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दशहरा पर विशेषःः बस्तर-दशहरा भाग-3-वीरेंद्र देवांगना

दशहरा पर विशेषःः
बस्तर-दशहरा भाग-3
विजय दशमीः
देश-प्रदेश के अन्य स्थानों की भांति यहां विजय दशमी नहीं मनाया जाता। कारण कि बस्तर के दशहरा का संबंध श्रीराम के लंका विजय से नहीं, अपितु दंतेश्तरी देवी की आराधना और साधना से है।
बस्तर-दशहरा वस्तुतः शक्तिपूजा का पर्व है, इसलिए इसे दुर्गा दशहरा भी कहा जाता है। जिसका सीधा संबंध इष्टदेवी दंतेश्वरी से है, जो महिषासुर मर्दिनी माता दुर्गा के अवतार के रूप मंे इस अंचल में पूजनीय और वंदनीय है। कहा जाता है कि माता दंतेश्वरी; दंतेवाड़ा मंदिर में साक्षात् रूप में विराजमान है।
पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान् शंकर के ससुर प्रजापति दक्ष ने विराट यज्ञ का आयोजन किया, तब जान-बूझकर उसने अपने बेटी-दामाद को नहीं बुलाया। बावजूद इसके, माता सती अपने पिता के घर चली गई।
वहां अतिथियों, देवी-देवताओं व ऋषि-मुनियों के समक्ष प्रजापति दक्ष ने शंकर भगवान् का घोर अनादर कर दिया, जिससे माता कुपित होकर स्वयं को जला डाली। भगवान् शंकर को जब खबर लगी, तब वे वहां पहुंचे और विचलित होकर सती का शव कंधे पर लेकर तांडव करने लगे। इससे त्रिलोक में त्राहि-त्राहि मच गया।
तीनों लोकों का विनाश निश्चित जानकर (जब तक सती का भस्मीभूत शरीर भगवान शंकर के कंधे पर रहता, तब तक) महाप्रभु विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के देह के टुकड़े-टुकड़ेकर धरा में बिखेर दिए।
किंवदंती है कि माता सती के देह के अंश जहां-जहां गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ बन गया। माता का दांत शंकनी व डंकनी के मिलन स्थल पर गिरा। अतः यह दंतेश्वरी पीठ के रूप में जगत्प्रसिद्ध हुआ। ज्ञातव्य है कि दंतेश्वरी शक्तिपीठ देश के 52 शक्तिपीठों में-से एक है।
भीतर रैनीः
विजय दशमी के पर्व को यहां भीतर रैनी (रहनी) के रूप में मनाया जाता है। इस दिन यहां (जगदलपुर में) आठ पहियों के रथ का चालन निर्धारित स्थान व समय पर किया जाता है, जो फूलरथ के परिक्रमा पथ का अनुशरण करते हुए सिंहद्वार से चलाकर वापस सिंहद्वार पहुंचाया जाता है।
यह रथ केवल और केवल किलेपाल के 11 टोला के तथा बास्तानार व कोड़ेनार के माड़िया खिंचते हैं। इस दिन दूर-दराज के आदिवासी अपनी परंपरागत वेशभूषा के साथ हजारों की तादाद में जगदलपुर पहुंचते हैं।
जगदलपुर शहर में दशहरोत्सव हो रहा हो, तो यह असंभव है कि माड़िया युवक-युवती मांदर की थाप पर थिरके नहीं। वे रथ के आगे-आगे जुलूस की शक्ल में थिरकते चलते हैं। माड़िया युवा सिर पर गौर (बाईसन) के सुंदर सींग लगाकर बड़े-बड़े ढोल बजाते हैं। गौर के सींगों को वे मुकुट जैसा बनाते हैं, जिसमें मुर्गे के पंख व कौड़ियां गुथी रहती है। कौड़ियों का झालर मंुह तक आता रहता है।
साथ ही साथ माड़िया युवतियां ताल में ताल मिलाकर थिरकती हैं, तो समा बंध जाता है। बड़े-बड़े ढोलों से बुलंद ध्वनि निकलती है, जो माहौल को आनंदमय बनाती है।
बाहर रैनी (एकादशी)
एकादशी को अर्थात विजय दशमी के दूसरे दिन को ‘बाहर रैनी (रहनी) कहा जाता है। विजय दशमी के दिन रथचालन के उपरांत रात को जब जगदलपुर शहर सो जाता है, तब माड़िया जनजाति के लोग खाली रथ को शहर के उत्तरपूर्व दिशा की ओर महल से लगभग 03 किलोमीटर दूर कुम्हड़ाकोट में ंिख्ंाचकर ले जाते हैं। इसे रथ चुराना कहते हैं।
वस्तुतः बाहररैनी का उत्सव कुम्हड़ाकोट के जंगल में होता है। इस जंगल में एक मंडप निर्मित है, जिसमें प्रातः करीब 11 बजे राजा व राजपरिवार के लोग, सम्मानीय अतिथि तथा अधिकारी मौजूद होते हैं।
इस दिन माईजी की एक अलग कुटिया बनाई जाती है। पूजा होने के बाद सबलोग नवान्न भोजन करते हैं, जिसे ‘नवाखानी’ कहते हैं। यहां खेलकूद, आदिवासी नाच-गाना, सींगवाले माड़ियाओं का नृत्य होता रहता है। पूरे इलाके में दर्शकों की अपार भीड़ हो जाती है, जो लाखों के ऊपर पहुंचती है।
इलाके में विशालकाय साल, आंवला, बांस आदि के वृक्ष तथा धनी छांव है। यहां सुबह से गाजा-बाजा, तुरही, सींग, शंख बजता रहता है, जो मन को आनंदित व प्रफुल्लित करता है।
नवाखाने के बाद रथचालन आरंभ होता है, जो लाल बाग मैदान से होकर चर्च, पुलिस लाईन एवं पुलिस थाने के बीच के रास्ते से पुराना बस स्टैंड होते हुए मैन रोड होकर सायंकाल सिंहद्वार पहुंचता है।
विशाल रथ और उसका जुलूस जब लालबाग मैदान के पास पहुंचता है, तब चारों ओर लोग ही लोग दृष्टिगोचर होते हैं। बीच में सुसज्जित विशालकाय काष्ठरथ आगे-पीछे होता हुआ नजर आता है, जो नयनाभिराम व मनभावन लगता है, मन को आनंद से आनंदित कर देता है।
मुरिया दरबारः
बाहर रैनी के दूसरे दिन पहले राजा-महाराजा और अब मंत्री, सांसद, विधायक व जिलाधिकारी गांव-गांव से आए हुए पटेल, कोटवार, मांझी, चालकी, पुजारी, खास व आमजन के साथ राजमहल के हाल में एकत्रित होकर क्षेत्रीय समस्याओं पर चर्चा व निदान करते-करवाते हैं, उसे ही परंपरानुसार मुरिया दरबार कहा जाता है। वस्तुतः, यह जनता दरबार का ही अद्यतन रूप होता है।
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