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Divyani Pathak

प्रिय शब्द-दिव्यानि पाठक

मेरे शब्द मुझसे कुछ कहते हैं । मुझे निराश देख वो समझाते हैं । अमूर्त में भी मूर्त जाना हैं तुमने । जैसे शरीर में प्राण ड़ाला हैं तुमने । देखा नहीं जाता अब ये आशुपूर्ण चेहरा । जैसे चंद्र में गृहण लगा हो गेहरा। अंनतकाल से रिश्ता हैं मेरा और तुम्हारा। प्रत्येक भाव से …

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जिंदगी-दिव्यानि पाठक

हर बार तुफानो में खड़ा करती है तु ऐ जिंदगी । मजबूरीयो में फसाती हैं तेरी बंदगी, मील चुकी है हर और से अनुभवी ठोकरे, क्या होती नहीं कभी तुझे शर्मींदगी,     दिव्यानि पाठक  सीहोर, मध्यप्रदेश

मुस्कूराती सांझ-दिव्यानी पाठक

स्वर्ण परत औढे स्वयंवर से, सात रंग समेटे अंबर से, आई सरोवर मे मुस्कूराती सांझ। नीर के चमकीले दर्पण में, तेज ऐसा मानो जैसे समर्पण मे, गूनगुनाई सरोवर मे मुस्कूराती सांझ।      दिव्यानी पाठक सिहोर, मध्यप्रदेश

लोटो संस्कृति की और- दिव्यानि पाठक

नवीनता के राग मे, कटुता के बाग मे, घुले जा रहे पश्चिमी स्वांग मे। संस्कारों के अभाव मे, स्वार्थ के प्रभाव में, जुड़े जा रहे पश्चिमी भाव मे।       दिव्यानि पाठक सीहोर, मध्यप्रदेश

कविता-दिव्यानी पाठक

बढ़ते जाना ये मेरी गति है। ठहर जाने में मेरी क्षति है। वक्त की मात्रा कहाँ थमी है। देख तो जरा यहाँ जमी है।        दिव्यानी पाठक सिहोर, माधिरप्रदेश

स्वतंत्रता-दिव्यनी पाठक

आज मन निर्भय हैं, क्योंकि हम स्वतंत्र हैं । आज जन का संघ हैं, क्योंकि हम स्वतंत्र हैं । आज वायु तिरंगीत हैं, क्योंकि हम स्वतंत्र हैं ।                        दिव्यनी पाठक               सिहोर, माधिरप्रदेश

पद प्रत्याशी-दिव्यानि पाठक

जब चुलहे तक पानी भर जाता हैं।सप्ताह तक उन परिवारों के घर भोजन पक नही पाता हैं।जब कोई अनिश्चित घटना घट जाती हैं।तब परिवार ही परिवार के सदस्यो का सहायक नही बन पाता हैं।सब कुछ स्वार्थ के आधार पर ही आधारित होता हैं।ऐसी स्थिती में जब मानव ही मानव का सहयोगी नही बन पाता हैं।तब …

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तृषणा-दिव्यानी पाठक

ये तृषणा मन में पलती रहती हैं । अनेको बार ये बदलती रहती हैं। हर बार हमें ये छलती रहती हैं। हमें अपनो से पराया करती हैं। सदैव स्वार्थी बनाया करती हैं। केवल जिद ही जताया करती हैं। अवसर आने पर मुकरती रहती हैं। जरूरत छोड़ जिद पर मरती रहती हैं। असंतुष्ट रहने से ड़रती …

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विचार- दिव्यानि पाठक

कोई लकड़ी का स्तंभ नहीं जिस पर की कठोर आरी चलती हैं। ये जिंदगी हैं जो सहायता के आधार पर चलती हैं।     दिव्यानि पाठक सीहोर,मध्य परदेश 

मन की बातें-दिव्यानि पाठक

मन की बातें मन मैं घर कर गईं । आया वक्त का कहर ऐसा की , बीना बाँध की नहर सी बह गईं।     दिव्यानि पाठक सीहोर, मध्य परदेश

ऐ वक्त -दिव्यानि पाठक

हर पल गुजर कर प्रतिपल बदलता हैं। खिला फुल भी मुरछा कर अंकुर में ढलता हैं। होटो पर हँसी तो दिल में तुफान पलता हैं। कभी भय तो कभी अभय में इंसान ढलता हैं। कोई भुख से तो कोई प्रतियोगीयो से जलता हैं। कोई नफरत तो कोई प्यार से किसी को छलता हैं। कोई स्वेवार्थ …

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जख्म-दिव्यानि पाठक

किसे कहूँ कि जख्म गहरे हैं। यहाँ तो चेहरे ही बहुतेरे हैं। बहुत कम हैं जो मेरे हैं। वो भी कह दे संभल जख्म तेरे हैं।      दिव्यानि पाठक सेहोर ,माधियप्रदेश  

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