आवारा आशिक – प्रणय कुमार

आवारा आशिक – प्रणय कुमार

कभी दिवालों से, कभी हवाओं से बातें करता फिरता हूँ मैं | कभी उसकी निगाहों से, कभी उसकी अदाओं से शर्माता फिरता हूँ मैं | कभी आशिक की तरह, कभी आवारों की तरह घूमता फिरता हूँ मैं | कभी उसके दरवाजे को, कभी उसकी खिड़कियों को घूरता फिरता हूँ मैं | जब भी देखना चाहती
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स्वाथ्य सबसे बड़ा धन है – प्रणय कुमार

किसी गाँव में एक आलसी पुरुष रहता था | वह अपने खेत-पतार को छोर कर घर में बैठा रहता था | उसके पास धन की कोई कमी नहीं थी, इसलिए वह बैठे–बैठे ही अपना घर चलता था | महीने बीत गए मगर उसका आलस नहीं गया | उसके आलस के बारे में गाँव के सभी
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क्षण भर की दूरी – प्रणय कुमार

यह कहानी है कुनाल की, जो अपने सम्मलित परिवार की नीभ है – जो संधर्ष की आंधियों में हौसलों की दीवार बन कर खड़ा है | परिवार में दो और भी लड़के हैं – राकेश और राजेश, यानि कि कुनाल के चचेरे भाई : इनकी पारिवारिक स्थिति कुनाल से काफी बेहतर है | ये कुनाल
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क्षण भर की दूरी – प्रणय कुमार

यह कहानी है कुनाल की, जो अपने सम्मलित परिवार की नींव है – जो संधर्ष की आंधियों में हौसलों की दीवार बन कर खड़ा है | परिवार में दो और भी लड़के हैं – राकेश और राजेश, यानि कि कुनाल के चचेरे भाई : इनकी पारिवारिक स्थिति कुनाल से काफी बेहतर है | ये कुनाल को
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बदल रहे हैं हम – प्रणय कुमार

कभी जिम्मेदारियाँ उठाने को कभी अपना बचपना जीने को मन करता है। कभी किसी काम में लग जाने को कभी कहीं बेवजह घूमने को मन करता है। कभी गंभीर बातें सोचने को कभी हँसी में उड़ा देने को मन करता है। कभी दो चार पैसे जोड़ने को कभी बिखेर देने को मन करता है। कभी
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एक दिन ऐसा आएगा… Poem By Pranay Kumar

एक दिन ऐसा आएगा… न कोई किसी के हँसी पर पावंदी लगाएगा न कोई किसी के ख़ुशी पर पावंदी लगाएगा जिंदगी होगी अपनी, सलीका होगा अपना, सोच होगी अपनी, रास्ता होगा अपना, एक दिन ऐसा आएगा… निकलेंगे सभी अपने काम पर, पहुंचेंगे किसी न किसी मुकाम पर, न लेंगे किसी का सहारा, न मानेंगे कभी
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ये दुनियाँ बड़ी जालिम है! Poem By Pranay Kumar

ये दुनियाँ बड़ी जालिम है! मन करता है कहीं भाग जाउँ मन कहता है कहीं रुक भी जाऊँ कोई परया अपना सा लगता है, कभी अपना पराया सा लगता है बड़े असमंजस में हूँ; किसके साथ रहूँ और किसे छोड़ जाऊँ? ये दुनियां बड़ी जालिम है! मन करता है कुछ बड़ा कर जाऊँ, मन कहता
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Udne do mujhe… Poem By Pranay Kumar

“उड़ने दो मुझे” भले ही रख लो डोर तुम अपने हाथ में, मगर उड़ने दो मुझे आकाश में. भले ही पता हो मेरा पाताल में, मगर घर हो मेरा आकाश में. भले ही हार हो जाए मेरी, मगर खेल लेने दो मुझे इस जहान में. भले ही थक गया हूँ मैं, मगर चल लेने दो,
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