वो एक मुलाकात- प्रियंका शुक्ला

वो एक मुलाकात- प्रियंका शुक्ला

1994 में आयी एक फिल्म विजयपथ का एक बहुत ही खूबसूरत गीत है जिसे ऐसा कोई भी नहीं है, जिसने नापसन्द किया हो। गीत के बोल हैं –
राहों में उनसे मुलाकात हो गयी, जिससे डरते थे वही बात हो गयी….

मतलब ये कि ज़िन्दगी के किस मोड़ पर कौन सी ऐसी मुलाकात हो जाये जो हमारे जीवन को पूरी तरह बदल के रख दे। ऐसी ही एक मुलाकात थी योगेश और अवन्ति की ।
योगेश एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, जो कि कानपुर की प्रतिष्ठित कम्पनी में नौकरी कर रहा था, अभी उसे तीन महीने ही हुए थे और उसके घर से खुशखबरी आयी कि उसकी बड़ी बहन की शादी बिजनौर के एक प्रतिष्ठत परिवार में तय हो गयी है और एक हफ्ते बाद ही सगाई है। आज योगेश ने दफ्तर का काम जल्दी निपटाकर उसने कुछ खरीददारी की और घर जाकर पैकिंग का काम रात में ही खत्म कर लिया क्योंकि उसे कल सुबह पाँच बजे की बस से बिजनौर के लिए निकलना था । हल्की ठण्ड में ठीक पाँच बजे योगेश बस पकड़ कर बिजनौर के लिए रवाना हो जाता है। योगेश खिड़की से बाहर की ओर देख रहा था घर के ख्यालों में खोया था, तभी अचानक बस रुकती है और एक खूबसूरत लड़की उसके बगल में आकर बैठती है । कुछ देर बाद जैसे ही योगेश की नज़र अपनी बगल वाली सीट पर पड़ती है तो वह अपने ख्यालों से बाहर आ जाता है मानो किसी ने उसके दिल में दस्तक दी हो। शायद ये सफर योगेश के जीवन की गाडी को नये ही सफर पर ले जाने वाला था । कुछ तक तो दोनों शान्त बैठे थे पर थोड़ी देर बाद चंचल स्वभाव वाली अवन्ति बोली – हाय ! मेरा नाम अवन्ति है, और आप….?
योगेश बहुत ही शान्त स्वभाव का लड़का था और अवन्ति बिल्कुल उसके विपरीत थी हँसमुख और चंचल । अवन्ति की ये बातें योगेश को और आकर्षित कर रही थी। उसने मुस्कुराकर संकोची स्वाभाव में जवाब दिया – मेरा नाम योगेश है।
इस तरह से उनके बीच बातें शुरु हो गयीं। और इस लम्बे सफर में वो कब अच्छे दोस्त बन गये पता ही नहीं चला । इसी दौरान योगेश ने बताया की वो कानपुर में ही नौकरी करता है और उसकी बहन की सगाई है इसीलिए वो अपने घर बिजनौर जा रहा है और वो अवन्ति से कुछ पूछता उससे पहले ही वो बोल पड़ी की वो भी बिजनौर से है और कानपुर के आर. एन. एस. गर्ल्स हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रही है और अपने माँ-पापा से मिलने जा रही है। सर्दी का मौसम था तो बस ड्राइवर ने यात्रियों के चाय पीने के लिए बस रोकी । सर्द मौसम को देखते हुए योगेश और अवन्ति भी चाय पीने के लिये बस से उतरे । बस से उतरते समय अवन्ति का स्कार्फ गिर जाता है जिसे उससे पहले योगेश का उठा कर देना इस ओर इशारा कर रहा था कि योगेश के दिल में अवन्ति के लिए प्यार का बीज अंकुरित हो रहा है। शायद अवन्ति भी इस बात को महसूस कर रही थी । दोनों ने चाय की चुस्कियों के साथ ढ़ेर सारी बातें की और वापस बस में आ गये और फिर से अपनी बातों में खो गये। अवन्ति को भी इस बात का एहसास हो रहा था कि योगेश उसका ख्याल एक दोस्त से बढ़कर रख रहा है पर अवन्ति को इस अहसास की अनुभूति अच्छी लग रही थी । बातें करते करते वो दोनों कब सो गये उन्हे पता ही नहीं चला उनका आधा सफर लगभग तय हो चुका था और दोपहर के दो बज रहे थे तभी अचानक बस रुकती है और कन्डकटर आकर कहता है कि बस थोड़ी देर के लिए रुकी है जिसे कुछ खाना पीना हो खा पी लो। योगेश अवन्ति को जगाता है और कहता है कि – भूख लगी होगी चलो खाना खाते हैं । सभी लोग ढ़ाबे पर जाकर खाना खाते हैं उन्हे देखकर तो ऐसा बिल्कुल नहीं लग रहा था कि वो अभी मिले हैं या वो अनजान हैं। वो भी शायद इसलिए क्योंकि योगेश अवन्ति को मन ही मन चाहने लगा था और वो उसका पूरा ख्याल रख रहा था । योगेश की नज़रे अवन्ति से हट ही नहीं रही थी। खाना खाने के बाद सभी लोग बस में जाकर बैठ गये और बस वहाँ से चल दी । पूरी बस में सन्नाटा था सभी लोग सो गये थे । सिर्फ अवन्ति और योगेश जगे हुए थे और बातें कर रहे थे। मन ही मन ये पहली मुलाकात योगेश के लिए बहुत खास बन गयी थी और वो चाहता था की ये सफर कभी खतम ही न हो अवन्ति से उसे कभी दूर ना जाना पड़े । ये सोचते सोचते सफर कब खतम हो गया और कब वो कानपुर से बिजनौर पहुँच गये उन्हे पता ही नहीं चला । इस पूरे सफर में योगेश ने अवन्ति को अपने दिल की बात बताने की कोशिश की पर हिम्मत नहीं कर पाया । उसे तो ये भी नहीं पता था कि अवन्ति उसके बारे में क्या सोचती है। और उसके दिल की बात बाहर आती इससे पहले उनका सफर खतम हो गया और दोनों ने एक दुसरे को अलविदा कह दिया ।
