Notification

अपने लेख प्रकाशित करने के लिए यहाँ क्लिक करें!

संक्रांति पर्व पर विशेषः मकर संक्रांति-वीरेंद्र देवांगना

संक्रांति पर्व पर विशेषः
मकर संक्रांति
सूर्य, जहां ग्रहमंडल का राजा है, वहीं धरती का आभामंडल भी है। यह आभाप्रदाता, स्वास्थ्यदाता और अन्नदाता भी है। जीवजंतुओं सहित मानव के खाद्यान्न में जो ऊर्जा, जो ओज, जो तेज और बल है, वह सूर्याेष्मा का प्रसाद है। यह एक ओर ज्योर्तिमय है, दूसरी ओर संपूर्ण धरा के लिए तेजोमय।
ज्योतिष विद्या के अनुसार, सूर्य सप्ततुरंगों पर सवार है, जो प्रातःकाल रोजगार वृद्धिकारक, दोपहर को भोजनप्रदायक और सायंकाल विश्रामदेयक है।
मान्यता है कि मकर संक्रांति पर सूर्योपासना से कांति, बल व आयु में वृद्धि तथा पीलियारोग, नेत्ररोग व चर्मरोग का नाश होता है। वहीं, इसके साथ प्रातःस्नान व दान भी शामिल कर लिया जाए, तो सोने पे सुहागा होकर आध्यात्मिक लाभ मिलता है।
खगोलशास्त्र के मुताबिक, सूर्य प्रतिवर्ष 6-6 माह के लिए संक्रमण करता है। इसे ही सूर्य का उत्तरायण और दक्षिणायन कहा जाता है। मकर संक्रांति के पूर्व सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध में रहता है।
भारतवर्ष चूंकि उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है, इसलिए दक्षिणायन के दौरान भारत सूर्य से दूर रहता है। तभी भारत में रातें लंबी और दिन छोटी होती है। दक्षिणायन में होने के कारण भारत में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं, जिससे ठंड का एहसास होता है, हवाएं सर्द रहती हैं, कहीं-कहीं बर्फबारी होकर तापमान शून्य डिग्री से नीचे और नीचे चला जाता है।
मकर संक्रांति से पृथ्वी उत्तरार्ध में तिल-तिल बढ़ने लगता है, जिससे रातें छोटी व दिन लंबा होना आरंभ हो जाता है। यहीं से मौसम में बदलाव होने लगता है। पेड़ों में पतझड़ आरंभ हो जाता है। धांस-फूस, नदी-नाले, पोखर-तालाब सूखने लगते हैं। सूर्य की किरणें लंबवत पड़ने के कारण वातावरण में गरमी का आभास होने लगता है, जो मई-जून तक अपने चरम पर पहुंच जाता है।
धरा की यही परिक्रमा, जिसे सूर्य की यात्रा भी कही जा सकती है, अंधकार से प्रकाश की ओर होती है और संक्रांत लाती है। यहां संक्रांति से आशय एक स्थिति से दूसरी स्थिति में परिवर्तन से है, जो नैसर्गिक है।
संक्रांत का यह स्वरूप तमिलनाडु में पोंगल, असम में बीहू, पंजाब में लोहड़ी, उत्तर भारत में खिचड़ी, संगम स्नान व मेला के रूप में भांति-भांति विधियों में दिख पड़ता हैं।
इसी दिन कहीं मिश्रित प्रसाद, कहीं गुड़रोटी, कहीं मिली-जुली खिचड़ी, कहीं तिल-गुड़ व कहीं मूगफली-तिल-गुड़ लड्डू बनता है और भोग लगाकर प्रसादस्वरूप ग्रहण किया जाता है।
मकर संक्रांति के दिन प्रातःस्नान, ध्यान व दान का विशेष महत्व है। दान में दाल, चावल, आलू, गाजर, अमरूद, बेर, केला, मिर्च, नमक, घी, लड्डू आदि शामिल किया जा सकता है।
–00–

Leave a Reply

Join Us on WhatsApp