कबीर परमेश्वर जी के अनमोल वचन

कबीर परमेश्वर जी के अनमोल वचन

कबीर मन गोरख मन गोविंद, मन ही औघड़ सोय ।
जो मन राखै जतन करि, आपै करता होय ।।

मन ही योगी गोरखनाथ है, मन ही भगवान है, मन ही औघड़ है अर्थात मन को एकाग्र करके कठिन साधना करने से गोरखनाथ जी महान योगी हुए, मन की शक्ति से मनुष्य की पूजा भगवान की तरह होती है । मन को वश में करके जो भी प्राणी साधना स्वाध्याय करता है वह स्वयं ही अपना कर्त्ता बन जाती है ।

कबीर, तन को जोगी सब करै, मन को करै न कोय ।
सहजै सिद्धि पाइये, जो मन जोगी होय ।।

ऊपरी आवरण धारण करके हर कोई योगी बन सकता है किन्तु मन की चंचलता को संयमित करके कोई योगी नहीं बनता । यदि मन को संयमित करके योगी बने तो सहजरूप में उसे समस्त सिद्धीयां प्राप्त हो जायेंगी ।

कबीर, जौन भाव ऊपर रहै , भित्तर बसावै सोय ।
भीतर और न बसावई, ऊपर और न होय ।।

जो भाव ऊपर हो वही भाव अन्तर ह्रदय में भी रखना चाहिए । जो ज्ञान वैराग , आचार विचार की बाते मुख से कहते हैं उसी के अनुसार आचरण करे । भीतर से कुछ और तथा ऊपर से कुछ और । ऐसा भाव नहीं होना चाहिए ।

कबीर, सवेक – स्वामी एक मत, मत में मत मिली जाय |
चतुराई रीझै नहीं, रीझै मन के भाय ||

सवेक और स्वामी की पारस्परिक मत मिलकर एक सिद्धांत होना चहिये | चालाकी करने से सच्चे स्वामी नहीं प्रसन्न होते, बल्कि उनके प्रसन्न होने का कारण हार्दिक भक्ति – भाव होता है |

कबीर, सतगुरु शब्द उलंघ के, जो सेवक कहुँ जाय |
जहाँ जाय तहँ काल है, कहैं कबीर समझाय ||

सन्त कबीर जी समझाते हुए कहते हैं कि अपने सतगुरु के न्यायपूर्ण वचनों का उल्लंघन कर जो सेवक अन्ये ओर जाता है, वह जहाँ जाता है वहाँ उसके लिए काल है |

कबीर, सवेक – स्वामी एक मत, मत में मत मिली जाय |
चतुराई रीझै नहीं, रीझै मन के भाय ||

सवेक और स्वामी की पारस्परिक मत मिलकर एक सिद्धांत होना चहिये | चालाकी करने से सच्चे स्वामी नहीं प्रसन्न होते, बल्कि उनके प्रसन्न होने का कारण हार्दिक भक्ति – भाव होता है |

कबीर, सतगुरु शब्द उलंघ के, जो सेवक कहुँ जाय |
जहाँ जाय तहँ काल है, कहैं कबीर समझाय ||

सन्त कबीर जी समझाते हुए कहते हैं कि अपने सतगुरु के न्यायपूर्ण वचनों का उल्लंघन कर जो सेवक अन्ये ओर जाता है, वह जहाँ जाता है वहाँ उसके लिए काल है |

कबीर जाति बरन कुल खोय के, भक्ति करै चितलाय |
कहैं कबीर सतगुरु मिलै, आवागमन नशाय ||

जाति, कुल और वर्ण का अभिमान मिटाकर एवं मन लगाकर भक्ति करे | यथार्थ सतगुरु के मिलने पर आवागमन का दुःख अवश्य मिटेगा |

कबीर सब जग डरपै काल सों, ब्रह्मा विष्णु महेश |
सुर नर मुनि औ लोक सब, सात रसातल सेस ||

ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सुर, नर, मुनि और सब लोक, साल रसातल तथा शेष तक जगत के सरे लोग काल के डरते हैं |

कबीर काल फिरै सिर ऊपरै, हाथों धरी कमान |
कहैं कबीर घु ज्ञान को, छोड़ सकल अभिमान ||

हाथों में धनुष बांण लेकर काल तुम्हारे सिर ऊपर घूमता है, कबीर जी कहते है कि सम्पूर्ण अभिमान त्यागकर, स्वरुप तत्वज्ञान ग्रहण करो |

जीतू दास

हिसार (हरियाणा)

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