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Tag: Divyani Pathak

मुस्कूराती सांझ-दिव्यानी पाठक

स्वर्ण परत औढे स्वयंवर से, सात रंग समेटे अंबर से, आई सरोवर मे मुस्कूराती सांझ। नीर के चमकीले दर्पण में, तेज ऐसा मानो जैसे समर्पण

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लोटो संस्कृति की और- दिव्यानि पाठक

नवीनता के राग मे, कटुता के बाग मे, घुले जा रहे पश्चिमी स्वांग मे। संस्कारों के अभाव मे, स्वार्थ के प्रभाव में, जुड़े जा रहे

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स्वतंत्रता-दिव्यनी पाठक

आज मन निर्भय हैं, क्योंकि हम स्वतंत्र हैं । आज जन का संघ हैं, क्योंकि हम स्वतंत्र हैं । आज वायु तिरंगीत हैं, क्योंकि हम

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पद प्रत्याशी-दिव्यानि पाठक

जब चुलहे तक पानी भर जाता हैं।सप्ताह तक उन परिवारों के घर भोजन पक नही पाता हैं।जब कोई अनिश्चित घटना घट जाती हैं।तब परिवार ही

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