फिर मुझको लौटा दो बचपन का सावन – नीलम सोनकर

फिर मुझको लौटा दो बचपन का सावन – नीलम सोनकर

कच्चे नीम की निबौरी, सावन जल्दी आइयो रे
अम्मा दूर मत कीजौ, दादा नहीं बुलवेंगे
भाभी दूर मत कीजौ, भैया नहीं बुलावेंगे
प्रकृति का उल्लास है सावन | इस मौसम में प्रकृति अपना रंग रूप जिस तरह परिवर्तित करती वह सभी का मन मोह लेती | सावन का नाम सुनते ही मन वर्षा ऋतु के आनंद में डूब जाता, वर्षा अपने आप में नई वधू जैसी ऐसी दिखाई पड़ती, मानों वह अपने सारे श्रृंगार करके सुसज्जित होकर बिजली के रूप में दैदीपय्मान हो उठती | सावन के आते ही बच्चों का पानी में कागज की कस्ती तैराने का मजा और छप-छप करते पानी में कूदना, झूले और पेंग लेकर मल्हार गाती युवतियां सावन की मस्ती को नया अंदाज देती नज़र आती थी | लेकिन वक़्त ने इस अंदाज को लगभग बदल सा दिया है अब न कागज़ की कस्ती है और न ही यौवन की मस्ती | जैसे- जैसे गंवई, शहरी और सभ्य बनते जा रहे है वे अपनी संस्कृति को भूलते ही जा रहे है मिट रही हैं हमारी परम्पराएँ | कई आँखें तो ऐसी है जिनकी आँखों में आज तक सावन ने दस्तक ही नहीं दिया है उन्हें तो ये भी मालूम नहीं कि क्या होता है सावन ? क्यूँ डाला जाता है सावन में झूला ?
सावन के वो क्या दिन हुआ करते थे जब बच्चे भी सावन को अपने रंगों में रंग देते थे और सावन में वर्षा ऋतु का स्वागत करने निकल पड़ते थे अपने घरों से | पानी में दौड़ते बच्चे सभी को संदेशा देते कि सावन का आगमन हो गया है वर्षा की बूंदों से भीगते, नदियों और तालाबों में गोते लगाते मौज-मस्ती से सावन का लुफ्त उठाते और नदियों में बच्चे कागज की कस्ती बना कर तैराते साथ ही प्रतिस्पर्धा भी करते थे कि किसकी नाव डूबेगी और किसकी नाव आगे तक जाएँगी, जिसकी नाव पीछे रह जाती वो अपनी नाव उठा कर आगे कर देता और अपने को विजयी घोषित कर देता यही प्रतिस्पर्धा सावन तक चलती रहती | नाव के बाद प्रतिस्पर्धा शुरू होती थी झूला झूलने की | बच्चों के झूले पेड़ पर पड़ी रस्सी या बेकार पड़े टायरों का बना होता था इसी पर झूलते गिरते संभलते थे | मस्तियातें बतियाते बच्चे वर्षा में भी दिन भर झूला झूलते, अपनी ख़ुशी का इजहार करते, साथ ही लड़ते झगड़ते बारी – बारी से झूला झूलते थे और अपने बारी आने तक इन्तिज़ार करते, शाम होते कोई उछलते कूदते, तो कोई झूला न झूल पाने के कारण रो-रोकर घर की ओर चले जाते थे और अगले दिन फिर आने का आश्वासन देते | कोई इन बच्चों से पूछे सावन के बारे में जिन्हें मालूम है क्या होता है बचपन का सावन?
आज की वयस्क जिंदगी में कहाँ किसके पास समय है कि जाने सावन होता क्या है? आर्थिक विसंगतियां, प्रतिकूल परिस्थितियां और कुछ तो प्रतिस्पर्धा के कारण भी बाधक है जो हमें सावन को भूलने को मजबूर कर देती है | हर माता-पिता चाहते है कि उनका बच्चा हर चीज़ में सबसे आगे हो, अब बच्चों की कागज की कस्ती डूब चुकी है और अब प्रतिस्पर्धा होती है तो सिर्फ सबसे आगे बढने की| पहले के समय में बच्चों को पढ़ाई लिखाई का कोई भय नही होता था और न ही बीमार होने का कोई डर था वो तो अपना बचपन जी रहे