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छत्तीसगढ़ में राम वनगमन पथ-वीरेंद्र देवांगना

छत्तीसगढ़ में राम वनगमन पथ::
छग सरकार ने निर्णय लिया है कि राम वनगमन पथ का निर्णाण किया जाएगा, जिसकी शुरूआत श्रीराम के ननिहाल चंदखुरी स्थित माता कौशल्या के मंदिर से होगा।
राजधानी रायपुर के निकट स्थित माता कौशल्या मंदिर चंदखुरी के मूल स्वरूप को यथावत रखते हुए पूरे परिसर को पर्यटन-तीर्थ के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसका सौंदर्यीकरण 15 करोड़ 75 लाख रुपये की लागत से किया जाएगा।
इसमें पहले चरण में 6 करोड़ 70 लाख तथा दूसरे चरण में 9 करोड़ 5 लाख रुपया व्यय किया जाएगा। इसमें घाट-निर्माण, परिक्रमापथ, वाहनों की पार्किंग, विधुत व साज-सज्जा पर खर्च किया जाएगा। यह सब रामवनगमन विकास परियोजना के तहत किया जाएगा।
छग सरकार ने मन्नूलाल यदू की ‘दंडकारण्य रामायण’ और डा. हेमू यदू की छत्तीसगढ़ पर्यटन में राम वनगमन’ किताब को आधार माना है। इन शोध ग्रंथों के अनुसार राम ने वनवास काल में 14 में-से 10 साल छग मंे बिताए थे।
उन्होंने 75 स्थलों का भ्रमण किया था, लेकिन 51 स्थलों में कुछ समय व्यतीत किया था। इन्हीं चिंहिंत 51 स्थलों में-से पहले चरण में 8 स्थलों का विकास किया जाएगा।
ये हैं-कोरिया जिले में सीतामढ़ी हरचैका, सरगुजा जिले में रामगढ़, जांजगीर चांपा जिले में शिवरीनारायण, बलौदाबाजार जिले में तुरतुरिया, रायपुर में चदखुरी, गरियाबंद में राजिम, धमतरी में सिहावा-सप्तऋषि आश्रम और बस्तर में जगदलपुर।
सीतामढ़ी हरचैकाः यह कोरिया जिले में है। श्रीराम वनवास काल का छग में यह पहला पड़ाव है। नदी तट पर स्थित इस स्थल में 17 गुफाकक्ष है। इसे सीता रसोई भी कहते हैं।
रामगढ़ की पहाड़ीः सरगुजा जिले की रामगढ़ पहाड़ी में तीन कक्ष की सीताबेंगरा गुफा है। इसे देश की सबसे पुरानी नाट्यशाला होने का गौरव हासिल है। कहा जाता है कि वनवास काल में श्रीराम यहां पहुंचे थे। यहां माता सीता का अलग कमरा था। कालिदास ने मेघदूत की रचना यहीं की थी।
शिवरीनारायणः जांजगीर चांपा जिले के इस स्थान पर रुककर भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर खाए थे। यहां जांेक, महानदी व शिवनाथ का संगम है। यहां नरनारायण और शबरी का मंदिर है। मंदिर के निकट एक ऐसा वटवृक्ष है, जिसमें दोने के आकार के पत्ते हैं।
तुरतुरियाः बलौदाबाजार जिले के इस स्थान को लेकर जनश्रुति है कि महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यहीं था। किंवदंती है कि तुरतुरिया ही लवकुश की जन्मस्थली है। यहां बलभद्री नाले का पानी चट्टानों के बीच से निकलता है। इससे ‘तुरतुर’ की ध्वनि होती है, इसलिए इसी ध्वनि के के कारण इसका नाम तुरतुरिया पड़ा।
चंदखुरीः यहां 126 तालाब हैं। यह रायपुर जिले में है। इसमें जलसेन नामक तालाब के बीचोंबीच माता कौशल्या का प्राचीन मंदिर है, जो दुनिया में एकमात्र है। चंदखुरी को माता कौशल्य का जन्मस्थान कहा जाता है, इसलिए यह राम का ननिहाल कहलाता है। छग सरकार ने माता कौशल्या की जन्मतिथि बतानेवाले को 11 लाख रुपये पुरस्कार देने की घोषणा की है।
राजिमः यह गरियाबंद जिले में है, जो छग का प्रयाग कहलाता है। राजिम सोंढूर, पैरी व महानदी के संगम पर स्थित है। मान्यता है कि बनवास काल में श्रीराम ने इस स्थान पर अपने कुलदेवता महादेव की पूजा की थी। संगम में जहां पूजा की गई थी, वहीं कुलेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर स्थापित है। यहां माघी पूर्णिमा में पुन्नी मेला भरता है।
सिहावाः धमतरी जिले के सिहावा की विभिन्न पहाड़ियों में मुचकुंद ऋषि आश्रम, अगस्त्य ऋषि आश्रम, अंगिरा आश्रम, श्रृंगि ऋषि आश्रम, कंकर ऋषि आश्रम, शरभंग ऋषि आश्रम एवं गौतम ऋषि आश्रम हैं। जनश्रुति है कि श्रीराम ने यहां पर्दापण किया और इन ऋषियों से भेट किया था।
जगदलपुरः जगदलपुर बस्तर जिला व संभाग का मुख्यालय है। यह इंद्रावती नदी के तट पर बसा है। जगदलपुर चारों से सधन वनों से धिरा है। किंवदंती है कि भगवान राम वनवास काल में इस क्षेत्र से गुजरे थे। यह क्षेत्र कभी दंडकवन था। जो आज भी दंडकारण्य के नाम से जाना जाता है।
जगदलपुर से 40 किमी में चित्रकोट जलप्रपात है। बस्तर-जगदलपुर पांडुओं के वंशज काकतियों की राजधानी थी। यहां से 100 किलो मीटर के दायरे में चित्रकोट जलप्रपात, तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेरघाटी राष्ट्रीय उद्यान, कुटुमसर गुफा, दंतेवाड़ा का दंतेश्वरी मंदिर और ऐतिहासिक स्थल बारसूर है। सुकमा का रामाराम भी राम वनगमन की कथाएं समेटे हुए है।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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