिल्लाया – रूको रूको।
कोई रोको नदी मेरी नाव को ले जा रही है।
नाव उलट पलट हो रही थी।पानी का बहाव बहुत तेज था ।नदी नाव को पटक रही थी।नाव घबरा गयी वो अंदर से पूरी तरह कांप उठी।उसने नदी का इतना भयानक रूप कभी नही देखा था।उधर किनारा उसे आँवाज लगा रहा था।
मगर नाव कुछ ना बोल सकी ।उसके शब्द भय मे बिंध चुके थे । उसने बार बार उठने का प्रयास करती मगर हर बार नदी उसे पटक देती ।वह घबरा गयी।शायद उसका अन्तिम समय करीब था।
किनारा चिल्ला या – कोई उसे बचा लाओ उसने हमेशा दूसरो की सहायता की है।मगर आज किसी को नाव की परवाह नही थी।नाव ने दबी हुई आवाज मे आखिरी बार किनारे को पुकारा- बचाओ मुझे
उसने अन्तिम क्षण मे दोनो हाथ फेला लिए सिर्फ इस आशा से
कि किनारा उसे थाम लेगा।
मगर किनारा एक कदम भी आगे न बढ सका। बहुत प्रयास किये मगर विफल रहा।
वह ईश्वर पर चिल्लाया- इतने बेबस और लाचार की धरती पर कोई आवश्यकता नही जो आगे बढकर अपने मित्र को ना बचा सके।
उसने स्वं को धिक्कारा ।नाव नदी की गोद मे समा गयी।
किनारा पुकारता रह गया,नाव ,मेरी नाव ,वापस लौट आऔ ।
मगर अब नाव वहां नही थीवो तो नदी की गोद मे सो चुकी थी।
किनारा रो पडा, उसकी आँखो से आंसू छलक पडे।और मेरी आंखो से भी,कागज गीला हो गया और कलम रूक गयी और मुझसे पूछा क्या नाव कभी वापस नही आयेगी।
मेरे पास उसके सवालो का जवाब नही था।
कैसी अजीब विडम्बना थी ,संसार पडा सो रहा था।http://vashitsh.blogspot.com
किनारा आशा भरी नजर से उस ओर देखता रहा कि शायद नाव उसे कहीं दिख जाए।कुछ देर बाद तुफान लौट गया।नदी शान्त हो गयी।
धूलभरा आसमान छट गया।किनारा सुबह होने का इन्तजार कर रहा था। सुबह हुई सूर्य भगवान ने दस्तक दिए ,चारो ओर प्रकाश फैल गया।
दूर रेत के ढेर पर नाव खडी थीऔर उसपर एक चिडिया बैठी थी।वो अपने किनारे पर फिर कभी लोटकर नही आयी।
किनारा आने वाले यात्रियों से उसकी तारीफ करता है मगर वो अब नही सुनती।
आज किनारा अकेला है ,
बिल्कुल अकेला…………………….

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