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Tag: Rahul Red

दो वक्त की रोटी – राहुल रेड

झेला जिसने सूखा सावन झेला आँधी और तूफ़ान पानी से सस्ता श्रम जिसका वो कहलाता है किसान वस चले उसका तो तूफानों की राह मुड़ा

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जीवन की आधी रेस पार हो गया हूँ मैं – राहुल रेड

जीवन की आधी रेस पार हो गया हूँ मैं घर पर बैठे बैठे बेकार हो गया हूँ मैं लतीफे सुनकर भी हँसी नहीं आती है

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ये फालतू वक्त मुझसे काटा नही जाता – राहुल रेड

हमारे खून पसीने से कमाई हुई रकम आप औरों में बाँटने की बात करते हो ये फालतू वक्त मुझसे काटा नही जाता आप जिंदगी काटने

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वादा करके मुझसे निभाया नहीं जाता – राहुल रेड

जीवन की आधी रेस पार हो गया हूँ मैं घर पर बैठे बैठे बेकार हो गया हूँ मैं लतीफे सुनकर भी हँसी नहीं आती अब

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शिकायत तुमसे तुम्हारी क्यों करें हम – राहुल रेड

शिकायत तुमसे तुम्हारी क्यों करें हम दुश्मन से दोस्ती यारी क्यों करें हम हर बार जब उसी से हमे धोखा मिला फिर उसकी तरफदारी क्यों

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जातिवाद की जड़ – राहुल रेड

न ख़त्म होगा आरक्षण, ना मिटेगा जातिवाद न जाति बन्धन तोड़ ब्राह्मण होगा दलित साथ जातिवाद की आग में आरक्षण घी जैसा है फायदा वही

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मुफ़लिस की लाचारी कौन देखता है – राहुल रेड

मुफ़लिस की लाचारी कौन देखता है कौन किस पर भारी कौन देखता है कहाँ से कहाँ तक विज्ञान की वजह से पहुँची दुनियाँ सारी कौन

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अब तो मन्दिर में भी बलात्कार होने लगे – राहुल रेड

नफरत का बीज हम इस कदर बोन लगे दरिंदगी अपनाकर ​इंसानियत ​ खोने लगे कैसे जायेगी वो हिफाजत की दुआ करने अब तो मन्दिर में

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इन्शानो पर शुरुआत से जुल्म इन्शान ने ढाया है – राहुल रेड

इन्शानो पर शुरुआत से जुल्म इन्शान ने ढाया है अपनों ने अक्सर यहाँ अपनों से धोखा खाया है मसरूफियत भरी जिंदगी में वक्त की भरमार

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शान्ति भी है थोडा आक्रोश भी है, क्रांति भी है मुझमे संतोष भी है – राहुल रेड

शांति भी है थोडा आक्रोश भी है क्रांति भी है मुझमे सन्तोष भी है धूप से छाँव का सफर शहर से गाँव का सफर कहा

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मैं रोज हारता हूँ, रोज जीतता हूँ – राहुल रेड

Turn off for: Hindi मैं रोज हारता हूँ, रोज जीतता हूँ गिरता हूँ, चोट लगती है उँगलियाँ टूटती हैं, फ्रैक्चर होते हैं खून निकलता है,

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