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कोरोना नियंत्रण के लिए दोहरा मापदंड-वीरेंद्र देवांगना

कोरोना नियंत्रण के लिए दोहरा मापदंड::
कोरोना महामारी का फैलाव अभी थमा नहीं है। विशेषज्ञ चिकित्सक ठंडकाल में इसके विस्तार की चेतावनी दे चुके हैं। वातावरण में अक्टूबर माह से धूल बढ़ने लगता है, जिसमें निर्माण कार्य, खुदाई, कारखाने और वाहन प्रमुख होते हैं। खुले मौसम में आंधी-तूफान का भी खतरा बना रहता है।
धूलयुक्त वायु-प्रदूषण अपने मारक रूप में देशभर में विकराल हो चुका है, जिसमें कोरोना का संक्रमण मिलकर कोढ़ में खाज बनने से इंकार नहीं किया जा सकता। एक अनुमान के अनुसार, भारतभर में 4 करोड़ 50 लाख टन धूल उड़ती है, जो भारतीयों को फेफड़े व स्वांस-संबंधी बीमारियां मुफ्त में बांटती है।
इसके बावजूद, चुनाव और तमाम तरह के आंदोलनों की आड़ लेकर भीड़ ऐसी जुटाई जा रही है कि मानो कोरोना से देश उबर गया हो। जबकि अक्टूबर 20 की स्थिति में 50 हजार से अधिक कोरोना के मरीज रोज मिल रहे हैं और 500 से अधिक लोगों की जाने जा रही हैं।
एक तरफ तो दुर्गा पूजा पंडालों में, दशहरा के रावण-दहन में, नांदेड़ साहिब के जुलूस में, धरना-प्रदर्शनों में, मंदिरों व मस्जिदों में, मृत्यु-संस्कारों में, शादी-समारोहों में, स्कूल-कालेज व कोचिंग संस्थाओं में, सरकारी व निजी कार्यालयों में बंदिशें लगाई जा रही हैं, तो दूसरी तरफ दारू की दुकानों, बाजारों, सब्जी मंडियों, सड़कों, राजनीतिक रैलियों में किसी बंधन का नहीं होना यही दर्शा रहा है कि भीड़ के प्रति दोहरा मापदंड अपनाया जा रहा है।
यही नहीं, बसों, टैक्सियों, रेलों व वायुयानों में सीमित मात्रा में मुसाफिरों को बिठाया जा रहा है। वहां यात्रियों में दूरी बनाकर चलाने की हिदायतें दी रही है। ऐसी ही बंधन सिनेमा हालों, होटलों, मालों में भी बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं। स्कूल व अस्पताल भी इन नियमों से अछूते नहीं हैं, जहां मास्क पहनना अनिवार्य किया गया है।
शासन ने कोरोना से बचाव के लिए कोविड एप्रोप्रिऐट बिहेवियर-उचित व्यवहार नियम बना रखा है। जिसके तहत पेट्रोल-पंप, शराब और राशन दुकानों में बिना मास्क के सामान नहीं दिया जाता है, लेकिन वह सियासती रैलियों के लिए कठोर नियम क्यों नहीं बनाती। यदि नियम बने हैं, तो उसका पालन क्यों नहीं करवाती?
जबकि सियासी रैलियों में भीड़ को नियंत्रित करनी की जवाबदेही आयोजकों की होती है, लेकिन जब वे खुद बिना मास्क के रहते हैं, तब अपने अनुयायियों को कैसे मास्क पहनने के लिए बाध्य कर सकते हैं। जबकि अभी ‘दो गज की दूरी, मास्क है जरूरी’ तथा ‘जब तक नहीं दवाई, तब तक नहीं ढिलाई’ सब दूर कहा जा रहा है।
बिहार और तमाम राज्यों के लोकसभा व विधानसभा उपचुनाव का आलम यह है कि लोग कचकच से खचाखच भरे हुए, एक दूसरे से सटे हुए, बिना मास्क या एहतियातन के भीड़ जुटाव रैलियों में शामिल होकर अपने पांव पर आप कुल्हाड़ी मार रहे हैं।
केंद्र ने राजनीतिक सभाओं के लिए पहले 100 लोगों की भीड़ सीमित किया था, फिर इसमें बढ़ोतरी कर दिया। इसी का खामियाजा है कि आपदा नियंत्रण कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। इसमें सभी दल शामिल हैं। वे दल भी जो सत्तासीन हैं और वे भी जो सत्तासीन होने के लिए कुलांचे मार रहे हैं।
पर, आज जो असीमित भीड़ उमड़ रही है, वह आयोजकों, प्रशासन और चुनाव आयोग के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है। इससे भी बड़ी चुनौती उन लोगों के लिए है, जो भीड़ का हिस्सा बनकर अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं।
माना कि राजनीतिक लोग सत्ता प्राप्ति के लिए नियमों की अपालना कर रहे हैं, लेकिन नागरिकों को यह समझना चाहिए कि बेशुमार व बेकाबू भीड़ में शामिल होना खुद के लिए मुसीबत मोल लेना है।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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