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केंद्रीय कृषि कानून से नाराजगी::

केंद्रीय कृषि कानून से नाराजगी::
छग सरकार ने केंद्रीय कृषि कानून के स्थान पर कृषि उपज मंडी कानून में 7 संशोधन किए हैं। छग सरकार का दावा है कि इसमें केंद्रीय कृषि कानूनों में बिना बदलाव किए प्रदेश में मंडियों को मजबूत करने और कार्पोरेट कंपनियों पर नकेल कसने का प्रावधान किया गया है। कृषि उपज मंडी अधिनियम में मुख्य संशोधन इस प्रकार हैंः-
1. निजी मंडियों को डीम्ड मंडी घोषित किया जाएगा।
2. राज्य सरकार के अधिसूचित अधिकारी को मंडी की जांच का अधिकार होगा।
3. अनाज आवाजाही, निरीक्षण व भंडारण की तलाशी का अधिकार संबंधित अधिकारियों को होगा।
4. मंडी समितियों और अधिकारियों पर वाद दायर करने का अधिकार रहेगा।
5. निजी मंडियों में अधिकारियों को भंडारण की तलाशी का अधिकार होगा।
6. इलेक्ट्रानिक टेªडिंग प्लेटफार्म और आनलाइन भुगतान का संचालन राज्य सरकार के बने नियम से होगा।
7. जानकारी छिपाने और गलत जानकारी देने पर 3 माह की सजा या 5 हजार जुर्माने का प्रावधान। दूसरी बार गलती करने पर 6 माह की सजा और 10 हजार जुर्माना किया जाएगा।
विदित हो कि छग में मंडी अधिनियम में इससे पहले 5 बार वर्ष 2006, 2007, 2011, 2017 और 2018 में संशोधन किया जा चुका है।
कृषि उपज मंडी संशोधन विधेयक पर मुख्यमंत्री का कहना है कि विधेयक में हम पैनकार्डधारी व्यापारी को भी दायरे में ला रहे हैं। हम किसी चिटफंड कंपनियों की तरह लूटकर भागने का मौका नहीं देंगे। एक राष्ट्र, एक बाजार की बात अपनी जगह ठीक है, लेकिन बाजार के साथ एक कीमत होनी चाहिए। एमएसपी पर अनाज बिके, हम समर्थन करेंगे। एपीएफसी कानून किसानों को नहीं, पूंजीपतियों को लाभ देनेवाला कानून है। यह बिहार में वर्ष 2006 से लागू है। किसान वहां 1300 रुपये क्विंटल से अधिक धान नहीं बेच पा रहे हैं।
वहीं बाद में उन्होंने स्वीकार किया है कि केंद्र का ही कृषि कानून राज्य में चलेगा। संघीय व्यवस्था में जो कानून संसद में पास हो जाता है, फिर चाहे उसमें राज्य भी कानून बना ले, ऐसे विषयों में केंद्र का कानून ही चलता है। हमने जो विधेयक लाया है, वो मंडी एक्ट में संशोधन है।
इस पर पूर्व मुख्यमंत्री ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए कहा है कि यह सिर्फ राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लाया गया विधेयक है। जब कोई कानून केंद्र बना चुका है, तब राज्य कानून नहीं बना सकता। बिना राष्ट्रपति की मंजूरी के यह प्रभावी होगा ही नहीं।
इसी तरह पंजाब सरकार ने भी तीन नए कृषि कानून बनाए हैं, जो संक्षेप में इस प्रकार हैः-
1. एमएसपी से कम पर फसल बेचने को मजबूर करने पर तीन साल की सजा का प्रावधान किया गया है।
2. गेहूं और धान की बिक्री तभी वैध मानी जाएगी, जब केंद्र सरकार की ओर से निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य के बराबर या उससे अधिक पर उसकी बिक्री हो रही हो।
3. राज्य सरकार को कृषि उपज के उत्पादन, वितरण, आपूर्ति और विशेष अधिकार विधेयक देता है।
राजस्थान सरकार भी केंद्रीय कृषि कानूनों की काट के लिए 3 संशोधन विधेयक ला रही है। वहां किसानों को 7 फसल-गेहूं, चना, सरसों, मूंग-मसूर-उड़द, सोयाबीन और मूंगफली के लिए एमएसपी का लाभ दिया जाएगा। किसानों से एमएसपी से कम दाम पर खरीद पर सजा का प्रावधान किया जाएगा। किसान व फसल खरीदनेवाले के बीच विवाद होने पर वे सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकेंगे।
इतना ही नहीं, मप्र में केंद्रीय कृषि कानूनों को सुप्रीमकोर्ट में जनहित याचिका के माध्यम से चुनौती दी गई है। सुप्रीमकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है। प्रदेश में 1972 से कृषि उपज मंडी कानून लागू है। कृषि उपज मंडी की व्यवस्था प्रायः हर तहसील में है।
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