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पिंजरे के परिंदे-बलराम सिंह

बंद पिंजरे के तू परिंदे,इठलाता किस बात से
एक दिन तू भी उर जाएगा,माया के इस जाल से।

मात पिता और सखा सम्बन्धी,ये सब क्या तेरे अपने हैं
आंख खोल कर देख जरा तू,ये सब तो एक सपने हैं।

मिट जाएंगे सब कुछ तेरा,अंधियारे संसार से।

क्या तूने खोया जग में,क्या तूने पाया है
मानव बनके आया जग में,दानव क्यों रह पाया है।

सब कुछ रह जाएंगे यही पर,जब जाएगा जान से।

क्या करने तू आया जग में,क्या करके तू जाएगा
तेरे कर्मो की सब मालिक,सजा तुम्हे सुनाएगा ।

अब भी वक्त तुझे हैं मानव,नता जोड़ भगवान से।

बंद पिंजरे के तू परिंदे,इठलाता किस बात से
एक दिन तू भी उर जाएगा,माया के इस जाल से।

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