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ममता कालिया का नारी के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण-खुशबू दाहायत

ममता कालिया :
हिंदी साहित्य के जगत में मामता कालिया ने अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में नारी के सम्मान को बात कहीं है तथा किस प्रकार एक नारी अपनी सरी जिंदगी समझोते में गुजार देती है बताई है।
ममता कालिया के जन्म से जुड़ीं बाते
इन लेखिका का जन्म २ नम्बर १९४० को वृंदावन उत्तर प्रदेश में हुआ । इन्होंने कहानी उपन्यास नाटक सभी विधाओं में अपनी लेखनी चलाई।
ममता कालिया की रचनाएं :
उपन्यास- दौड़;नरक दर नरक,प्रेम कहानी, अंधेरे का ताला , एक पत्नी के नोट्स,
नाटक संग्रह- यहां रहना मना है, आप ना बदलेंगे।
नारी के प्रति समाज का दृष्टिकोण
ममता कालिया ने मध्यम वर्गीय समाज की नारियों की आर्थिक सामाजिक स्थिति का वर्णन अपनी लेखनी के माध्यम से किया है उन्होंने बताया है कि किस प्रकार लोग आज भी नारियों को बराबर का हिस्सा नहीं प्रदान करते हैं कहने के लिए नारियां पुरुष के समान हैं परंतु पुरुषों के समान उनको अधिकार आज भी नहीं दिया जाता है एक मध्यमवर्गीय औरत किस प्रकार अपने परिवार को अपनी सारी खुशियों से समझौता कर चलाती है अपनी लेखनी के माध्यम से तथा कविताओं के माध्यम से बताया है उन्होंने स्त्रियों की सम्मान की बात कही है और उनको उनका अधिकार दिलाने के लिए अपनी लेखनी के माध्यम से समाज तथा समाज के रीति-रिवाजों पर गहरा प्रहार किया है । उनका मानना है कि हमारा समाज स्त्रियों को जन्म से लेकर ही मृत्यु तक समझौता करना पड़ता है चाहे वह किसी रूप में हो बेटी हो तो उसे अपने पैदा होने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है जन्म के बाद पिता के घर में उसे पढ़ाई के लिए या कहीं बाहर जाने के लिए अनुमति तक नहीं दी जाती पढ़ाई लिखाई में भी वे बेटों के बराबरी नहीं कर पाती क्योंकि उन्हें अपने पिता के यहां से ही बराबर का अधिकार नहीं मिलता रीति रिवाज में रहकर तथा समाज के नियमों को मानकर ही उन्हें अपनी जिंदगी के साथ है समझौता करके आगे बढ़ना पड़ता है। अगर कोई घटनाएं होती हैं तो उसमें भी हमेशा हमारा समाज स्त्रियों को ही गलत मानता है चाहे वह ग्रामीण क्षेत्र हो या शहरी क्षेत्र समाज और लोगों की सोच नारियों के प्रति बहुत कम बदली है। ममता कालिया ने अपनी लेखनी के माध्यम से लोगों की सोच बदलने का प्रयास किया है पर महिलाओं की स्थिति को बदलने के लिए अनेक सुधार किए हैं।
उप संहार:
हमारे समाज में नारियों को भी उतना ही सम्मान मिलना चाहिए जितना पुरुषों को मिलता है। चाहे वह रीति रिवाज हो या कोई कार्यक्षेत्र हो पुरुषों के बराबरी का ही उनको भी आजादी मिलनी चाहिए उन्हें भी अपने इच्छा के अनुसार जीवन जीने का अधिकार होना चाहिए किसी भी प्रकार की कोई रोक टोक नहीं होनी चाहिए चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या उनके पहनावे का या कोई कार्य क्षेत्र जहां वह कार्य करती हैं उन्हें किसी प्रकार का हस्तक्षेप ना हो।

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