आम आदमी की कहानी – रविकांत अग्रवाल

आम आदमी की कहानी – रविकांत अग्रवाल

आम आदमी जो रीति रिवाजों से झुलसा पड़ा है जो अपने ही बनाए चक्रव्यूह में फँसा पड़ा है । दो जून की रोटी का जुगाड़ नहि हो पाता है , अपनो कि बीच रहकर भी अपना नहि हो पाता है । अपने लोगों द्वारा ही चलना सिखाया जाता है फिर उन्ही कि द्वारा चलते को
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जुमलेबाजी – रविकांत अग्रवाल

दोस्तों अपने पिछले कई सालो से एक अत्यंत दुखदायक और जनता विरोधी सब्द सियासत के खेल में काफी बार सुना होगा | जी हा , मै बात कर रहा हु सब्द “जुमलेबाजी” का | वैसे तो ये शब्द काफी सालो से सियासत में प्रयोग किया जा रहा है लेकिन इस शब्द का पूर्णतया उपयोग व
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आम आदमी की कहानी – रवि कांत अग्रवाल

आम आदमी जो रीति रिवाजों से झुलसा पड़ा है जो अपने ही बनाए चक्रव्यूह में फँसा पड़ा है । दो जून की रोटी का जुगाड़ नहि हो पाता है , अपनो कि बीच रहकर भी अपना नहि हो पाता है । अपने लोगों द्वारा ही चलना सिखाया जाता है फिर उन्ही कि द्वारा चलते को
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दहेज़ प्रथा एक अभिशाप – रवि कांत अग्रवाल

21 वी सदी की घटना आपको बताने जा रहा हु | एक बदनसीब बाप की आपबीती सुनाने जा रहा हु || पापा ने पाल पोशकर अपनी पारी को बड़ा किया लकिन दहेज़ प्रथा ने पापा को मौत के द्वार खड़ा किया || किस्सा कुछ यु है की ——- घर में परी की शादी की शहनाई
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सायरी – रविकांत अग्रवाल

लालकिले की दीवारों से बोल रहे है सताधारी फ़ैल चुकी है भ्रस्ताचार की पूरी तरह से बीमारी | लकिन उनको सच बताने वाली जनता मौन है तभी तो सन्यासी भी बन चुके है व्यापारी || दिल्ली का सरताज पहनकर खुद का ढोल बजा रहे जब चाहे , जैसे चाहे जनता को वो नचा रहे आधे
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सरकारी बस की सवारी – रविकांत अगरवाल

आज मै करने बैठा एक सरकारी बस की सवारी जिसकी गंतव्य पर जाने की हो रही थी तैयारी लकिन जैसे हे बस मूल स्थान से चली अज्ञात कारणों से बस जोर से हिली || चालक ने कहा – घबराओ मत आज सवारी कम है इसलिए बस हिल रही है सरकारी बस है साहब पिछले २०
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बूढ़े माँ बाप की पुकार – रविकांत अग्रवाल

आज बूढ़े माँ बाप जवान खून से कर रहे है पुकार कब उन्हें मिलेगा अपने वंसज का दुलार || खुद को अकेला देख उन्हें कितनी तकलीफ होती होगी बच्चे उनकी सुनते नहीं , आत्मा उनकी कितनी रोती होगी || लड़के की खवाइश में माँ बाप दर दर भटकते है | लकिन , व्ही माँ बाप
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डरी सहमी लड़कियाँ – रविकांत अग्रवाल

इस महान देश में आज भी रहती है डरी सहमी लडकियां जैसे टूट कर बिखरी पड़ी रहती है कांच की खिडकिया || गुलाब जैसी लडकियों के रौंद दिए जाते है सपने वो कोई और नहीं रौंदने वाले भी होते है अपने गैरो को तो खबर भी नही तकलीफ किस बात से होती है अपने ही
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राजनीती का सच – रविकांत अग्रवाल

दोस्तों वर्तमान समय में राजनीति की हालत दयनीय हो चुकी है ,कुछ असामाजिक तत्वों के कारण लोगों का राजनीति से विश्वास उठता जा रहा है । ना तो राजनीति में विश्वास बाक़ी रहा ना कोई उमीद । झूठे जुमलेबाज़ी से लोगों के सपनो को साकार करने की बात कहकर सताधिकार पा लिया जाता है ओर
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हिन्दुस्तानी जवान – रविकांत अग्रवाल

नीचे तपती धरती ,ऊपर नीला आसमान । बीच में सरहद पर खड़ा हिंदुस्तानी जवान ।। वो क्या जाने संसद ,वो क्या जाने अयोध्या । सिर्फ़ और सिर्फ़ तिरंगा ही है उसका भगवान ।। रविकांत अग्रवाल 0 साहित्य लाइव रंगमंच 2018 :: राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी प्रतियोगिता • पहला पुरस्कार: 5100 रुपए राशि • दूसरा पुरस्कार:
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