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Vijay Lakshamioffline

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प्रकृति के जैसा पावन हृदय जग में रखता कोई नहीं है।

प्रकृति के जैसा पावन हृदय, जग में रखता कोई नहीं है। प्यार, मोहब्बत, इश्क, इबादत, सच में करता कोई नहीं है। स्वार्थपरक तो हर कोई है, मधुबन बनता कोई...

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नारी हुंकार-विजयलक्ष्मी

नहीं चाहिए साथ तुम्हारा, वस तुम्हरी सहमति काफी है। बहुत होचुका सजना,संवरना, अब कुछ करने की बारी है। सीमा पर पहरा है लगाया, अन्दर किसकी जिम्मेदारी है। त्राहि- त्राहिअस्मत नारी...

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अबला सबला बन जाएगी – विजयलक्ष्मी

कविता जबतक पर कर थाम चलेगी, अहसानो से दबी रहेगी। दुःख दर्दो को सहन करेगी, पर शब्दों से मौन रहेगी। घुट घुट कर हर पल ही मरेगी, इधर उधर की...

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परिपक्वता और परिस्थितियां – विजयलक्ष्मी

परिपक्वता और परिस्थितियों में, सचमुच गहरा नाता है। किरदारों से भरी कहानी में, सबकुछ मन को भाता है। पूछो जाकर उस जीवन से, जो बागवान बिन बढ़ता है। बचपन और...

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