नाच रहा है मोर Poem By सचिन अ. पाण्डेय

नाच रहा है मोर Poem By सचिन अ. पाण्डेय

नाच रहा है मोर हो गया है भोर, वर्षा हुई घनघोर; बाँधे प्रीति की डोर, नाच रहा है मोर| बयार चल रही चारों ओर, तृप्त हुआ अवनी का एक-एक छोर; बाँधे प्रीति की डोर, नाच रहा है मोर| उर में हर्ष नहीं है थोर, दादुर मचा रहे हैं शोर; बाँधे प्रीति की डोर, नाच रहा
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बचपन की यादें Poem By Rahul Red

याद आ रही बचपन की गाँव के उन पलों की नही भा रही हवा मुझे शहर के जलजलों की सरसों के खेतों में भाग-भाग कर पतंग लूटना पहिया चलाने वाले दोस्तों का साथ छूटना छुपा छुपाई का खेल लम्बी कूद,पेड़ों पर चढ़ना यारी ऐसी थी हमारी सुबह दोस्ती शाम को लड़ना गाँव की सुहानी हवा
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बदनामी Gazel By Rahul Red

महफ़िल सजा ली यारों की, तो हुई बदनामी बगिया खिला ली बहारों की, तो हुई बदनामी यह कैसा समाज, जो बदनाम करता फिरता है? मदद कर दी बेसहारों की, तो हुई बदनामी। किसी पे दिल अगर ये मर लिया, तो हुई बदनामी बाँहों में किसी को भर लिया, तो हुई बदनामी। बदनामी के दौर में
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दृष्टिदोष Poem BY प्रोo लक्षमीनारायण मंडल

दृष्टिदोष समझा नहीं किसी ने, समझेगा उस दिन जब मैं दुनियाँ छोर चला जाऊँगा ! खोजेगी दुनियाँ, पर मैं मिलूँगा नहीं !! देखते हैं लोग अपनी दृष्टि से, जितने लोग उतनी दृष्टि से ! भला कैसे दिखेगी दुनियाँ एक जैसी ? जो है वो दिखता नहीं, दिखता वह, जो है नहीं! देखेगी दुनियाँ, जब रहूँगा
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कलाम को मेरा सलाम Poem By Sachin A. Pandey

कलाम को मेरा सलाम हुआ था एक बुद्धि-सम्राट, कथा है जिसकी बहुत विराट; कभी न भाया जिसे आराम, उस कलाम को मेरा सलाम। हिंद को किया परमाणु प्रदान, वह था धरणी माँ का वरदान; जिसने किए खोज तमाम, उस कलाम को मेरा सलाम। जो `मिसाइल मॅन´ कहलाया, शास्त्र जगत में इतिहास बनाया; जिसको प्यारी सारी
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कविता

साहित्य की इस दुनियाँ को युवा झकझोर गए कितने लेखक दुनियाँ में छाप अपनी छोड़ गए लोग साहित्य खो रहे या कविता अपनी अहमियत साहित्य ने इस दुनियाँ को लेखक दिया अनगिनत आज के इस दौर में, गुमनाम हो रही है कविता अस्तित्व बचाने के लिए अब रो रही है कविता। मोबाईल के दौर में
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है मेरी अभिलाषा Poem By Sachin A. Pandey

है मेरी अभिलाषा छू लूँ गगन बिना लिए पर, किसी का न हो मुझको डर; मंजिल छोडू न भी मरकर, है मेरी अभिलाषा। सामर्थ्य रहे मुझमें इतना, करूँ मैं सभी का उद्धार; बनूँ मैं दीन का जीवनाधार, कुछ न लगे मुझे अपार; है मेरी अभिलाषा। यदि कहीं हो भ्रष्टाचार, कर दूँ उसे मैं तार-तार; न
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शिक्षा बड़ी उदार By Sachin A. Pandey

शिक्षा बड़ी उदार घर-घर में जिसे मिला मान, करती सबका है कल्याण; जिसके बल पर चले घर-बार, शिक्षा बड़ी उदार। गांधी,नेहरू और कलाम, इसकी बदौलत बने महान; दूर करे अज्ञानी अंधकार, शिक्षा बड़ी उदार। दीन को दिलाती यह पहचान, इसके आगे रंक-न-राजा; सभी को देती मान समान, तलवार से अधिक है इसमें धार, शिक्षा बड़ी
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एक दिन ऐसा आएगा… Poem By Pranay Kumar

एक दिन ऐसा आएगा… न कोई किसी के हँसी पर पावंदी लगाएगा न कोई किसी के ख़ुशी पर पावंदी लगाएगा जिंदगी होगी अपनी, सलीका होगा अपना, सोच होगी अपनी, रास्ता होगा अपना, एक दिन ऐसा आएगा… निकलेंगे सभी अपने काम पर, पहुंचेंगे किसी न किसी मुकाम पर, न लेंगे किसी का सहारा, न मानेंगे कभी
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चलते रहना है Poem by Pranay Kumar

तुम्हें न दौड़ना है, न रुकना है, बस चलते रहना है, रास्ता अभी बाँकी है । तुम्हें न डरना है यह सोच कर कि आगे क्या होगा ? बढ़ते रहना है अपनी मंजिल की ओर, तुम्हें कुछ न भी मिला तो क्या ? तजुर्बा पाना अभी बाँकी है । बहुतों ने बहुत कुछ कहा होगा
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