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दशहरा पर विशेषःः बस्तर-दशहरा भाग-1-वीरेंद्र देवांगना

दशहरा पर विशेषःः
बस्तर-दशहरा भाग-1
खास तथ्यः शक्ति-पूजा का पर्व; माता दंतेश्वरी का वर्चस्व।
रावण वध नहींः अपितु अनोखी रथयात्रा।
सहकारिता का अनुपम-अदभुत मिश्रण।
रियासतकालीन परंपरा के साथ लोकतंत्र की छाप।
नरेश पुरुषोत्तम देव के द्वारा जनता को सौगात।
उत्सव की शुरूआतः
छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर-जिला के जिला मुख्यालय, जगदलपुर में ऐतिहासिक बस्तर-दशहरे की शुरूआत ‘पाट जात्रा’ से होता है, जो 75 दिनी उत्सव का रूप लेता हुआ ‘मुरिया दरबार’ के दिन समाप्त हो जाता है।
पाट जात्राः
‘पाठदेव’ की पूजा श्रावणी अमावस्या को किया जाता है। इसमें जगदलपुर स्थित रजवाड़े के सम्मुख, दंतेश्वरी मंदिर के सामने बेड़ा उमरगांव व झारउमर गांव के दो व्यक्तियों द्वारा ठुरलू लकड़ी रखकर दशहरा उत्सव निर्विध्न संपन्न करने की कामना के साथ बस्तर-दशहरा की शुरूआत की जाती है।
डेरी गड़ाईः
भाद्र शुक्ल 12 वीं को ‘सीरासार’ में डेरीगड़ाई की रस्म (लकड़ी के दो शुभ-स्तंभ गाड़कर) दशहरे की द्वितीय शुरूआती परंपरा पूरी की जाती है। इसके बाद रथ निर्माण का महती कार्य विधिवत चालू हो जाता है।
काछन गादीः
महोत्सव का तृतीय शुरूआत काछन गादी (काटोंभरा सिंहासन) उत्सव से होता है। आश्विन मास की सर्वपितृमोक्ष अमावस्या के दोपहर को विभिन्न गांवों से आए हुए मांझी-मुखिया, गणमान्य नागरिक व जिले के प्रशासनिक अधिकारी, जगदलपुर स्थित राजमहल के समीप इकट्ठे होते हैं।
वे पहले दंतेश्वरी देवी के छत्र ‘पाठदेव’ की पूजा करते हैं, फिर आस-पास और दूर-दराज से पधारे हुए ग्राम्य देवी-देवताओं की धूप-दीप से सत्कार करते हैं।
तत्पश्चात वे जुलूस की शक्ल में गाजे-बाजे सहित जगदलपुर स्थित भंगाराम चैक के पास काछनगुड़ी में पदार्पण करते हैं।
काछनगुड़ी में काछन (कांचन) देवी का सिरहा/पुजारी समस्त तैयारियों के साथ मौजूद रहता है, जो वंश परंपरा के अनुसार एक ही कुटुम्ब का होता है। वहां वह कुंवारी कन्या भी मौजूद रहती है, जिसपर कांछन देवी का सन्निवेशन होना रहता है।
काछनगुड़ी में विशेष तौर पर तैयार किए गए ‘कांटों के झूले’ में माहरा जाति की अवयस्क बालिका को झुलाया जाता है और कांछन देवी से बगैर विध्न-बाधा के दशहरा संपन्न होने का प्रसाद मांगा जाता है।
परिपाटी के मुताबिक, भैरवभक्त सिरहा मंत्रोचार के साथ काछिन देवी का आव्हान करता है। जब चयनित लाबालिग बालिके पर कांछनदेवी सन्निवेश होने लगती है, तब सन्निवेशित बालिका के साथ सिरहा तलवार और ढाल से युद्व करता है।
युद्वोपरांत सन्निवेशित देवी को कांटों भरे सेज पर बिठाकर हिंडोले लेने दिया जाता है। उसकी धूप-दीप से पूजा-अर्चना कर आरती उतारी जाती है। फिर दशहरे की निर्विध्न संपन्नता के लिए आशीर्वाद मांगा जाता है। स्वीकृतिसूचक फूलमाला सिरहा को मिलने पर माना जाता है कि कांछन देवी की मंजूरी मिल गई है।
