रेलवे का खाना इंसानों के खाने के लायक नहीं – वीरेंद्र देवांगन

रेलवे का खाना इंसानों के खाने के लायक नहीं – वीरेंद्र देवांगन

कैग (कंट्रोपटोलर एंड आडीटर जनरल) द्वारा संसद में रिपोर्ट खुलासा किया गया है कि रेल्वे का खाना इंसानों के खाने लायक नहीं है। गौरतलब है कि देषभर में रोजाना 13 हजार से अधिक ट्रेनें चलाई जा रही हैं, जो 7000 स्टेषनों को कवर करता हुआ, 2.20 करोड़ लोगों को सफर करवा कर यहां से वहां पहुंचा रहा है। निस्संदेह कैग का रिपोर्ट रेलवे में बड़ी विसंगति, विरोधाभास, लापरवाही और भ्रष्टाचार की ओर इंगित करता है; जिसका अंदाजा शायद सरकार को भी नहीं है। तभी तो पूर्व में भी खुलासे किए जाने के बावजूद सुधार की दिषा में कोई कार्रवाई नहीं कर केटरिंग ठेकेदारों और भोजन माफियाओं के आगे घुटने टेक दी है।
सीएजी और रेलवे की संयुक्त टीम ने 74 स्टेषनों और 80 टेªनों का निरीक्षण करने के बाद यह प्रतिवेदन तैयार किया है। प्रतिवेदन में कहा गया है कि खाद्य पदार्थ, रिसाइकिल किया हुआ खाद्य पदार्थ, डब्बाबंद व बोतलबंद वस्तु का उपयोग, उस पर लिखी अंतिम तारीख के बाद भी धड़ल्ले से किया जा रहा है। रेलवे परिसरों, रसोईयानों व टेªनों में साफ-सफाई का बिलकुल ध्यान नहीं है। टेªनों में बिक रही चीजों का बिल न दिया जाकर खाद्य गुणवत्ता में अनेक खामियां पाई गई हैं। टेªनों में पेय पदाथों को तैयार करने के लिए नल से सीधे अषुद्ध पानी लिया जा रहा है। खाने-पीने की चीजों को मक्खी, कीड़ों, चींटियों व धूल से बचाने के लिए ढं़ककर नहीं रखा जा रहा है। टेªनों में चूहे, काॅकरोच धूमते देखे जा रहे हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सात रेलवे जोन्स में कैटरिंग सर्विस के लिए प्रावधानों का ब्लूप्रिंट तक तैयार नहीं किया गया है। पालिसी में बार-बार बदलाव करने से यात्रियों को कैटरिंग सर्विस मुहैया करानेवाले मैनेजमेंट का बेतरतीब रहने का संकट छाया रहता है। रिपोर्ट में आगे यह भी कहा गया है कि खानपान की इकाईयों को आईआरसीटीसी को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया को सुगम बनाया जाए।
सचमुच, यह रेलयात्रियों के खिलाफ सरासर धोखा, बदमाषी और अपराध है। रेलयात्री मजबूरी में रेल का खाना खाता है, जो स्वादहीन, पौष्टिकहीन और जानवरों के खाने लायक होता है। रेलवे ने क्या अपने यात्रियों को जानवर समझ रखा है? इसके बावजूद रेलवे के जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं किया जाना, अनेक संदेहों को जन्म देता है।
यदि ऐसा है, तो रेलवे के खिलाफ आपराधिक केष दर्ज किया जाना चाहिए। रेलवे के आलाधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट में खड़ा किया जाना चाहिए। वहां से उनपर कार्रवाई करवाया जाना चाहिए, तभी इनके कानों में जूॅं रेगेंगी। हम रेलवे के बाहर के खाद्य पदार्थो पर हुई मिलावट के लिए खूब होहल्ला मचाते हैं, षिकायतें करते हैं, कार्रवाई करवाते हैं, लेकिन रेलवे का सड़ा-गला खाना खाकर चुप हो जाते हैं। यह दोहरी मानसिकता बदलनी होगी, तभी कुछ सुधार संभव है, अन्यथा सब चलता है कि तर्ज पर आगे भी चलता रहेगा। हम खाद्य माफियाआंे व अपराधियों के हाथों यूूंॅ ही ठगाते रहेंगे।
मुंबई का एलफिंस्टन रेलवे स्टेषन हादसा को स्मरण कीजिए, जिसमें प्रथम दृष्टया रेलवे के अधिकारियों की सुरक्षा संबंधी चूक नजर आता है। मगर इसमें हुआ क्या? रेलवे के आलाधिकारियों के जांच रिपोर्ट में कहा गया है यह हादसा अफवाह और बारिष का नतीजा है। जबकि सुरक्षा संबंधी लापरवाही सुस्पष्ट है। वाह रे रेलवे! तेरा जवाब नहीं।
तिस पर तुर्रा यह कि भारतीय रेल सुपरफास्ट टेªन, हाईस्पीड ट्रेन, मेट्रो टेªन और बुलेट टेªन चलाने का दंभ भर रहा है। क्या यह आधुनातन सुरक्षा के मानकों को ताक में रखकर किया जाएगा? सोचनीय है।
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वीरेंद्र देवांगन
आनंद बिहार काॅलोनी, फेस-1
ब्लाॅक-ए, फ्लेट नं. 403,
बोरसी, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
मोबाईल-9406644012

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