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Tag: Anushree Dubey

गीत-अनुश्री दुबे

दोस्तों यह छोटा सा गीत मैंने इसलिए लिख रहूं क्योंकि मैं आज दुनिया की सच्चाई आपके सामने रखना चाहती हूं। कुछ दिन पहले विंध्याचल मेरी

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मेरा जबाव मेरी तन्हाई – अनुश्री दुबे

मैं हंस कर बोली ‘बहन’ तुझमें मुझमें फर्क इतना है  तूं हर पल लोगों का भोझ बनकर जीती रहती है और जो तेरे सामने है

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तन्हाई ने मुझसे सबाल पूछा- अनुश्री दुबे

मैं अकेली जग रही थी पीड़ा इतनी सही न गई खिड़की के पास बैठ गई अचानक एक आवाज आई मेरे कारण परेशन हो ‘अनु’ मैं

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मशीनों ने छीना हमशे हमरा रोजगार- अनुश्री दुबे

किसी भी राष्ट्र के निर्माण में राष्ट्र के हर व्यक्ति का योगदान जरूरी होता है परंतु हमारे राष्ट्र में वेरोजगारों की संख्या दिन पे दिन

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10 जरूरी सूचनाएं जियो एक्सप्रेस ट्रेन-अनुश्री दुबे

1- जियो एक्सप्रेस ट्रेन चलने वाली है कृपया सारे यात्रीगण ध्यान दें कि जियो एक्सप्रेस ट्रेन का रिचार्ज कहीं खत्म तो नहीं हो गया है।क्योंकि

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कविता सुख तब है जब माँ बाप के प्यार की दौलत पास है-अनुश्री दुबे

समझ नहीं आता था कि ये महोब्बत क्या है…. न ही समझ आता था महोब्बत में बगावत क्या है….. आज समझ आया कि महोब्बत एक

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गजल मंजिल मिलेगी आश नहीं है-अनुश्री दुबे

चल रही हूं मगर मंजिल मिलेगी आश नहीं है। पत्थर बन गई मगर किसी को आभास नहीं है। ऐ मेरी दोस्त दिखा देती मैं जिंदगी

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सर के होते हुए भी पटाखें फोड़े जाते हैं। – अनुश्री दुबे

आज मैं आपनी कुछ सैतानियां एक गीत के माध्यम से आप सभी के बीच रखना चाहती हूं आपको भी मजा आये तो बताईयेगा। अब तो

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(गजल) मंजिल मिलेगी आश नहीं है-अनुश्री दुबे

चल रही हूं मगर मंजिल मिलेगी आश नहीं है। पत्थर बन गई मगर किसी को आभास नहीं है। ऐ मेरी दोस्त दिखा देती मैं जिंदगी

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