होते थे | मन आज भी उल्लसित हो झूले – झूलने और मल्हार गीत गवाने की मनोहरी छटाएं देखने को तरस जाती है जहाँ पहले युवतियां नई नवेली वेशभूषा से सुसज्जित होकर घरों में झूले डालती थी या अपनी-अपनी सहेलियों के साथ झुंड बनाकर चल पड़ती थी पेड़ की शाखाओं में लगे झूले पर झोटे लेने, पेंग बढ़ाती हुई मल्हार गीत गाती थी उनको देखकर मन की उन्मुक्ता का एहसास होता था | वे युवतियां पेंग बढ़ाती बादलों से बरस जाने का अनुरोध भी करती थी युवतियों के इन समूहों में वर्षा के गीतों की एक प्रतिस्पर्धा सी हो जाती है | सावन के गीतों की एक होड़ सी लग जाती थी एक समूह एक गीत शुरू करता तो दूसरा भी अपना गीत गाने लग जाता, एक के बाद एक निरंतर वर्षा के गीतों का बहुत बड़ा मेला लग जाता था | इन गीतों में युवतियां अपने माता-पिता, सगे-संबंधियों से यह आग्रह करती थी कि उनका विवाह कहीं पास के गाँव में ही किया जाए, न कि कहीं ज्यादा दूर के गाँव में, अन्यथा कही ऐसा न हो कि उसके माता-पिता और सगे-संबंधी सावन के महीने में उसे अपने घर बुला भी न पाएं अपने इस आग्रह में साक्ष्य के रूप में वे नीम की कच्ची निबौरी को भी के लेती है |
उधर प्रेयसी अपने प्रेमी से मिलने को तड़फ उठती थी सावन के झूले पड़े और प्रेयसी अपने प्रेमी से जुदा रहे ! प्रेयसी भी सावन के इस अनोखे अंदाज से नही बच पाई थी | प्रेयसी के दिल की पुकार यही तो होती थी “ सावन के झूले पड़े तुम चले आओ ’’ इस पुकार में अजब कसक भरी होती थी | ऐसी कसक जो प्रेमी को अपनी ओर आकर्षित करती थी ऐसे में प्रेमी साथ हो तब तो मन यहीं गाएंगा “ रिमझिम के गीत सावन गाएं ’’ सावन की फुहारें पूरी फिजा में बहारें भर देती थी , फिर यह कैसे हो सकता था की प्रेमीगण इनके संग आवाज मिलाने से रह जाये | ऐसे में प्रेयसी यही चाहती थी की उसका प्रेमी उसके साथ हो क्योंकि उसके लिए यह सावन अनमोल होता था जहाँ कुछ पल वह अपने प्रियतम के साथ बिताना चाहती थी और प्रेमी –प्रेमिका मस्त होकर झूला – झूलते और गीत-गातें “ आया सावन झूम के’’ में मग्न मुग्ध हो जाते थे और इस सावन के लम्हों को जी लेते थे पर जिन पेड़ों पर झूले डालें जाते थे आज वो या तो कट गए है, या तो वह जगह विरान पड़ी हुई है जहाँ पहले मल्हार गीतों की गूंज सुनाई पड़ती थी और प्रेयसी को अपने प्रेमी से मिलने की तड़फ दिखाई देती थी अब वो सब निशा मिट गए | अब न ही पेड़ है, न ही शोख अदाओं के साथ सावन का स्वागत किया जाता है | सावन कब हमारे सिरहाने आकर चुपचाप चला जाता है हमें पता ही नहीं चलता | आज फिर से मन सावन में झूमने को मचल रहा है और दिल की पुकार यही कह रही
फिर मुझको लौटा दो बचपन का सावन…..

Neelam Sonkar नीलम सोनकर
लखनऊ

(उतर प्रदेश)

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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comments
  • बहुत बढ़िया लेख…..शब्दों का अच्छा ताल -मेल है।

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  • Bahut sunder good going aise hi likhate rahana

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