“हम उस इश्क़ को इश्क़ क्या कहें” – सचिन ओम गुप्ता

“हम उस इश्क़ को इश्क़ क्या कहें” – सचिन ओम गुप्ता

हम उस इश्क़ को इश्क़ क्या कहें, जो पहली नजर में आँखों में बसी न हो.. हम उस इश्क़ को इश्क़ क्या कहें, जो देखकर इश्क़ को शरमायी न हो… हम उस इश्क़ को इश्क़ क्या कहें, जो ख़्वाबों में आई न हो… हम उस इश्क़ को इश्क़ क्या कहें, जो इश्क़ की ज़ुल्फो से
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नारी – सचिन ओम गुप्ता

      जब नारी में शक्ति सारी फिर क्यों नारी हो बेचारी नारी का जो करे अपमान जान उसे नर पशु समान हर आंगन की शोभा नारी उससे ही बसे दुनिया प्यारी राजाओं की भी जो माता क्यों हीन उसे समझा जाता अबला नहीं नारी है सबला करती रहती जो सबका भला नारी को
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Sahity Live के साथ :: सचिन ओम गुप्ता

उर की हो पीड़ा या हो तुम उदास, लिख डालो बस “SahityLive” के साथ | जीवन की हो उलझन या हो किसी की बात, लिख डालो बस “SahityLive” के साथ | हो कोई लेख या हो कोई कविता, लिख डालो बस “SahityLive” के साथ | बन साथी SahityLive का और कुछ, लिख डालो बस “SahityLive” के साथ | उठाकर अपनी कलम और कुछ, लिख डालो बस “SahityLive” के साथ | (सचिन ओम गुप्ता,चित्रकूट धाम)

बस शर्त इतनी है – सचिन ओम गुप्ता

जिन्दा रिश्तों को जब भी संभाला जाए, बस शर्त इतनी है की गड़े मुर्दों को उखाड़ा न जाए | मेरी बदनामी का किस्सा बेशक उछाला जाए , बस शर्त इतनी है की मेरी नेकचलनी को भी सामने लाया जाए | पत्थर के देवता का भोग बेशक निकाला जाए, बस शर्त इतनी है की गरीब के
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प्रेम रस से भरी “होली” – सचिन ओम गुप्ता

मैंने उसको देखा, उसने मुझको देखा और इस देखा-देखी में वो मेरी हो-ली, आज देखते ही देखते आ गया रंगों का त्यौहार आओ चलो मिलकर खेले होली | भरी पिचकारी रंगों से, तन उसका भीगा दिया रंगों के इस त्यौहार में, अपने प्रेम का रंग बरसा दिया | मत भाग गोरी इन से दूर, जाग
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” दादी माँ “-सचिन ओम गुप्ता

आओ तुम्हें मैं एक बात बताऊं, एकदम सच्ची, पूरी पक्की दादी माँ होती है , घर की नींव एकदम पक्की | कमर झुका कर थी वो चलती, धीमी सी थी उसकी चाल दुबला-पतला शरीर था उसका , थे सर पे चमकते सफ़ेद बाल | जब भी मैं परदेश से घर को आता, उसके पास जाकर
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आईना – सचिन ओम गुप्ता

इस जीवन में हैं बहुत मुश्किलें कोई जीवन का आईना दिखा जाता है कोई जीवन का आईना मोड़ जाता है| आईना जो देखा मैंने, कुछ न कुछ तो बात है, चेहरे की सिकन बता रही है,आज खुल रहा कोई राज है| आईने में अक्सर अपना चेहरा देखकर खुश हो लेता हूँ जीवन में है कोई
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“इंजीनियरिंग” में दाखिला – सचिन ओम गुप्ता

आई.आई.टी. व ए.आई.ई.ई.ई. की परीक्षा देकर जब हम घर आए, अब बारी आई स्टेट परीक्षा की और हम खुद को लोकल यूनिवर्सिटी के हवाले कर आए| सारे चेहरे थे नए और हम सब थे अनजान, लेकिन इस भीड़ में तो हमें बनानी थी अपनी पहचान| सब दिखते थे मासूम और सबको था रैगिंग का डर,
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ख़ामोशी – सचिन ओम गुप्ता

सुनो…तुम यूँ चुप से न रहा करो, यूँ खामोश से जो हो जाते हो, तो दिल को वहम सा हो जाता है, कहीं खफा तो नही हो..? कहीं उदास तो नही हो…? तुम बोलते अच्छे लगते हो, तुम लड़ते अच्छे लगते हो, कभी शरारत से, कभी गुस्से से, तुम हँसते अच्छे लगते हो, सुनो…तुम यूँ
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आप धीरे से मरना शुरू करते हैं – सचिन ओम गुप्ता

आप धीरे से मरना शुरू करते हैं || अगर आप जीवन में यात्रा नहीं करते हैं अगर आप पढ़ नहीं सकते हैं अगर आप जीवन की आवाज़ नहीं सुनते हैं अगर आप अपने आप की सराहना नहीं करते हैं आप धीरे से मरना शुरू करते हैं || जब आप अपने आत्मसम्मान को मारते हैं जब
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