साहेब कबीर जी आजा आत्मा तोहे पुकारती (शब्द कबीर परमेश्वर)

साहेब कबीर आजा

आत्मा तोहे पुकारती ।
तेरे हाथ मेँ चाबी सतगुरु,
सतलोक द्वार की ।।(1)

22 लाख वर्ष तप किना,
इक तपस्वी कर्ण कहाया ,
तप से राज राज मद मानम ,
नर्क ठिकाणा पाया ।
सिर धुन धुन के पछताया ,
या थी बाजी हार की ।।( 2 )

साहेब कबीर आजा ,
आत्मा तोहे पुकारती ।
तेरे हाथ मेँ चाँबी सतगुरु,
सतलोक द्वार की ।।
योग विद्धी से सुखदेँव ऋषी,
तीनो लोक फिर आवे,
उङया फिरे पक्षि कि तिरियाँ,
नही मोक्ष द्वारा पावे ।
हठ योगी भव भटका खावे,
ना पावे युक्ति शब्द सार कि।3।

साहेब कबीर आजा ,
आत्मा तोहे पुकारती ।
तेरे हाथ मेँ चाँबी सतगुरु,
सतलोक द्वार की ।।
पाँच वक्त नमाज गुजारे,
करे शाम को खुना,
बिना बन्दगी बोक बणेगेँ।
रहे जुनम जुन्ऩा ।।
खर देही धरे अपला तुन्ऩा,
वो मट्टी ढोवेँ कुम्हार की।4।

साहेब कबीर आजा ,
आत्मा तोहे पुकारती ।
तेरे हाथ मेँ चाँबी सतगुरु,
सतलोक द्वार की।।
वेद पुराण शास्त्र पढ़ते,
कथा करे चित लाके।
गीता जी का सार सुणावेँ।।
मिठ्ठी बात बणाके,
महाभारत रामायण समझा के।

कथा करे उस काल करतार की,
साहेब कबीर आजा ,
आत्मा तोहे पुकारती ।
तेरे हाथ मेँ चाँबी सतगुरु,
सतलोक द्वार की।।
तीर्थ व्रत साधना करते,
आशा चारो धाम कि ।
कोटि यज्ञ अश्वमेघ करे ,
ना जाणे महिमा सतनाम की।
नाम बिना बे काम की ये,
सम्पति सँसार की ।6।

साहेब कबीर आजा ,
आत्मा तोहे पुकारती ।
तेरे हाथ मेँ चाँबी सतगुरु,
सतलोक द्वार की ।।
राबिया रंगी हरी रंग मेँ,
कैसी जीव दया दर्शाई।
केश उखाड़े वस्त्र उतारे,
इक कुतिया की प्यास बुझाई।
मँजिल तिन मक्का ले आई ,
वो थी प्यासी दीदार की।7।

साहेब कबीर आजा ,
आत्मा तोहे पुकारती ।
तेरे हाथ मेँ चाँबी सतगुरु,
सतलोक द्वार की ।।
राबिया से भई बन्सुरी,
फिर गणका ख्याल बणाया।
गणका से फिर भई कमाली,
तेरा शरणा पाया।
शरण आप की मेँ आनँद आया,
थी प्यासी दीदार की।8।

गोरख नाथ रिद्धी सिद्धी मेँ,
फुला नही समावे,
मुर्दो तक को जीवत करके,
काल भक्ती द्रढावेँ।
रामपालसद्गुरु की शरणा पावे,
डोरी मकर तार की।9।

साहेब कबीर आजा , आत्मा तोहे पुकारती ।
तेरे हाथ मेँ चाँबी सतगुरु, सतलोक द्वार की ।।

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