पवित्र भागवत गीता जी का सार सन्देश

श्रीमद्भगवद्गीता जी का अनमोल यथार्थ पुर्ण ब्रम्ह ज्ञान
(गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित)

  •  मैं सबको जानता हूँ, मुझे कोई नहीं जानता (अध्याय 7 मंत्र 26)
  •  मै निराकार रहता हूँ (अध्याय 9 मंत्र 4 )
  •  मैं अदृश्य/निराकार रहता हूँ (अध्याय 6 मंत्र 30) निराकार क्यो रहता है इसकी वजह नहीं बताया सिर्फ अनुत्तम/घटिया भाव काहा है,
  • मैं कभी मनुष्य की तरह आकार में नहीं आता यह मेरा घटिया नियम है (अध्याय 7 मंत्र 24-25)
  • पहले मैं भी था और तू भी सब आगे भी होंगे (अध्याय 2 मंत्र 12) इसमें जन्म मृत्यु माना है
  • अर्जुन तेरे और मेरे जन्म होते रहते हैं (अध्याय 4 मंत्र 5)
  •  मैं तो लोकवेद में ही श्रेष्ठ हूँ (अध्याय 15 मंत्र 18) लोकवेद = सुनी सुनाई बात/झूठा ज्ञान
  • उत्तम परमात्मा तो कोई और है जो सबका भरण-पोषण करता है (अध्याय 15 मंत्र 17)
  • उस परमात्मा को प्राप्त हो जाने के बाद कभी नष्ट/मृत्यु नहीं होती है (अध्याय 8 मंत्र 8,9,10)
  • मैं भी उस परमात्मा की शरण में हूँ जो अविनाशी है (अध्याय 15 मंत्र 5)
  • वह परमात्मा मेरा भी ईष्ट देव है (अध्याय 18 मंत्र 64)
  • जहां वह परमात्मा रहता है वह मेरा परम धाम है वह जगह जन्म – मृत्यु रहित है (अध्याय 8 मंत्र 21,22) उस जगह को वेदों में रितधाम, संतो की वाणी में सतलोक/सचखंड कहते हैं गीता जी में शाश्वत स्थान कहा है
  • मैं एक अक्षर ॐ हूं (अध्याय 10 मंत्र 25 अध्याय 9 मंत्र 17 अध्याय 7 के मंत्र 8 और अध्याय 8 के मंत्र 12,13 में )
  • “ॐ” नाम ब्रम्ह का है (अध्याय 8 मंत्र 13)
  •  मैं काल हूं (अध्याय 10 मंत्र 23)
  • वह परमात्मा ज्योति का भी ज्योति है (अध्याय 13 मंत्र 16)
  • अर्जुन तू भी उस परमात्मा की शरण में जा, जिसकी कृपा से तु परम शांति, सुख और परम गति/मोक्ष को प्राप्त होगा (अध्याय 18 मंत्र 62)
  • ब्रम्ह का जन्म भी पूर्ण ब्रम्ह से हुआ है (अध्याय 3 मंत्र 14,15)
  • तत्वदर्शी संत मुझे पुरा जान लेता है (अध्याय 18 मंत्र 55)
  • मुझे तत्व से जानो (अध्याय 4 मंत्र 14)
  •  तत्वज्ञान से तु पहले अपने पुराने 84 लाख में जन्म पाने का कारण जानेगा, बाद में मुझे देखेगा की मैं ही इन गंदी योनियों में पटकता हू, (अध्याय 4 मंत्र 35)
  •  मनुष्यों का ज्ञान ढका हुआ है (अध्याय 5 मंत्र 16) मतलब किसी को भी परमात्मा का ज्ञान नहीं है
  •  ब्रम्ह लोक से लेकर नीचे के ब्रम्हा/विष्णु/शिव लोक, पृथ्वी ये सब पुर्नावृर्ति(नाशवान) है (अध्याय 8 मंत्र 16 )
  •  तत्वदर्शी संत को दण्डवत प्रणाम करना चाहिए (तन, मन, धन, वचन से और अहं त्याग कर आसक्त हो जाना) (अध्याय 4 मंत्र 34)
  • हजारों में कोई एक संत ही मुझे तत्व से जानता है (अध्याय 7 मंत्र 3)
  •  मैं काल हु और अभी आया हूं (अध्याय 10 मंत्र 33) तात्पर्य :- श्रीकृष्ण जी तो पहले से ही वहां थे,
  •  शास्त्र विधि से साधना करो, शास्त्र विरुद्ध साधना करना खतरनाक है (अध्याय 16 मंत्र 23,24)
  •  ज्ञान से और श्वासों से पाप भस्म हो जाते हैं (अध्याय 4 मंत्र 29,30, 38,49)
  • तत्वदर्शी संत कौन है पहचान कैसे करें :- जो उल्टा वृक्ष के बारे में समझा दे वह तत्वदर्शी संत होता है (अध्याय 15 मंत्र 1-4)
  • और जो ब्रम्हा के दिन रात/उम्र बता दें वह तत्वदर्शी संत होता है (अध्याय 8 मंत्र 17)
  • ***3 भगवान बताये गये हैं गीताजी में
    1.क्षर , अक्षर, निअक्षर
    2. ब्रम्ह, परब्रह्म, पूर्ण/पार ब्रम्ह
    3. ॐ, तत्, सत्
    4. ईश, ईश्वर, परमेश्वर
  • गीता जी में तत्वदर्शी संत का इशारा > 18.तत्वदर्शी संत वह है जो उल्टा वृक्ष को समझा देगा. (अध्याय 15 मंत्र 1-4)
    “कबीर अक्षर पुरुष एक पेड़ है, निरंजन वाकी डार। तीनों देव शाखा भये, पात रुप संसार।। “
  •  जो ब्रम्ह के दिन रात /उम्र बता देगा वह तत्वदर्शी संत होगा, (अध्याय 8 के मंत्र 17)
    उम्र :-
    1. इन्द्र की उम्र 72*4 युग
    2. ब्रम्हा जी की उम्र – –
    1 दिन =14 इन्द्र मर जाते हैं” तो उम्र 100 साल=720,00000 चतुर्युग
    3.विष्णु जी की उम्र =7 ब्रम्हा मरते हैं तब 1 विष्णु जी की मृत्यु होती है तो कुल उम्र 504000000 चतुर्युग
    4.शिव जी की =7 विष्णु जी मरते हैं तब 1शिव जी की मृत्यु होती है =3528000000 चतुर्युग(ये तीनों देव ब्रम्हा विष्णुजी महेश देवी भागवत महापुराण में अपने को भाई-भाई मानते हैं और शेरोवाली/अष्टांगी/प्रकृति को अपनी मां और अपनी जन्म-मृत्यु हो ना स्वीकारते हैं
    5. महाशिव की उम्र =70000शिव मरते हैं
    6 ब्रम्ह की आयु =1000 महाशिव मरते हैं।

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