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स्कूल की फीस-वेद-प्रकाश

स्कूल की फ़ीस
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शहर के सबसे आलीशान कॉन्वेंट स्कूल के सामने ,जिला कलेक्टर की बत्ती वाली गाड़ी आकर रुकी।
स्कूल के सभी स्टाफ चौकन्ना होकर अपने कार्य में लग गए। स्कूल के प्रांगण में एक सन्नाटा सा छा गया।
स्कूल के प्रिंसिपल, डीएम साहब को सम्मान सहित अपने कक्ष में बैठाए एवं आदर-सत्कार किए।
प्रिंसिपल कक्ष में बातचीत के दौरान डीएम साहब ने बताया कि वह भी इसी स्कूल के विद्यार्थी रहे है।
स्कूल में आकर पूर्व की स्मृतियां उनके मस्तिष्क में फिर से ताज़ा हो गई।
बातों ही बातों में वह बड़े भावुक हो गए।और अपने जीवन के संघर्षों की कहानी सुनाने लगे।

मेरे पिता शहर के कारखाने में मजदूर हुआ करते थे।जिनकी कारखाने मै ही दुर्घटना का शिकार होकर मृत्यु
हो गई थी।  हम लोगों को एक आशा थी कि कारखाने के मालिक सहायतार्थ कुछ धन राशि प्रदान करेंगे।परंतु कारखाने के तरफ से हमे किसी प्रकार का कोई मुयावजा
नहीं मिला।
मेरे परिवार में मेरे अलावा मां और एक छोटी बहन थी
मां अक्सर बीमार ही रहा करती थी।घर में आय का कोई निश्चित साधन नहीं होने के कारण जीवन अत्यन्त गरीबी में बीत रहा था।
कई महीनों से मै अपनी फीस भरने में भी असमर्थ था।
उन दिनों के प्रिंसिपल साहब ने एक दिन मुझे अपने कक्ष
में बुलाकर कहां “तुम्हारी फ़ीस कई महीनों से बाकी है अगर आज तुमने अपनी फ़ीस जमा नहीं की तो तुम्हारा नाम स्कूल से कट जाएगा मुझे भी ऊपर जवाब देना होता है कायदे कानून के हिसाब से चलना पड़ता है”

मैंने पूछा – ” तो क्या सर मै आगे पढ़ नहीं पाऊंगा”
प्रिंसिपल साहब -तो मै क्या करू, तुम जा सकते हो

दुःखी मन से मैंने क्लास में जाकर अपना बस्ता उठाया
और स्कूल से बाहर आकर मैदान में  रोने लगा।
मै अत्यन्त पीड़ा का अनुभव कर रहा था।घर जाता तो मां पूछती कि इतनी जल्दी घर क्यों आ गए तो यह बताने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था कि फ़ीस जमा नहीं करने के कारण मुझे स्कूल से निकाल दिया गया।
मै घंटो मैदान में बैठा रहा और अपनी किस्मत पर रोता रहा। तभी किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा पीछे मुड़ के देखा तो स्कूल के चपरासी रामू काका थे।
उन्होंने मुझसे पूछा “बेटा तू इतनी धूप में यहां क्यों बैठा है और तू रो क्यों रहा है”

मैंने सब कुछ सच सच बता दिया कि फ़ीस नहीं जमा करने के कारण मेरा स्कूल से नाम काट दिया गया

वह बोले “ऐसे कैसे तेरा स्कूल से नाम काट दिया गया।तुम तो एक होनहार छात्र हो हर क्लास मै अब्बल आते रहे हो
तुम चलो मेरे साथ मै प्रिंसिपल साहब से बात करता हूं

वह मुझे लेकर प्रिंसिपल साहब के कमरे तक लेकर गए।परंतु मुझे कमरे से बाहर रहने को कहकर खुद कमरे में चले गए।प्रिंसिपल साहब से उनकी क्या बात हुई मुझे पता नहीं परंतु बाहर निकल कर वह बड़े प्रसन्न दिखाई पड़ रहे थे।वह मुझे बताए कि “बेटा तुझसे अब इस स्कूल में कोई फ़ीस नहीं मांगेगा, मन लगाकर पढ़ाई करोऔर अपने मां बाप का नाम रौशन करो । प्रिंसिपल साहब से कहकर मैंने तुम्हारी फ़ीस माफ करा दी है।”

डीएम साहब बड़े भावुक स्वर में बोले आज मैं जिस मुकाम पर हूं उसमे प्रिंसिपल साहब का बड़ा योगदान है
आप कृपया उनका फोन नंबर और ऐड्रेस दे दीजिए।
मै उनके घर जाकर उनका शुक्रिया अदा करना चाहता हूं

