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बेरोजगारी-धीरेंद्र पांचाल

बिगड़े ना बोल नाही अइसे दबेरा ।
मोदी जी आँख तनी हमनी पे फेरा ।

हमरा के चाही नाही मेवा मलाई ।
नोकरी के आस प्यास देता बुझाई ।
जिनगी के खोल जनि अइसे उकेरा ।
मोदी जी आँख तनी हमनी पे फेरा ।

बीतता उमिर अब पाकता डाढ़ी ।
रोईं अकेले बन्द कइके केवाड़ी ।
नइया उमिरिया के मारे हिलकोरा ।
मोदी जी आँख तनी हमनी पे फेरा ।

मुहर हव लाग गइल देहियाँ पे भारी ।
लम्पट आवारा सभे बुझे अनारी ।
जुआ ना दारू नाही गांजा क डेरा ।
मोदी जी आँख तनी हमनी पे फेरा ।

रोटी ना भात रात कइसे बिताईं ।
छोटकी बेमार बिया कइसे सुताईं ।
गऊवां के लोग कहें हम्मे लखेरा ।
मोदी जी आँख तनी हमनी पे फेरा ।

माई के सस्ता दवाई उधारी ।
ओहु पे चल रहल रउआ के आरी ।
मछरी के अस कस नाहीं दरेरा ।
मोदी जी आँख तनी हमनी पे फेरा ।

    ✍ धीरेन्द्र पांचाल

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