प्रसन्नता का विषय है कि देशभर में अस्पृश्य और अछूत समझी जानेवाली माहरा/महार जाति (अनुसूचित जाति) की कुंवारी कन्या पर आसीन कांछन देवी के प्रसादस्वरूप ही बस्तर के दशहरे का शुभारंभ होता है।
यह तथ्य शेष छत्तीसगढ़ सहित, देश-विदेश के लिए जहां अनुकरणीय है, वहीं बस्तरवासियों के लिए अविस्मरणीय है कि उनके राजे-महाराजे जातिगत भेदभाव से परे थे। यह तथ्य वास्तविक और यथार्थपरक लोकतंत्र का सूचक है? तभी तो बस्तर का दशहरा अनूठेपन और अनोखेपन के लिए दुनियाभर में सुप्रसिद्ध है।
दुमंजिले काष्ठरथ का निर्माणः
यह सिलसिला बस्तर के ज्ञात इतिहास में विगत 600 वर्षाे से चला आ रहा है। वस्तुतः यह आदिवासी इंजीनियरिंग, काष्ठकला, जिम्मेदारियों के निर्वहन व समय-प्रबंधन का उत्कृष्ट उदाहरण है।
काष्ठ निर्मित दोमंजिला रथ 40 फुट ऊंचा, 32 फुट लंबा तथा 20 फुट चैड़ा होता है। इसके निर्माण में 50 घनमीटर लकड़ी का प्रयोग किया जाता है, जो माचकोट व तिरिया के सालवनों से ढकेलकर लाया जाता है।
काम का बंटवारा और तय जिम्मेदारियांः
यह जानकर अचरज होगा कि विशालकाय काष्ठरथ का निर्माण कोई एक व्यक्ति, जाति, गांव या परगना नहीं; बल्कि यह काम निश्चित जातियों व परगनों के समुदायों के द्वारा तय समय में पूर्ण कर लिया जाता है।
रायकेरा परगना के लोग तयशुदा तिथि को लंबवत और मजबूत साल के बड़े-बड़े बल्ले जगदलपुर पहुंचाते हैं। वह भी गाड़ियों में बांधकर, धकेलकर; बाजुओं के दम-खम पर। दंतेश्वरी देवी की जयकारे के साथ।
महाकाय रथ के चक्के, बीम और ढ़ांचा निर्माण का जिम्मा झार उमरगांव व बेड़ा उमरगांव के बढ़इयों और लोहारों का होता है। इसके लिए किसी को आमंत्रित नहीं किया जाता; वरन् इन गांवों के लोग स्वस्फूर्त व स्वप्रेरणा से इस अहम काम में जुट जाते हैं।
विशालकाय रथ को खींचने के लिए जो बलशाली रस्सा चाहिए, वह सियाड़ी नामक जंगली लता से निर्मित किया जाता है। इसको साल-दर-साल समयपूर्व तैयार करने की जवाबदारी करंजी, केशरपाल और सोनाबाल के जनजातियों का होता है।
परंपरा के अनुसार भीतर रैनी की रात बड़े रथ को चुराकर कुम्हड़ा कोट के देवी गुड़ी ले जाने की जवाबदेही किलेपाल के गोंड आदिमजातियों की होती है, जिनका उत्साह और उमंग बाहर रैनी के दिन इसी रथ को हाथ से खींचते समय देखा जा सकता है।
वे जिस जोश-ओ-खरोश से भारी-भरकम आठ चक्के के दोमंजिला काष्ठरथ को हाथ से खींचकर राजमहल पहुंचाते हैं, वह अन्यत्र दुर्लभ है।
अचंभित करनेवाला तथ्य यह भी कि इस कार्य के लिए सभी परगनों की जवाबदेहियां पूर्वानुसार तय हैं। इसके पीछे बस्तर के नरेशों का मकसद यह था कि तत्कालीन बस्तर रियासत के सभी 14 जमींदारियों के जनजातियों को दशहरा के अवसर पर काम सौंपकर एकसूत्र में पिरोये रखा जाए, जो बस्तर-दशहरा के प्रतिवर्ष निर्विध्न संपन्नता के साथ फलीभूत हुआ है। सारतः यह कि बस्तर-दशहरा टीम एफर्ट, टाइम मैनेजमेंट और टीम स्पिरिट का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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