प्रिंसिपल सर ने कहा ठीक है मै आपको उनका नंबर और एड्रेस दे दूंगा ।आप इस स्कूल के लिए प्रेरणस्रोत है
अगर आपको आपत्ती ना हो तो  मैं स्कूल के समस्त छात्रों से आपकी मुलाकात कराना चाहता हूं ताकि वह आपको अपना आदर्श मानकर अपने जीवन में प्रगति कर सके।

सभी छात्रों को स्कूल के हाल में एकत्रित किया गया।
प्रिंसिपल साहब ने बड़े प्रभावशाली ढंग से डीएम साहब का introduction दिया।
डीएम साहब ने भी स्कूल से जुड़े सभी खट्टे मीठे अनुभवों
को छात्रों से शेयर किए जिससे छात्रों का भी खूब मोटिवेशनल हुआ।

वर्तमान प्रिंसिपल साहब ने पूर्व के प्रिंसिपल साहब का फोन फोन नंबर रिकॉर्ड में से खोज निकाला
फोन करने पर फोन उनके सुपुत्र ने उठाया और बताया की पिताजी अभी हॉस्पिटल में भर्ती है डॉक्टरों ने उन्हें  किसी से ज्यादा बात करने से मना किया है।आपको जो कुछ भी कहना या पूछना है वॉट्सएप पर मैसेज करे ।पिताजी
पढ़ कर जवाब दे देगे।

प्रिंसिपल साहब ने समस्त धटना को लिखकर सेंड कर दिए।और उनके जवाब का इंतजार करने लगे।
लगभग आधे घण्टे के बाद उनका जनाब आया।जो सबको आश्र्यचकित और हैरान करने बाला था।
उन्होंने लिखा था”मै उस प्रतिभाशाली छात्र को कभी नहीं भूल सकता,वह बड़ा ही होनहार था स्कूल की फीस जमा नहीं करने के कारण मैंने उसे स्कूल से निकाल दिया था
परन्तु स्कूल के चपरासी रामू ने अपनी तनख्वाह में से उसकी फ़ीस कटवाकर उसे इस स्कूल में पढ़ने का अवसर प्रदान किया था।
उससे कहो की शुक्रिया अदा करना है तो तो वह रामू का अदा करे मै इस काबिल नहीं हूं कि मेरा शुक्रिया अदा किया जाए ।उसने मुझे यह बात किसी से बताने को मना किया था।”

यह जनाब सुनकर सभी स्टाफ के होश उड़ गए।क्या वास्तविक में कोई इतना महान हो सकता है

यह सब जानकर डीएम साहब भाव विभोर हो गए । उनकी आंखो से अश्रु धारा बहने लगे।
रामू का घर स्कूल के पास ही था। अतः उन्होंने तनिक भी देर नहीं की,गाड़ी में  बैठे और ड्राइवर को चलने का आदेश दिया।
प्रिंसिपल साहब और स्कूल के समस्त स्टाफ इस मिलन के अदभुत दृश्य को देखने डीएम साहब के पीछे पीछे रामू के घर तक पहुंचे।
नौकरी से रिटायर होने के पश्चात वह दिन भर खेतों में काम किया करता था।उसके कपड़े पसीने से भीगे हुए थे।शरीर पर धूल मिट्टी लगी थी।परंतु चेहरे पर अजीब सी प्रसन्नता दिखाई पड़ रही थी।
डीएम साहब रामू के पैर छूते है और कहते है आपने जो मेरे लिए किया मै उसके लिए शुक्रिया अदा करू तो यह बहुत छोटी बात होगी। मै जीवन भर आपका आभारी रहूंगा।

रामू को समझने में तनिक भी देर नहीं लगी कि यह वही लड़का है जिसकी फ़ीस 7बरसो तक उसने भरी थी।
वह बहुत भावुक होकर बोला “उस दिन ईश्वर का आदेश मुझे साफ सुनाई दे रहा था कि तू इस बच्चे की मदद कर
मै बहुत छोटा आदमी हूं पढ़ा लिखा भी ज्यादा नहीं हूं
परन्तु शिक्षा के महत्व को मै भली-भांति समझता हूं
इसलिए मै एक होनहार छात्र को बर्बाद होते नहीं देख सकता था
डीएम साहब ने रामू और उसकी धर्मपत्नी को अपनी गाड़ी में बैठाए और आजीवन पिता समान सेवा का बचन देकर अपने साथ ले गए ।स्कूल के समस्त स्टाफ प्रसन्नता से ताली बजाने लगे

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