योगेश और अवन्ति अपने-अपने घर पहुँचकर अपने अपने कामों में लग गये। योगेश भी अपनी बहन की सगाई का कार्यक्रम खतम करके कानपुर लौटने लगा और उसे इस बार फिर अवन्ति के आने की उम्मीद थी। पर इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ और कानपुर वापस लौटकर योगेश बहुत गुमसुम रहने लगा फिर उसे याद आया कि अवन्ति ने उसे बताया था कि वह कानपुर के किसी हॉस्टल से रहकर अपनी पढ़ाई कर रही थी। तो उसने उसे ढूढ़ने का इरादा बनाया । उसी रात को जब योगेश खाना खा रहा था तभी उसके फोन की घण्टी बजती है, योगेश फोन उठाता है तो फोन पर उसका दोस्त अमन होता है और वो उसे अपनी शादी की खबर देते हुये कहता है, कि अगले हफ्ते उसकी शादी है और योगेश को आना ही होगा । योगेश अमन से शादी में आने का वादा करता है। अगले दिन योगेश उसी हॉस्टल पहुँचता है जहाँ का पता अवन्ति ने दिया था, वहाँ पहुँचकर योगेश को पता चलता है कि अवन्ति तो अभी तक आयी ही नहीं। क्योंकि उस समय अवन्ति की ज़िन्दगी बिजनौर में एक नया मोड़ ले रही थी। उसी समय अवन्ति की दोस्त सुषमा वहाँ आती है और योगेश को अवन्ति के बारे में पूछते देख वो उससे जाकर पुछती है – क्या आप योगेश हैं ? ….. योगेश ने जवाब दिया हाँ । सुषमा ने योगेश को बताया की अवन्ति को पता था कि योगेश उसे ढूँढ़ता हुआ वहाँ आयेगा ज़रुर आयेगा । अवन्ति जिस दिन बिजनौर पहुँची उसी दिन उसने सुषमा को फोन करके कहा कि वो आकर योगेश से मिलेगी और जब भी योगेश आयेगा सुषमा उसका पता ले लेगी । योगेश ने अपना पता और फोन नम्बर सुषमा को दिया और धन्यवाद कह कर वहाँ से चला गया ।
कल योगेश के दोस्त अमन की शादी है इसलिए शाम की बस से ही योगेश बिजनौर के लिए निकल गया। योगेश की पहली मुलाकात और यादें आज फिर ताज़ा हो गयीं । घर पहुँचकर योगेश थोड़ा आराम करके अमन की शादी में जाने के लिए तैयार होकर वहाँ से निकल जाता है, और बारात में शामिल हो जाता है आज वो बहुत खुश था, क्योंकि जल्दी ही वह अपनी अवन्ति से मिलने वाला था । तभी वरमाला का वक्त हुआ और दुल्हन को लाया गया….. सभी लोगों के साथ योगेश भी वरमाला के स्थान पर पहुँचा और दुल्हन को देखते ही उसकी साँसे थम गयीं मानों उसके पैरों के नीचे से ज़मीन ही फिसल गयी हो। उसने अवन्ति अपने लिए जो भी सपने देखे थे वो सभी आज बिखर गये क्योंकि वो दुल्हन कोई और नहीं अवन्ति ही थी । जैसे ही अवन्ति ने योगेश को देखा वो खुद की भावनाओं को रोक नहीं पायी , और उसके आँसू निकल आये लेकिन वो भी क्या करती उसे तो पता ही नहीं था कि माँ-पापा ने बुलाया ही शादी के लिए था । योगेश तो मानो टूट सा गया हो, दुखी होकर वहाँ से बिना किसी से कुछ कहे चला गया । अपनी उस पहली मुलाकात और पहली मोहब्बत को किसी और की ज़िन्दगी में जाता देख सह नहीं पाया ।
आज अवन्ति की शादी के पूरे दो साल हो गये पर आज भी जब कभी योगेश कानपुर से बिजनौर का सफर तय करता है तो उसे अपनी पहली मुलाकात याद आ जाती । और उसकी आँखे भर आती है ।
उसकी मुलाकात का असर हुआ कुछ इस कदर
दिल ही दिल में कर बैठे उनसे मोहब्बत बेकदर
उन्हे भी क्या कसूरवार ठहरायें ऐ दोस्त
शायद उनसे दूर रहना ही है मेरा मुकद्दर

 

  Priyanka Shukla 

     प्रियंका शुक्ला

राजरूपपुर, अल्लाहाबाद

DishaLive Group

Hi,

This account has articles of multiple authors. These all written by Sahity Live Authors, but their profile is not created yet. If you want to create your profile then send email to team@sahity.com

Visit My Website
View All Articles

I agree to Privacy Policy of Sahity Live & Request to add my profile on Sahity Live.

4+

Leave a Reply

Create Account



Log In Your Account