राजा हरिश्चंद्र की मंत्र शक्ति-हेमा पाण्डेय

राजा हरिश्चंद्र की मंत्र शक्ति-हेमा पाण्डेय

भगवान राम के पूर्वज सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के जीवन का एक प्रसंग है. एक बार लंका नरेश रावण राजा हरिश्चंद्र की तपस्या से प्रभावित होकर उनके दर्शन करने आया .राजमहल के द्वार पर पहुंचकर रावण ने द्वारपाल को अपनी आने का प्रयोजन बताया और कहा मैंने राजा हरिश्चंद्र की तपस्या और मंत्र साधना के विषय में काफी प्रशंसा सुनी है मैं उनसे कुछ सीखने की कामना लेकर आया हूं .द्वारपाल ने रावण को उत्तर दिया है भद्र पुरुष आप निश्चय ही हमारे राजा से मिल सकेंगे किंतु अभी प्रतीक्षा करनी होगी क्योंकि अभी वह अपनी साधना कक्ष में साधना उपासना आदि कर रहे हैं. कुछ समय बाद द्वारपाल रावण को साथ लेकर राजा के पास गया रावण ने झुक कर प्रणाम किया .रावण  राजा हरिश्चंद्र से अपने मन की बात कही कि वह उनसे साधारण ज्ञान लाभ हेतु आया है .वार्तालाप चल ही रहा था कि एकाएक राजा हरिश्चंद्र का हाथ तेजी से एक और घुमा पास रखें एक पात्र से   उन्होंने अक्षत के कुछ दाने उठाएं और होठों से कुछ और स्पष्ट सा गुदगुदाते हुए बड़ी तीव्रता से एक दिशा में फेंक दिए .रावण एकदम से हतप्रद रह गया उनसे पूछा तो वह का राजन यह आप को क्या हो गया था राजा हरिश्चंद्र बोले का  यहां से 140 योजन दूर पूरब दिशा में एक हिंसक सिंह ने एक गाय पर हमला कर दिया था और अब वह गाय सुरक्षित है .रावण को बड़ा अचरज हुआ वह बिना छड़ गवाएं इस बात को स्वयं जा कर देख लेना चाहता था चलते-चलते रावण जब उस स्थल पर पहुंचा तो देखा कि रक्तरंजित एक सिंह भूमि पर पड़ा हुआ है  सिंह को अक्षत के दाने तीर की भांति लगे थे. जिससे वह घायल होकर गिर पड़ा राजा हरिश्चंद्र की मंत्र शक्ति का प्रमाण रावण के सामने था .आज भी मंत्रों में वही सकती है वही तेजस्विता है जो राजा हरिश्चंद्र के समय था आवश्यकता है तो मन शक्ति को एकाग्र करने की पूर्ण दृढ़ता के साथ मंत्रों का हृदय से उच्चारण करने की.

 

हेमा पाण्डेय 

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