नवीनतम समाजिक रचनाएँ

विभव में भोर हो जाए,,।।
कविता पेटशाली
मैं ,,जीयूं इस तरह , कि विभव में भोर हो जाए, मैं,, जीयूं इस तरह ,की कविता हर ओर हो जाए, देश ,लिखने वाले द्वेश नहीं लिखा करत
51558
Date:
05-07-2022
Time:
08:12
👉 पिता का नाम दूं 👏
Amit Kumar prasad
शब्द कि अविचल झटा से, क्या नया सम्मान दूं! संघर्ष कि कंवलीत कथा को, मै पिता का नाम दूं!! संघर्ष कि कंवलीत कथ
51565
Date:
05-07-2022
Time:
11:01
अहसास की सुगन्ध है,,
कविता पेटशाली
अरसे बाद,खुद को पहचान पाई हूं, ये मेरे अहसास की सुगन्ध है,। समय का इक पहलू ,मेरा बड़ा भयभीत रहा , फिर भी मुसाफिर इक जिन
50930
Date:
05-07-2022
Time:
10:12
वक्त की कद्र
SANTOSH KUMAR BARGORIA
वक्त चाहता था हमसे बस वक्त दो घड़ी की गर काश हम दे पाते तो कुछ और ही बात होती । बेहद किया था जाया
50686
Date:
05-07-2022
Time:
12:08
सुकु की चाहत मे.....
Karuna bharti
सुकु की चाहत मे, हर कोई भटकता है जब की खुशीयाँ, कही और नही,आस- पास ही रेहता है ✍✍❤❤✍✍👌👌💯💯
50930
Date:
05-07-2022
Time:
10:18
मैं आंधी हूँ
Rupesh Singh Lostom
मेरा रफ़्तार देख ये मत सझना की मैं हार गया मैं आंधी हूँ आसानी से थमता नहीं दरखतों के दरख्त उखाड़ देता हूँ मेरे राश
50926
Date:
05-07-2022
Time:
11:52
कहानी कुछ कहती है
Ranjana sharma
ज्योति और राजेश की शादीशुदा जीवन अच्छे से बीत रही थी, पर राजेश की मां को ज्योति फूटी आंख नहीं भाती थी। वह बात - बात पे
50955
Date:
05-07-2022
Time:
08:17
जन्मभूमि कभी नहीं भूलनी चाहिए
कविता पेटशाली
मैंने, पहाड़ों को मुस्कुराते देखा है,। मैंने ,लोगों को बेवजह कतराते देखा है,। कितने अदभुत है ,अपने आप मैं ये ,पहाड़,
50134
Date:
05-07-2022
Time:
10:00
ग़ज़ल
Abhinav chaturvedi
जीने के तौर-तरीके मिलने से, अज़िय्यत नही मिला करते हैं। दो चेहरे एक से मिलने से, नियत नही मिला करते हैं। सिलसिला-
49434
Date:
05-07-2022
Time:
10:52
मौत बस बुलाती है,,।।
कविता पेटशाली
इस मौत को बहुत करीब से देखा है , मैंने,। न ही यह मुस्कुराती हैं,न ही यह किसी को गले ल
49382
Date:
05-07-2022
Time:
10:29
कहां रही चूंक उनकी
कविता पेटशाली
मुनासिब नहीं मेरा किसी पर भी बरस जाना,। मैं उस पगडंडी पर ,बिना धाप किए चल रही हूं, जहां एक कांटा कुरेदता है , मेरी कदम
49358
Date:
05-07-2022
Time:
11:01
रोटी की महक
Rambriksh, Ambedkar Nagar
कविता -रोटी की महक महकते रोटी का मंज़र,अजीब होता है मगर कहां ये सबको नसीब होता है इस कस्तूरी के चक्कर में घूमती है
48887
Date:
05-07-2022
Time:
10:17