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बड़े अस्पताल मानवता के कब्रगाह-वीरेंद्र देवांगना

बड़े अस्पताल मानवता के कब्रगाह::
फोर्टीस हास्पीटल में आद्या की मौत एक बीमारी से हो गई। इसका बिल 15 लाख रुपया थमाया गया। इससे व्यथित उसके पिता प्राथमिकी दर्ज करने के लिए थाने के चक्कर लगाते रहे। मानवता के उन दुश्मनों पर न कोई कार्रवाई हुई, न एफआईआर। इसी तरह गुड़गांव के मेदांता हास्पीटल में शौर्य की डेंगू से मौत हो गई। बिल 13 लाख रूपया थमाया गया। प्रकरण में भी तमाम कोशिशों के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं हुई। मैक्स सुपर स्पैशियलिटी हास्पीटल का भी यही हाल है। वहा भी लोग शोषण के शिकार हैं।
यह लूट कोरोना के चलते तो और भयावह हो गई है। न किसी पर कोई नियंत्रण है, न कोई देखरेख। निजी अस्पताल कोरोना नाम की लूट है, लूट सको, तो लूट के सिद्धांत पर चल पड़े हैं। जनता त्राहि-त्राहि कर रही है।
खैर, सरकार ने एनपीपीए (नेशनल फार्मासिटिकल प्राइजिंग अथाॅरिटी) को फोर्टिश, मेदांता, मैक्स व डीएल कपूर हास्पीटल के गोरखधंधे की जांच के लिए प्रकरण सौंपा। एनपीपीए ने अपने जाच रिपोर्ट में पाया कि ये अस्पताल दवा का चार्ज एमआरपी से अधिक अर्थात लगभग 1720 गुना लगा रहे हैं। जबकि सरकारी नियम है कि एमआरपी से अधिक दवा का चार्ज नहीं किया जाना चाहिए। लगाते हैं, तो गैरकानूनी और आर्थिक अपराध की श्रेणी में है।
यह है सरकारीतंत्र का मूल्य-नियंत्रण। पर यह हो नहीं रहा है और ग्राहक महालूट के शिकार होकर अपना सर्वस्व जमापूंजी गंवा रहे हैं। इन अस्पतालों को मानवता से कोई सरोकार नहीं है। इनके मनीमाइंड मालिकों का तो यही कहना है कि ग्राहक कहीं से भी रकम लाएं; पर लाए और उनका बिल चुकाए। देखा आपने, जिन डाॅक्टरों को भगवान का दर्जा हासिल है; वे ही इस अमानवीय लूट में शामिल होकर मध्यमवर्गीय परिवारों को तबाह कर रहे हैं।
एनपीपीए की रिपोर्ट आने के बाद सरकार को फौरन हरकत में आकर इनका लायसेंस जब्त करना चाहिए था और मरीजों को बेशर्म लूट से बचाना चाहिए था। लेकिन, इनपर कोई कार्रवाई नहीं करना और किसी राजनीतिक दल द्वारा कोई हड़ताल, धरना, प्रदर्शन, नारेबाजी नहीं करना अर्थात जरा-जरा सी बात पर संसद ठप करनेवाले करोड़पति प्रतिनिधियों का इस मुद्दे को न उठाना बड़े लोगों की खतरनाक दुरभि संधि की ओर इशारा करता है।
यही हाल देश के हर बड़े शहर के साधन-सुविधासंपन्न बड़े हास्पीटलों का है। ऐसा लूट मचा है कि मानवता कराहने लगा है। लोग इलाज में रहासहा पूंजी गंवाकर गरीब से गरीबतर हो रहे हैं। गाय-बैल, खेती, जेवर-जेवरात, जमीन-जायदाद, घर-द्वार, बर्तन-बासन तक बेचने पर मजबूर हो रहे हैं।
कारण यह भी है कि सरकारी अस्पतालों में सुविधा, साफ-सफाई, देखरेख व अच्छे डाॅक्टरों का नितांत अभाव है और लापरवाही चरम पर है। इसलिए लोग मजबूरन जान बचाने के लिए निजी अस्पतालों की ओर दौड़ लगाते हैं और जान है, तो जहान है के तर्ज पर धन लुटाते हैं।
बडे़ व निजी अस्पतालों में एक खास समानता यह दिखती है कि वे नार्मल डिलीवरी कराना ही नहीं चाहते। पहले प्रसूता और उसके परिजन के मन में भांति-भांति का डर पैदा करते हैं और इसके बाद आपरेशन की सहमति लेकर आपरेशन कर देते हैंै। अब बेचारी गर्भवती और उसके पति को क्या मालूम कि नार्मल डिलीवरी न कराने के ये जो बहाने गढ़ रहे हैं, वह वास्तविक भी है या नहीं।
जरा-सी बात पर अपने प्रवक्ताओं को आगे कर बक-बक करनेवाले बड़े-बड़े दल भी इस विषय पर चुप्पी साधे हुए हैं। समझ से परे है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय व राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रालय ने अबतक कोई कार्रवाई क्यों नहीं किया? जबकि लोकस्वास्थ्य केंद्र सहित राज्यों का प्रधान और प्राथमिकता वाला विषय है।
इन भस्मासुर अस्पतालों के खिलाफ कारगर कार्रवाई के बिना अच्छे स्वास्थ्य की कामना कैसे की जा सकती? क्या स्वास्थ्य पर फखत भाषण देने से बेहतर स्वास्थ्य हासिल किया जा सकता है या स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधार कर यह संभव है?
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