मेहंदी-चेतन वर्मा

मेहंदी-चेतन वर्मा

तेरे हाथों की यह मेहंदी मुझे पागल करती है, कोई तो आकर रोक लो यह बादल करती है | हरे-हरे से यह तो अब लाल सी लगती है, प्यारी-प्यारी न्यारी मेरी जान पर जचती है | तेरे होठों की लाली बेचैन सी करती है, अब निकलता है, सवेरा और शाम सी लगती है, तेरे हाथों
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वक्त-चेतन वर्मा

ए यादों का मंजर खत्म क्यों नहीं होता सावन का एहसास है या दो दिलों की प्यास है कुछ तो खास है वरना यूं समेटकर सूखे पत्तों को जलाने का वक्त किसके पास है… खो गई हो अगर कहीं पर तो भी लौट आना यहां निगाहें कहीं और निशाने कहीं और होते हैं आसमान भी
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ए हवा-चेतन वर्मा

ए हवा यह बता क्यों तोड़ गई वह दिल मेरा क्यों इतना इतराती है क्यों सताती है जा उनसे पूछ कर आ क्यों मेरी याद नहीं आती कोई और मिल गया क्या कुछ देर तो थम जा ए हवा मेरा दिल बेचैन है उनके कानों में खबर डाल कर आ क्यों मुझे बेगाना कर दिया
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दिल के टुकड़े-चेतन वर्मा

इस कदर खो गए दिल के टुकड़े मेरे…💔 एक को समेटने से पहले दूसरा रूठ जाता है कोई इधर गिरता है तो कोई गिर ही नहीं पाता है बहते हुए आंसुओं को संभालना मुश्किल हो जाता है इस कदर हो गए दिल के टुकड़े मेरे…💔 जिसको समझा बहुत समझ आया नहीं समझा कर चला जाता
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बावरा मन-चेतन वर्मा

भीगे-भीगे होठों पर गिली-गिली बूंदों के साय पर समाना चाहे रे बावरा मन… धीरे-धीरे बल खाते हुए दिल पर धड़कनों को समेटना चाहे रे बावरा मन… नयन मटकीले कानों में झुमके टक-टकी लगाकर मदहोश होना चाहे रे बावरा मन… हरी-भरी दुनिया में काली-काली जुल्फों से उलझकर हर पल सुलजना चाहे रे बावरा मन… चेतन वर्मा
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नखरा चेतन वर्मा & बबीता खंडूरी

आ बैठ पास मेरे, तेरा लाड लडाऊ मैं होठो पर लाली और माथे पर बिंदी लगाकर तेरा नखरा💅उठाऊं मैं.. आज आज की बात कल से चांदनी रात इन महकती हवाओं में तेरी जुल्फें सजाकर तेरा नखरा💅 उठाऊं मैं… सोलह श्रंगारओ से अलंकृत तेरे दिल से मेरे दिल के तार मिलाऊं में तेरे रूठे ख्वाबों को
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हसीना…❤(चेतन वर्मा)

एक ही हसीना है, अपनी जो मुझे झेल सकती है कहने को तो हरपल लड़ती रहती है वह मृग नयनी , चंचल हृदय वाली मोहक रंगों और सुनहरे बालों वाली हिरण सी चाल-चलन वाली एक ही हसीना है, अपनी होठो पर कातिल मुस्कान वाली कजरारे नैनो में काजल लगाने वाली जब चलती है लगे कोई
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दिन मेरा…🌞(चेतन वर्मा)

वक्त कैसा भी हो गुजर ही जाएगा रात कितनी भी काली हो सवेरा हो ही जाएगा.. दुखों की कितनी ही भरमार हो यह पल भी बीत जाएगा एक दिन मेरा भी आएगा पल भर में मौसम बदल जाएगा… बादल कितने ही घरघरा रहे हो समुंदर में पानी भी मिल जाएगा हवाएं कितने ही आग से
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भरी-भरी कलम…(चेतन वर्मा)

खाली खाली पन्नों पर भरी-भरी कलम लगती है.. पास होती हो जब तुम मेरे यह काली रात भी नई नवेली दुल्हन सी लगती है दूर रहकर जो तुम बिना बोले बात करती हो चांदनी रात भी फिकी सी लगती है साथ में मेरे बैठकर यूं जो रोब जमाती हो मुझ पर कितनी मासूम सी घड़ी
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इस कदर…(चेतन वर्मा)

किसी के इंतजार में रातों के अंधेरे में तारे गिन गिनकर बेचैन सुबह दम तोड़ती है , इस कदर.. किसी की यादों के मंजर में दिन के उजाले में तड़कती भड़कती आग में बेहोश शाम झिलमिलाती है , इस कदर… किसी के गुजरते वक्त के मरहम में सुबह के फूहार में दिल तोड़कर हंसती रात
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